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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 280, कुल 353 में से

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पृष्ठ 280

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252 वैदिक वाङ्गमय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता हुए वह अपने जीवन को चार चरणों में बाँट देता था और हर चरण के लिये पृथक्- पृथक् आचार, विचार और नियमों का निर्माण किया गया था। जीवन प्रारम्भ के साथ ही ब्रह्मचर्य आश्रम आरम्भ होता था और उसका २५ वर्ष की आयु तक चलने का प्राविधान था, जिसमें वह ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए विद्याध्ययन के लिए गुरु के समक्ष रहता था और विद्या ग्रहण करता था- ब्रह्म॒चारी॑ष्णंश्च॑रति॒ रोद॑सी उ॒भे तस्मि॑न् दे॒वाः संम॑नसो भवन्ति। स दा॑धार पृथि॒वीं दिवं॑ च॒ स आ॒चार्य॑ं१ तप॑सा पिपर्ति॥१ अर्थात् वेद के अध्ययन में दृढ़, ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला ब्रह्मचारी, पृथिवी, माता-पिता, दोनों का अनुकरण करता हुआ अथवा अपने आचरण से दोनों का प्रिय होते हुए और स्वयं उनको प्रेम करते हुए इस पृथिवी पर विचरण करता है। उसमें समस्त देव, विद्वान् और राजा आदि एक चित्त हो जाते हैं। वह पृथिवी, माता-पिता, सूर्य, विद्या और गुरु सभी को धारण करता है। वह अपने तप से आचार्य की आज्ञाओं का पूर्ण पालन करता है। अर्थात् वह आचार्य की त्रुटियों को भी पूर्ण करता है। ब्रह्मचर्य की आयु के पश्चात् गृहस्थाश्रम का काल आरम्भ हो जाता है। यह आश्रम जीवन में बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है क्योंकि लौकिक जीवन के सभी कर्त्तव्यों का आरम्भ और अन्त इसी आश्रम में है। ब्रह्मचारी तथा ब्रह्मचारिणी विवाह करके गृहस्थाश्रम में प्रवेश कर जिन दायित्वों को पूरा करने के लिए आदेशित किये गये हैं वह निम्न मंत्र में उल्लिखित है- सम॑स्मिँल्लो॒के स॒मु दे॑व॒याने॒ सं स्मा॑ सु॒मेतं॑ यम॒राज्ये॑षु। पू॒तौ प॒वित्रे॑रु॒प तद्व॑ध॑येथां॒ यद्यु॒द् रेतो॒ अधि॑ वां संब॒भूव॑॥२ अर्थात् "हे पति-पत्नी! तुम दोनों इस लोक में सदा एक साथ समान भाव से रहो! देव परमेश्वर की उपासना या मोक्ष मार्ग की साधना में भी सदा दोनों एकत्र रहो और निरन्तर साथ रहते हुए यम, नियन्ता तथा राम के समस्त राज्य के कार्यों अथवा यम गार्हपत्य के समस्त कार्यों में या परमात्मा के समस्त उपासना आदि कार्यों में, गृहस्थ के समस्त कार्यों में तुम दोनों समान भाव से एकत्र रहो। पुत्र उत्पत्ति होने पर उसे शुभ संस्कारों में पुष्ट करके, उसमें उत्तम संस्कारों को समावेशित करके, उसे शुभ गुणों से युक्त मानव बनाओ।" १. अथर्ववेद ११/७/१ २. अथर्ववेद १२/३/३

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar