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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 278, कुल 353 में से

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पृष्ठ 278

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250 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता त्वज्जा॒तास्त्वयि॑ चरन्ति॒ मर्त्या॒स्त्वं बिभ॑र्षि द्विपद॒स्त्वं चतु॑ष्पदः। तवे॒मे पृ॑थिवि॒ पञ्च॑ मान॒वा येभ्यो॒ ज्योति॑र॒मृतं॒ मर्त्ये॑भ्य उद्यन्त्सूर्यो॑ र॒श्मिभि॑रा॒तनो॑ति॥१ अर्थात् हम समस्त जीवों को, जिसमें दो पैर और चार पैर वाले सभी प्राणियों का समावेश होता है, इसी भू-माता से उत्पन्न हैं और निरन्तर उनकी गोद में ही विद्यमान रहते हुए ही गतिशील होने में समर्थ हैं। वह ही हमारी पालक माँ है। इसीलिए प्रत्येक राष्ट्रभक्त को अपनी इस माँ के लिए मन में उत्तम विचार ही रखने चाहिए। इसके बिना एक क्षण भी जीवन धारण नहीं कर सकते। प्रत्येक राष्ट्रवासी को इस सत्य को स्वीकार कर लेना चाहिए कि उसके ही पुत्र एवं पुत्री हैं, इस कारण सब राष्ट्रवासी वास्तव में भाई-बहन ही नहीं अपितु सहोदर हैं। सबमें एकता का भाव ही राष्ट्र की एकता और अखण्डता का आधार हो सकता है। मातृभूमि पर कुदृष्टि डालने वाले शत्रुओं की कमी नहीं है। दूषित विचार वाले शत्रु समय-समय पर आक्रमण कर इसके विनष्ट करने में तथा इस पर अधिकार करने की कामना रखते हैं। ऐसे शत्रुओं का संहार करने में राजव्यवस्था, सुरक्षा व्यवस्था को सदैव चौकस रहना चाहिए। वीर राजा और राष्ट्रभक्त सैनिकों के संबल पर ही मातृभूमि स्वतंत्र और अखण्ड बनी रह सकती है। व्याकूतय एषामितार्थो चित्तानि मुह्यत। अथो॒ यदुद्यैषां॑ हृदि॒ तदे॑षां॒ परि॑ निर्जहि॥२ अर्थात् दुष्ट विचार वाले शत्रुओं के विचार हमारे राष्ट्र के लिए प्रतिकूल दिशा में जायें और वे अपने हित के प्रतिकूल चेष्टाएँ करें, जो उनके मन मोहयुक्त हो जावें और जो कुछ आज इनके मन में है वह इनमें पराभूत होने से नाश को प्राप्त हों। शत्रुओं की दुष्प्रवृत्तियों पर स्वमेव अंकुश लग जाना चाहिये। जिस मातृभूमि के लिए राष्ट्रभक्तों की अभेद्य रक्षापंक्ति रक्षा में संलग्न हो उसके शत्रु को उस दिशा में विचार करना भी पाप ही समझा जाय। ऐसे शत्रुओं का सामना करने वाले ऐसे वीरों का राष्ट्र अपनी एकता और अखण्डता के लिए प्रमाण प्रस्तुत करने के लिए विवश नहीं है। अथर्ववेद में प्रस्तुत मंत्रों से इस बात को स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि वैदिक काल से ही अखण्ड भारत की परिकल्पना का जो दृश्य प्रस्तुत किया गया है वह आज भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित है और यह आधार आज भी उतने ही १. अथर्ववेद १२/१/१५ २. अथर्ववेद ३/२/४

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar