वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 281, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri षष्ठ अध्याय 253 इस गृहस्थाश्रम में ही व्यक्ति देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण को पूर्ण करता है। धर्म का पालन करते हुए सभी एषणाओं की पूर्ति करनी चाहिए। धार्मिक कृत्यों, अनुष्ठानों, यज्ञ आदि कर्म को भी सपत्नीक पूर्ण करना चाहिए। इसमें ही गृहस्थ धर्म की पूर्णता है। गृहस्थाश्रम के सभी दायित्वों के पूर्ण होने पर वानप्रस्थाश्रम में प्रवेश करने की व्यवस्था है। वानप्रस्थाश्रम में मनुष्य सभी, इच्छाओं की पूर्ति के बाद प्रवेश करता है। इस आश्रम में वह घर के वरिष्ठ होने के नाते अपने संरक्षण में पुत्रों को गृहस्थाश्रम में प्रवेश कराते हैं और स्वयं सपत्नीक अपना समय पूजा-पाठ आदि में घर में रहकर ही व्यतीत करते हैं। वानप्रस्थाश्रम गृह-निवास की अनुमति प्रदान करता है। वानप्रस्थाश्रम की अवधि पूर्ण होने पर व्यक्ति सांसारिक मोह-माया से पूरी तरह मुक्त हो जाता है और संन्यास आश्रम में प्रवेश करके वह गृह एवं पत्नी, पुत्र आदि सभी को त्याग देता है तथा मोक्ष प्राप्ति के लिए ईश्वर आराधना, यज्ञ, जप, तप आदि में लीन हो जाता है। (ग) पुरुषार्थ - मनुष्य के लिए वैदिक काल में कार्य और कर्म भी निश्चित कर दिये गये थे। यही मानव जीवन के आधार थे। इन्हीं के अनुसार उसे सम्पूर्ण कार्य करने थे। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष— यह चार पुरुषार्थ चतुष्टय कहलाते थे। यह व्यक्ति के लिए जीवनधर्म थे। धर्म का अनुपालन व्यक्ति को जन्म से लेकर मृत्यु तक पूरे काल में करना होता था। उस काल में धर्म ही व्यक्ति को जीवन के अन्तिम लक्ष्य तक पहुँचाता था। शेष पुरुषार्थों की पूर्ति भी वह धर्म के अनुसार ही करता था। अर्थ से वह अपने गृहस्थाश्रम की आवश्यकताओं की पूर्ति करता था और इसको अर्जित करने के लिए भी ईमानदारी और सत्य का अनुसरण करते हुए ही प्रयास करता था ताकि वह धर्मपूर्ण धनोपार्जन कहला सके। अच्छे साधनों से अर्जित किये हुए धन से ही दान, यज्ञ आदि कार्य पूर्ण व सफल हो सकते थे। इनकी सार्थकता के लिए ही धर्म का अनुपालन आवश्यक है। काम पुरुषार्थ की पूर्ति के लिए वह गृहस्थाश्रम में प्रवेश करता है और सपत्नीक सन्तानोत्पत्ति, माता-पिता की सेवा, यज्ञ, दान, तप आदि कार्यों को पूर्ण करता है। यहाँ पर काम का सेवन अपनी वासनापूर्ति के उद्देश्य से नहीं किया जाता है। यह इसलिए पूर्ण किया जाता है कि उसे विवाह संस्कार के नियमों को पूर्ण करना है। सृष्टि के नियमानुसार उसकी उत्पत्ति में अपना अंशदान सृष्टि (सन्तति) करके करना है और अपने पितृ ऋण से उऋण होना है। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar