वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri षष्ठ अध्याय 251 सुदृढ़ है जितने कि उस काल में वर्णित किये गये हैं। २. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में अथर्ववेद के समाज- दर्शन का अनुशीलन : वैदिक काल में सामाजिक जीवन पूर्ण रूप से नियमबद्ध ढंग से चलता था। व्यक्ति के जीवन का हर पक्ष नैतिकता और धर्म के निश्चित नियमों का पालन करता था। आदर्श समाज की धारणा प्रस्तुत करता था। समाज में लिङ्ग, वर्ण और वर्ग के नाम पर किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं पाया जाता था। सभी का निर्णय नीति के अनुसार ही किया गया था। (क) वर्ण व्यवस्था :- वर्ण व्यवस्था के बारे में कुछ विद्वानों में मतभेद भी पाया जाता है कि उस काल में वर्ण व्यवस्था थी या नहीं, लेकिन ऋग्वेद के पुरुषसूक्त के १०वें मंत्र में चारों वर्णों की उत्पत्ति पुरुष के विभिन्न अंगों से मानी गई है और उसी के अनुरूप कार्य भी प्रदान किये गये थे। वैदिक काल में वर्णों के अस्तित्व को अस्वीकार नहीं किया गया है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सभी की उपस्थिति थी लेकिन इसका वर्गीकरण कर्ममूलक माना गया था जन्ममूलक नहीं। यदि ब्राह्मण को सम्माननीय कार्य व स्थान प्राप्त था तो क्षत्रियों को अपनी क्षमता के अनुरूप, वैश्य को उनकी क्षमता के और शूद्रों को भी उनकी क्षमता के अनुरूप कार्य प्रदान किया गया था और इसका कोई प्रतिबन्ध नहीं था कि ब्राह्मण शस्त्र धारण नहीं करता था, क्षत्रिय वाणिज्यक कार्य नहीं कर सकता था। शूद्र का कार्य निकृष्ट है, ऐसी कोई भावना उस काल में नहीं पाई जाती थी। शूद्रों का कार्य आज के अकुशल कर्मकार की श्रेणी में आता है। इनको समाज में सभी वर्णों की भाँति समकक्ष स्थान प्राप्त था। इसको अथर्ववेद के इस क्षेत्र मंत्र के द्वारा समझा जा सकता है- प्रि॒यं मां कृणु दे॒वेषु॑ प्रि॒यं राज॑सु मा कृणु। प्रि॒यं सर्व॑स्य॒ पश्य॑त॒ उत शू॒द्र उ॒तार्ये॑॥१ उस काल में शूद्र या वर्ण के लिये कोई निम्न स्थान निश्चित नहीं था बल्कि सभी को समाज में समान सम्मान प्राप्त था। (ख) आश्रम व्यवस्था :- वैदिक काल में शतायु मानव की कल्पना की जाती थी और वास्तव में वह शतायु होता था। धर्म और नीति के साथ जीवन व्यतीत करते १. अथर्ववेद १९/६२/१ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar