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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 282

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 254 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता मोक्ष पुरुषार्थ जीवन का अन्तिम लक्ष्य है और इसके लिए व्यक्ति को पहले सारे पुरुषार्थ धर्मानुसार पूर्ण करते हुये जीवन की लोकेषणा, वित्तेषणा और पुत्रेषणा से मुक्त होकर ही वह पहले वानप्रस्थ आश्रम और उसके बाद संन्यास आश्रम में प्रवेश करके अपना शेष समय ईश-आराधना, जप, तप और यज्ञ आदि में व्यतीत करते हुए मोक्ष की प्राप्ति के लिए प्रयास करता है। (घ) नारी स्थिति - वेदकालीन समाज पितृमूलक समाज था लेकिन स्त्रियों की स्थिति में कहीं भी निम्नता का भाव प्रदर्शित नहीं होता था। स्त्रियों को भी पुरुषों की भाँति ब्रह्मचारिणी रहते हुए शिक्षा प्राप्त करने का पूर्ण अधिकार प्राप्त था। उसी को सरसता की प्रतिमूर्ति समझी जाता था। वह मात्र गृहस्थी की ही स्वामिनी नहीं थी अपितु अपने पति पर भी उसका पूर्ण स्वामित्व माना जाता था। गृहलक्ष्मी के रूप में उसका सर्वदा सम्मान था और हर कार्य में उसकी सम्मति ली जाती थी। आर्य नारियों में नैतिकता पूर्णतः विद्यमान थी। वे शोभन, आचरण तथा सदाचार के लिए सर्वथा प्रसिद्ध थी। धार्मिक कृत्यों में नारी का विशिष्ट स्थान था। पुरुष धार्मिक कृत्यों को पत्नी के बिना पूर्ण नहीं कर सकता था। निष्कर्ष यह है कि नारी का उदात्त चरित्र, नैतिक-आदर्श, शिक्षण-योग्यता तथा सामाजिक सहयोग की दृष्टि से उपनिषद्-युग अपने पूर्ववर्ती संहिता-युग से विशेष दूर नहीं था। पूर्ववर्ती युगों का 'आदर्श-नारी-जीवन' उसी प्रकार काम्य और कमनीय था। उपनिषदों के इतिहास में नारी चिरस्मरणीय रहेगी। (ङ) विवाह प्रथा - वैदिक काल में आदर्श विवाह प्रथा प्रचलित थी जहाँ स्त्री एवं पुरुष दोनों को ही समान स्थान प्राप्त था। वहाँ पर विवाह संस्कार में भी दोनों को वर या वधू चुनने का अधिकार भी प्राप्त था। बाल-विवाह जैसी प्रथा उस समय विद्यमान न थी। कन्या द्वारा पूर्ण यौवन प्राप्त करने के बाद ही विवाह सम्पन्न होता था। अथर्ववेद में विवाह के बारे में विशद् वर्णन किया गया है जिससे कि प्रकट होता है कि इस संस्कार में पिता, वर, वधू को किन-किन दायित्वों को पूर्ण करना पड़ता था और उनसे क्या अपेक्षाएँ की जाती थीं। इस बारे में इस मंत्र के द्वारा जाना जा सकता है कि विवाह के लिए पुरुष की योग्यता को कैसे मापा जा सकता था और नियंत्रित किया जाता था- उ॒द्य॑च्छ॒ध्वमप॑ रक्षो॑ हना॒त्ये॒मां नारीं॑ सु॒कृते॒ दधा॑त। धा॒ता वि॑पु॒श्चित्पति॑म॒स्यै वि॑वेदु॒ भगो॒ राजा॑ पु॒र ए॑तु प्रजान॒न्॥१ १. अथर्ववेद १४/१/५९ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar