भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 277, कुल 353 में से

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पृष्ठ 277

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri षष्ठ अध्याय 249 अर्थात् मातृभूमि के आदर्श भक्तों में कुछ गुणों का होना अत्यन्त आवश्यक है। जिस राष्ट्र में देशभक्त, सत्यनिष्ठ, प्रचण्ड, क्षात्रतेज, धर्मानुष्ठान एवं कर्तव्यपालन के गुण से युक्त प्रत्येक शुभ कार्य को दक्षतापूर्वक सम्पन्न करते हैं तथा यथार्थ ज्ञान के प्रति समर्पण की भावना रखते हैं, मातृभूमि (राष्ट्र) के पालन-पोषण करने में समर्थ होते हैं, वे ही अपना भूत, वर्तमान और भविष्य में सब तरह से पोषित करने वाली मातृभूमि की रक्षा करके, उसकी उन्नति के विस्तृत स्थान एवं अवसर प्रदान करें। इन गुणों से ही राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता को सबल आधार प्राप्त होता है। इन गुणों से युक्त राष्ट्रभक्तों पर राष्ट्र गर्व करता है और ऐसे राष्ट्रभक्तों से युक्त राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता की ओर शत्रु दृष्टिपात भी नहीं कर सकता है। राष्ट्र को, मातृभूमि को, अपनी माता ही माना जाता है और जन्मदात्री माँ से मातृभूमि अधिक सम्मान और त्याग की अधिकारिणी होती है। राष्ट्रभक्तों के लिए जन्मदात्री माँ सबके लिए अपनी होती है लेकिन मातृभूमि एक है और उसके करोड़ों पुत्र हों तो ऐसी माँ के लिए गर्व का विषय अवश्य ही होगा। उसकी उन्नति, समृद्धि एवं रक्षा की उदात्त भावना राष्ट्र-भक्तों में पाया जाना स्वाभाविक है- यत् ते॒ मध्यं॑ पृथि॒वि॒ यच्च॒ नभ्यं॒ यास्त॒ ऊर्ज॑स्त॒न्वः॑ संब॒भूवुः॑। तासु॑ नो धेह्य॒भि नः॑ पवस्व मा॒ता भूमिः॑ पु॒त्रो अ॒हं पृ॑थि॒व्याः। प॒र्जन्यः॑ पि॒ता स उ॑ नः पिपर्तु॥१ अर्थात् इसमें मातृभूमि से राष्ट्रभक्तों द्वारा प्रार्थना की गई है कि "हे मातृभूमि! हमें अपने विद्वान् पुत्रों को जो कि ज्ञान से परिपूर्ण हैं और इस पृथिवी का केन्द्र हैं, उनके संरक्षण में हमें देकर हमारी रक्षा कीजिए और उनसे ज्ञान प्राप्त करने का अवसर प्रदान कीजिए। हे मातृभूमि! मैं धरा का पुत्र हूँ और आकाश मेरे पिता हैं। अतः आप हमारा सम्यक् पालन-पोषण करें।" मातृभूमि अथवा राष्ट्र एक माँ की तरह ही सम्माननीय होती है। जिस प्रकार जननी के सभी बच्चों में परस्पर भ्रातृत्व एवं स्नेह रहता है, उसी प्रकार सम्पूर्ण मातृभूमि पर बसने वाले करोड़ों पुत्रों अर्थात् देशवासियों में परस्पर भ्रातृत्व की भावना का विकास होना चाहिए। समाज के सर्वश्रेष्ठ विद्वान्-जन समाज की रक्षा करें। इस तरह से नैतिक, विधिक और सामाजिक मूल्यों से युक्त समाज के नागरिकों में व्यास भ्रातृत्व का भाव ही राष्ट्रीय एकता और अखण्डता का आधार हो सकता है। इसी भाव को अन्यत्र भी विवेचित किया गया है- १. अथर्ववेद १२/१/१२ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar