वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri षष्ठ अध्याय 249 अर्थात् मातृभूमि के आदर्श भक्तों में कुछ गुणों का होना अत्यन्त आवश्यक है। जिस राष्ट्र में देशभक्त, सत्यनिष्ठ, प्रचण्ड, क्षात्रतेज, धर्मानुष्ठान एवं कर्तव्यपालन के गुण से युक्त प्रत्येक शुभ कार्य को दक्षतापूर्वक सम्पन्न करते हैं तथा यथार्थ ज्ञान के प्रति समर्पण की भावना रखते हैं, मातृभूमि (राष्ट्र) के पालन-पोषण करने में समर्थ होते हैं, वे ही अपना भूत, वर्तमान और भविष्य में सब तरह से पोषित करने वाली मातृभूमि की रक्षा करके, उसकी उन्नति के विस्तृत स्थान एवं अवसर प्रदान करें। इन गुणों से ही राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता को सबल आधार प्राप्त होता है। इन गुणों से युक्त राष्ट्रभक्तों पर राष्ट्र गर्व करता है और ऐसे राष्ट्रभक्तों से युक्त राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता की ओर शत्रु दृष्टिपात भी नहीं कर सकता है। राष्ट्र को, मातृभूमि को, अपनी माता ही माना जाता है और जन्मदात्री माँ से मातृभूमि अधिक सम्मान और त्याग की अधिकारिणी होती है। राष्ट्रभक्तों के लिए जन्मदात्री माँ सबके लिए अपनी होती है लेकिन मातृभूमि एक है और उसके करोड़ों पुत्र हों तो ऐसी माँ के लिए गर्व का विषय अवश्य ही होगा। उसकी उन्नति, समृद्धि एवं रक्षा की उदात्त भावना राष्ट्र-भक्तों में पाया जाना स्वाभाविक है- यत् ते॒ मध्यं॑ पृथि॒वि॒ यच्च॒ नभ्यं॒ यास्त॒ ऊर्ज॑स्त॒न्वः॑ संब॒भूवुः॑। तासु॑ नो धेह्य॒भि नः॑ पवस्व मा॒ता भूमिः॑ पु॒त्रो अ॒हं पृ॑थि॒व्याः। प॒र्जन्यः॑ पि॒ता स उ॑ नः पिपर्तु॥१ अर्थात् इसमें मातृभूमि से राष्ट्रभक्तों द्वारा प्रार्थना की गई है कि "हे मातृभूमि! हमें अपने विद्वान् पुत्रों को जो कि ज्ञान से परिपूर्ण हैं और इस पृथिवी का केन्द्र हैं, उनके संरक्षण में हमें देकर हमारी रक्षा कीजिए और उनसे ज्ञान प्राप्त करने का अवसर प्रदान कीजिए। हे मातृभूमि! मैं धरा का पुत्र हूँ और आकाश मेरे पिता हैं। अतः आप हमारा सम्यक् पालन-पोषण करें।" मातृभूमि अथवा राष्ट्र एक माँ की तरह ही सम्माननीय होती है। जिस प्रकार जननी के सभी बच्चों में परस्पर भ्रातृत्व एवं स्नेह रहता है, उसी प्रकार सम्पूर्ण मातृभूमि पर बसने वाले करोड़ों पुत्रों अर्थात् देशवासियों में परस्पर भ्रातृत्व की भावना का विकास होना चाहिए। समाज के सर्वश्रेष्ठ विद्वान्-जन समाज की रक्षा करें। इस तरह से नैतिक, विधिक और सामाजिक मूल्यों से युक्त समाज के नागरिकों में व्यास भ्रातृत्व का भाव ही राष्ट्रीय एकता और अखण्डता का आधार हो सकता है। इसी भाव को अन्यत्र भी विवेचित किया गया है- १. अथर्ववेद १२/१/१२ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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250 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता त्वज्जा॒तास्त्वयि॑ चरन्ति॒ मर्त्या॒स्त्वं बिभ॑र्षि द्विपद॒स्त्वं चतु॑ष्पदः। तवे॒मे पृ॑थिवि॒ पञ्च॑ मान॒वा येभ्यो॒ ज्योति॑र॒मृतं॒ मर्त्ये॑भ्य उद्यन्त्सूर्यो॑ र॒श्मिभि॑रा॒तनो॑ति॥१ अर्थात् हम समस्त जीवों को, जिसमें दो पैर और चार पैर वाले सभी प्राणियों का समावेश होता है, इसी भू-माता से उत्पन्न हैं और निरन्तर उनकी गोद में ही विद्यमान रहते हुए ही गतिशील होने में समर्थ हैं। वह ही हमारी पालक माँ है। इसीलिए प्रत्येक राष्ट्रभक्त को अपनी इस माँ के लिए मन में उत्तम विचार ही रखने चाहिए। इसके बिना एक क्षण भी जीवन धारण नहीं कर सकते। प्रत्येक राष्ट्रवासी को इस सत्य को स्वीकार कर लेना चाहिए कि उसके ही पुत्र एवं पुत्री हैं, इस कारण सब राष्ट्रवासी वास्तव में भाई-बहन ही नहीं अपितु सहोदर हैं। सबमें एकता का भाव ही राष्ट्र की एकता और अखण्डता का आधार हो सकता है। मातृभूमि पर कुदृष्टि डालने वाले शत्रुओं की कमी नहीं है। दूषित विचार वाले शत्रु समय-समय पर आक्रमण कर इसके विनष्ट करने में तथा इस पर अधिकार करने की कामना रखते हैं। ऐसे शत्रुओं का संहार करने में राजव्यवस्था, सुरक्षा व्यवस्था को सदैव चौकस रहना चाहिए। वीर राजा और राष्ट्रभक्त सैनिकों के संबल पर ही मातृभूमि स्वतंत्र और अखण्ड बनी रह सकती है। व्याकूतय एषामितार्थो चित्तानि मुह्यत। अथो॒ यदुद्यैषां॑ हृदि॒ तदे॑षां॒ परि॑ निर्जहि॥२ अर्थात् दुष्ट विचार वाले शत्रुओं के विचार हमारे राष्ट्र के लिए प्रतिकूल दिशा में जायें और वे अपने हित के प्रतिकूल चेष्टाएँ करें, जो उनके मन मोहयुक्त हो जावें और जो कुछ आज इनके मन में है वह इनमें पराभूत होने से नाश को प्राप्त हों। शत्रुओं की दुष्प्रवृत्तियों पर स्वमेव अंकुश लग जाना चाहिये। जिस मातृभूमि के लिए राष्ट्रभक्तों की अभेद्य रक्षापंक्ति रक्षा में संलग्न हो उसके शत्रु को उस दिशा में विचार करना भी पाप ही समझा जाय। ऐसे शत्रुओं का सामना करने वाले ऐसे वीरों का राष्ट्र अपनी एकता और अखण्डता के लिए प्रमाण प्रस्तुत करने के लिए विवश नहीं है। अथर्ववेद में प्रस्तुत मंत्रों से इस बात को स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि वैदिक काल से ही अखण्ड भारत की परिकल्पना का जो दृश्य प्रस्तुत किया गया है वह आज भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित है और यह आधार आज भी उतने ही १. अथर्ववेद १२/१/१५ २. अथर्ववेद ३/२/४
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri षष्ठ अध्याय 251 सुदृढ़ है जितने कि उस काल में वर्णित किये गये हैं। २. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में अथर्ववेद के समाज- दर्शन का अनुशीलन : वैदिक काल में सामाजिक जीवन पूर्ण रूप से नियमबद्ध ढंग से चलता था। व्यक्ति के जीवन का हर पक्ष नैतिकता और धर्म के निश्चित नियमों का पालन करता था। आदर्श समाज की धारणा प्रस्तुत करता था। समाज में लिङ्ग, वर्ण और वर्ग के नाम पर किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं पाया जाता था। सभी का निर्णय नीति के अनुसार ही किया गया था। (क) वर्ण व्यवस्था :- वर्ण व्यवस्था के बारे में कुछ विद्वानों में मतभेद भी पाया जाता है कि उस काल में वर्ण व्यवस्था थी या नहीं, लेकिन ऋग्वेद के पुरुषसूक्त के १०वें मंत्र में चारों वर्णों की उत्पत्ति पुरुष के विभिन्न अंगों से मानी गई है और उसी के अनुरूप कार्य भी प्रदान किये गये थे। वैदिक काल में वर्णों के अस्तित्व को अस्वीकार नहीं किया गया है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सभी की उपस्थिति थी लेकिन इसका वर्गीकरण कर्ममूलक माना गया था जन्ममूलक नहीं। यदि ब्राह्मण को सम्माननीय कार्य व स्थान प्राप्त था तो क्षत्रियों को अपनी क्षमता के अनुरूप, वैश्य को उनकी क्षमता के और शूद्रों को भी उनकी क्षमता के अनुरूप कार्य प्रदान किया गया था और इसका कोई प्रतिबन्ध नहीं था कि ब्राह्मण शस्त्र धारण नहीं करता था, क्षत्रिय वाणिज्यक कार्य नहीं कर सकता था। शूद्र का कार्य निकृष्ट है, ऐसी कोई भावना उस काल में नहीं पाई जाती थी। शूद्रों का कार्य आज के अकुशल कर्मकार की श्रेणी में आता है। इनको समाज में सभी वर्णों की भाँति समकक्ष स्थान प्राप्त था। इसको अथर्ववेद के इस क्षेत्र मंत्र के द्वारा समझा जा सकता है- प्रि॒यं मां कृणु दे॒वेषु॑ प्रि॒यं राज॑सु मा कृणु। प्रि॒यं सर्व॑स्य॒ पश्य॑त॒ उत शू॒द्र उ॒तार्ये॑॥१ उस काल में शूद्र या वर्ण के लिये कोई निम्न स्थान निश्चित नहीं था बल्कि सभी को समाज में समान सम्मान प्राप्त था। (ख) आश्रम व्यवस्था :- वैदिक काल में शतायु मानव की कल्पना की जाती थी और वास्तव में वह शतायु होता था। धर्म और नीति के साथ जीवन व्यतीत करते १. अथर्ववेद १९/६२/१ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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252 वैदिक वाङ्गमय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता हुए वह अपने जीवन को चार चरणों में बाँट देता था और हर चरण के लिये पृथक्- पृथक् आचार, विचार और नियमों का निर्माण किया गया था। जीवन प्रारम्भ के साथ ही ब्रह्मचर्य आश्रम आरम्भ होता था और उसका २५ वर्ष की आयु तक चलने का प्राविधान था, जिसमें वह ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए विद्याध्ययन के लिए गुरु के समक्ष रहता था और विद्या ग्रहण करता था- ब्रह्म॒चारी॑ष्णंश्च॑रति॒ रोद॑सी उ॒भे तस्मि॑न् दे॒वाः संम॑नसो भवन्ति। स दा॑धार पृथि॒वीं दिवं॑ च॒ स आ॒चार्य॑ं१ तप॑सा पिपर्ति॥१ अर्थात् वेद के अध्ययन में दृढ़, ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला ब्रह्मचारी, पृथिवी, माता-पिता, दोनों का अनुकरण करता हुआ अथवा अपने आचरण से दोनों का प्रिय होते हुए और स्वयं उनको प्रेम करते हुए इस पृथिवी पर विचरण करता है। उसमें समस्त देव, विद्वान् और राजा आदि एक चित्त हो जाते हैं। वह पृथिवी, माता-पिता, सूर्य, विद्या और गुरु सभी को धारण करता है। वह अपने तप से आचार्य की आज्ञाओं का पूर्ण पालन करता है। अर्थात् वह आचार्य की त्रुटियों को भी पूर्ण करता है। ब्रह्मचर्य की आयु के पश्चात् गृहस्थाश्रम का काल आरम्भ हो जाता है। यह आश्रम जीवन में बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है क्योंकि लौकिक जीवन के सभी कर्त्तव्यों का आरम्भ और अन्त इसी आश्रम में है। ब्रह्मचारी तथा ब्रह्मचारिणी विवाह करके गृहस्थाश्रम में प्रवेश कर जिन दायित्वों को पूरा करने के लिए आदेशित किये गये हैं वह निम्न मंत्र में उल्लिखित है- सम॑स्मिँल्लो॒के स॒मु दे॑व॒याने॒ सं स्मा॑ सु॒मेतं॑ यम॒राज्ये॑षु। पू॒तौ प॒वित्रे॑रु॒प तद्व॑ध॑येथां॒ यद्यु॒द् रेतो॒ अधि॑ वां संब॒भूव॑॥२ अर्थात् "हे पति-पत्नी! तुम दोनों इस लोक में सदा एक साथ समान भाव से रहो! देव परमेश्वर की उपासना या मोक्ष मार्ग की साधना में भी सदा दोनों एकत्र रहो और निरन्तर साथ रहते हुए यम, नियन्ता तथा राम के समस्त राज्य के कार्यों अथवा यम गार्हपत्य के समस्त कार्यों में या परमात्मा के समस्त उपासना आदि कार्यों में, गृहस्थ के समस्त कार्यों में तुम दोनों समान भाव से एकत्र रहो। पुत्र उत्पत्ति होने पर उसे शुभ संस्कारों में पुष्ट करके, उसमें उत्तम संस्कारों को समावेशित करके, उसे शुभ गुणों से युक्त मानव बनाओ।" १. अथर्ववेद ११/७/१ २. अथर्ववेद १२/३/३
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri षष्ठ अध्याय 253 इस गृहस्थाश्रम में ही व्यक्ति देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण को पूर्ण करता है। धर्म का पालन करते हुए सभी एषणाओं की पूर्ति करनी चाहिए। धार्मिक कृत्यों, अनुष्ठानों, यज्ञ आदि कर्म को भी सपत्नीक पूर्ण करना चाहिए। इसमें ही गृहस्थ धर्म की पूर्णता है। गृहस्थाश्रम के सभी दायित्वों के पूर्ण होने पर वानप्रस्थाश्रम में प्रवेश करने की व्यवस्था है। वानप्रस्थाश्रम में मनुष्य सभी, इच्छाओं की पूर्ति के बाद प्रवेश करता है। इस आश्रम में वह घर के वरिष्ठ होने के नाते अपने संरक्षण में पुत्रों को गृहस्थाश्रम में प्रवेश कराते हैं और स्वयं सपत्नीक अपना समय पूजा-पाठ आदि में घर में रहकर ही व्यतीत करते हैं। वानप्रस्थाश्रम गृह-निवास की अनुमति प्रदान करता है। वानप्रस्थाश्रम की अवधि पूर्ण होने पर व्यक्ति सांसारिक मोह-माया से पूरी तरह मुक्त हो जाता है और संन्यास आश्रम में प्रवेश करके वह गृह एवं पत्नी, पुत्र आदि सभी को त्याग देता है तथा मोक्ष प्राप्ति के लिए ईश्वर आराधना, यज्ञ, जप, तप आदि में लीन हो जाता है। (ग) पुरुषार्थ - मनुष्य के लिए वैदिक काल में कार्य और कर्म भी निश्चित कर दिये गये थे। यही मानव जीवन के आधार थे। इन्हीं के अनुसार उसे सम्पूर्ण कार्य करने थे। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष— यह चार पुरुषार्थ चतुष्टय कहलाते थे। यह व्यक्ति के लिए जीवनधर्म थे। धर्म का अनुपालन व्यक्ति को जन्म से लेकर मृत्यु तक पूरे काल में करना होता था। उस काल में धर्म ही व्यक्ति को जीवन के अन्तिम लक्ष्य तक पहुँचाता था। शेष पुरुषार्थों की पूर्ति भी वह धर्म के अनुसार ही करता था। अर्थ से वह अपने गृहस्थाश्रम की आवश्यकताओं की पूर्ति करता था और इसको अर्जित करने के लिए भी ईमानदारी और सत्य का अनुसरण करते हुए ही प्रयास करता था ताकि वह धर्मपूर्ण धनोपार्जन कहला सके। अच्छे साधनों से अर्जित किये हुए धन से ही दान, यज्ञ आदि कार्य पूर्ण व सफल हो सकते थे। इनकी सार्थकता के लिए ही धर्म का अनुपालन आवश्यक है। काम पुरुषार्थ की पूर्ति के लिए वह गृहस्थाश्रम में प्रवेश करता है और सपत्नीक सन्तानोत्पत्ति, माता-पिता की सेवा, यज्ञ, दान, तप आदि कार्यों को पूर्ण करता है। यहाँ पर काम का सेवन अपनी वासनापूर्ति के उद्देश्य से नहीं किया जाता है। यह इसलिए पूर्ण किया जाता है कि उसे विवाह संस्कार के नियमों को पूर्ण करना है। सृष्टि के नियमानुसार उसकी उत्पत्ति में अपना अंशदान सृष्टि (सन्तति) करके करना है और अपने पितृ ऋण से उऋण होना है। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 254 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता मोक्ष पुरुषार्थ जीवन का अन्तिम लक्ष्य है और इसके लिए व्यक्ति को पहले सारे पुरुषार्थ धर्मानुसार पूर्ण करते हुये जीवन की लोकेषणा, वित्तेषणा और पुत्रेषणा से मुक्त होकर ही वह पहले वानप्रस्थ आश्रम और उसके बाद संन्यास आश्रम में प्रवेश करके अपना शेष समय ईश-आराधना, जप, तप और यज्ञ आदि में व्यतीत करते हुए मोक्ष की प्राप्ति के लिए प्रयास करता है। (घ) नारी स्थिति - वेदकालीन समाज पितृमूलक समाज था लेकिन स्त्रियों की स्थिति में कहीं भी निम्नता का भाव प्रदर्शित नहीं होता था। स्त्रियों को भी पुरुषों की भाँति ब्रह्मचारिणी रहते हुए शिक्षा प्राप्त करने का पूर्ण अधिकार प्राप्त था। उसी को सरसता की प्रतिमूर्ति समझी जाता था। वह मात्र गृहस्थी की ही स्वामिनी नहीं थी अपितु अपने पति पर भी उसका पूर्ण स्वामित्व माना जाता था। गृहलक्ष्मी के रूप में उसका सर्वदा सम्मान था और हर कार्य में उसकी सम्मति ली जाती थी। आर्य नारियों में नैतिकता पूर्णतः विद्यमान थी। वे शोभन, आचरण तथा सदाचार के लिए सर्वथा प्रसिद्ध थी। धार्मिक कृत्यों में नारी का विशिष्ट स्थान था। पुरुष धार्मिक कृत्यों को पत्नी के बिना पूर्ण नहीं कर सकता था। निष्कर्ष यह है कि नारी का उदात्त चरित्र, नैतिक-आदर्श, शिक्षण-योग्यता तथा सामाजिक सहयोग की दृष्टि से उपनिषद्-युग अपने पूर्ववर्ती संहिता-युग से विशेष दूर नहीं था। पूर्ववर्ती युगों का 'आदर्श-नारी-जीवन' उसी प्रकार काम्य और कमनीय था। उपनिषदों के इतिहास में नारी चिरस्मरणीय रहेगी। (ङ) विवाह प्रथा - वैदिक काल में आदर्श विवाह प्रथा प्रचलित थी जहाँ स्त्री एवं पुरुष दोनों को ही समान स्थान प्राप्त था। वहाँ पर विवाह संस्कार में भी दोनों को वर या वधू चुनने का अधिकार भी प्राप्त था। बाल-विवाह जैसी प्रथा उस समय विद्यमान न थी। कन्या द्वारा पूर्ण यौवन प्राप्त करने के बाद ही विवाह सम्पन्न होता था। अथर्ववेद में विवाह के बारे में विशद् वर्णन किया गया है जिससे कि प्रकट होता है कि इस संस्कार में पिता, वर, वधू को किन-किन दायित्वों को पूर्ण करना पड़ता था और उनसे क्या अपेक्षाएँ की जाती थीं। इस बारे में इस मंत्र के द्वारा जाना जा सकता है कि विवाह के लिए पुरुष की योग्यता को कैसे मापा जा सकता था और नियंत्रित किया जाता था- उ॒द्य॑च्छ॒ध्वमप॑ रक्षो॑ हना॒त्ये॒मां नारीं॑ सु॒कृते॒ दधा॑त। धा॒ता वि॑पु॒श्चित्पति॑म॒स्यै वि॑वेदु॒ भगो॒ राजा॑ पु॒र ए॑तु प्रजान॒न्॥१ १. अथर्ववेद १४/१/५९ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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षष्ठ अध्याय 255 अर्थात् "हे वीर पुरुषों! अपने शस्त्रों को उठाओं और राक्षसी-प्रवृत्ति वाले दुष्ट पुरुष को मार भगाओं। इस नारी को पुण्य कार्य या पुण्य पुरुष के हाथ धारण कराओं। ज्ञानवान्, बुद्धिमान्, विधाता, पिता इसके योग्य पति को खोज कर प्राप्त करें। ऐश्वर्यवान् चित्त को अनुरंजन करने में समर्थ ज्ञानी पुरुष कन्या का पाणिग्रहण करने के लिए आगे आयें।" इस प्रकार अयोग्य वर को कन्या प्रदान करने के लिए विधान न था। कन्यायें भी विदुषी होती थी और उपयुक्त योग्य वर की अपेक्षा भी रखती थी। अथर्ववेद में विधवा विवाह का उल्लेख भी प्राप्त होता है। कहा गया है कि जब स्त्री एक पति के पश्चात् दूसरे पति को प्राप्त होती है और वे दोनों पञ्चौदन अग्नि में डालते हैं, तो उनका वियोग नहीं होता। यदि दूसरा पति अग्नि में अन्न पञ्चौदन डालता है, तो वह अपनी पुनर्विवाहिता पत्नी के साथ समान लोक में रहता है- या पू॒र्वं पतिं॑ वित्त्वाथा॒न्यं वि॒न्दतेऽप॑रम्। पञ्चौ॑दनं च॒ ताव॒जं ददा॑तो॒ न वि यौ॑षतः॥ स॒मा॒नलो॑को भवति पु॒नर्भुवाप॑रः॒ पति॑ः। यो॒ऽजं पञ्चौ॑दनं दक्षि॑णाज्योति॒षं ददा॑ति॥१ इन उल्लेखों से विधवा विवाह की स्थिति स्पष्ट हो जाती है। ३. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में अथर्ववेद के राजदर्शन का अनुशीलन : राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में राजदर्शन महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है क्योंकि राजनीतिक व्यवस्था से ही राष्ट्रीय एकता और अखण्डता का सीधा सम्बन्ध स्थापित होता है। योग्य राजा और चरित्रवान् तथा धर्मपरायण प्रजा ही किसी राष्ट्र की सम्पत्ति होती है। राजा का निर्वाचन उसके गुणों और वीरता के अनुसार ही किया जाता था। अथर्ववेद में सूक्त (७/८७-८८) ही राजा के निर्वाचन के लिए प्रयुक्त हुआ है। इस मंत्र में राजपद के निर्माण की स्पष्ट घोषणा की गई है- ध्रु॒वोऽच्यु॑तः॒ प्र मृ॑णीहि॒ शत्रूं॒ञ्छत्रूय॒तोऽध॑रान् पादयस्व। सर्वा॒ दिशः॒ संम॑नसः स॒ध्रीची॑र्ध्रु॒वाय॑ ते॒ समि॑तिः कल्पतामि॒ह॥२
१. अथर्ववेद ९/५/२७-२८ २. अथर्ववेद ६/८८/३
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256 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अपने कर्तव्य से च्युत हो जाने पर राजा को उसके पद से च्युत कर दिया जाता था और अपने दोषों की स्वीकारोक्ति के पश्चात् उसे पुनः राजा चुन लिया जाता था। इस पुनःस्थापना तथा प्रजा द्वारा संवरण का उल्लेख अथर्ववेद के दो सूक्तों में (३/३; ३/४) में विशद रूप से किया गया है। विश् के द्वारा संवरण का निर्देश यह मंत्र स्पष्ट करता है— त्वां विशो॑ वृणतां राज्या॒य त्वामि॒माः प्र॒दिशः॒ पञ्च॑ दे॒वीः। वर्ष्म॑न् राष्ट्रस्य॑ क॒कुदि॑ श्रयस्व॒ ततो॑ न उ॒ग्रो वि भ॑जा॒ वसू॑नि॥१ श्रेष्ठ राजा भी मानव ही है और उसकी कुछ त्रुटियों से क्षुब्ध होकर यदि पदच्युत किया जाता है तो प्रायश्चित के बाद उसको क्षमा भी किया जा सकता है। एक वीर राजा के बारे में जो अपेक्षायें की जाती हैं, वह इस मंत्र द्वारा प्रदर्शित की जा रही है— अ॒यं मे॑ व॒रणो म॒णिः सं॒पत्लुक्ष्य॑णो वृषा॑। तेना र॑भस्व॒ त्वं शत्रून् प्र मृ॑णीहि दुर॒स्यतः॥२ अर्थात् "हम सबमें मुख्य रूप से चयन करने योग्य श्रेष्ठतम व्यक्तियों, जो कि अपनी अपरिमित शक्ति द्वारा शत्रुओं का नाश करने में सक्षम हो, राजतिलक द्वारा अभिषेक करके प्रमुख नेता का चयन करते हैं। वह सब सुखों की वर्षा करने वाला, शकट का भार उठाने में समर्थ, बलवान् और शत्रुओं का नाशक है। हे राष्ट्रपते! ऐसे पुरुष के बल पर तू शत्रुओं का विनाश कर या पकड़ कर दुष्ट कामना करने वालों का दिनष्ट कर।" ऐसे राजा के नेतृत्व में चलने वाला शासन ही प्रजा को संतुष्ट करने में सक्षम होता है और राष्ट्रवासियों को अपनी सुरक्षा का विश्वास होता है। तब राष्ट्र स्वतः मजबूत होता है। इन्द्र॑श्च सोमं॑ पिबतं बृहस्पते॒ऽस्मिन् य॒ज्ञे म॑न्दसा॒ना वृ॑षण्वसू। आ वां॑ विश॒न्त्विन्द॑वः स्वा॒भुवो॒ऽस्मे र॒यिं सर्व॑वीरं॒ नि य॑च्छतम्॥३ अर्थात् "हे वेदवाणी के पालक एवं बृहत् राष्ट्र के पालक एवं विद्वान् राजन् ! हे इन्द्र! सेनापते! आप दोनों धनों, ऐश्वर्यों की वर्षा करने वाले हों। आप दोनों इस महान् यज्ञ, राष्ट्र की व्यवस्था के कार्य में अतिव्यग्र रहते हुए राज्यपद का उपभोग करें। १. अथर्ववेद ३/४/२ २. अथर्ववेद १०/३१ ३. अथर्ववेद २०/१३/१
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षष्ठ अध्याय 257
उत्तम रीति से, धर्मानुकूल, सब प्रकार से होने वाले उत्तम ऐश्वर्य तुम दोनों को प्राप्त हों। आप दोनों हम राष्ट्रवासियों को समस्त वीर पुरुषों सहित या सर्व सामर्थ्य से युक्त ऐश्वर्य को प्रदान कीजिए।'' वृषा॑ यू॒थेव॒ वंस॑गः कृ॒ष्टीरि॒यत्योज॑सा। ईशा॑नो॒ अप्र॑तिष्कुतः॥१ अर्थात् गोयूथ में वृषभ के समान अपने पराक्रम से प्रजाओं को अपने वश में करता है और किसी से पराजित न होने वाला स्वयं राष्ट्र का स्वामी होता है। ऐसा राजा जो अपराजित हो, राष्ट्र के लिए गौरव का विषय ही हो सकता है। ऐसे राजा पर राष्ट्र की प्रजा को पूर्ण विश्वास होता है। वह भी अपने राजा के आदेश पर अपना सर्वस्व बलिदान करने के लिए सदैव ही तैयार रहते हैं। राष्ट्र की सीमाओं पर कुदृष्टि डालने वाला शत्रु भी अपने विनाश के बारे में सोचकर ही सदैव दूर रहने का प्रयास करेगा। राजा के अपनी प्रजा के प्रति कुछ कर्त्तव्य होते हैं, जिनकी अपेक्षा प्रजा भी करती है- परि॒च्छिन्नः॒ क्षेम॑मकरोत्॒ तम् आस॑न॒माच॑रन्। कुला॑यन् कृण्वन् कौर॑व्यः पति॒र्वद॑ति जा॒यया॑॥२ अर्थात् प्रजा को अपने संरक्षण में बसाने वाला राजा, समस्त कर्म, कुशल पुरुषों में श्रेष्ठ पालक होकर स्त्री के समान अपनी पृथिवी या प्रजा के साथ ही एक कुटुम्ब सा बनाता हुआ, आसन सिंहासन प्राप्त करके भी तप का आचरण करता हुआ, हमारे हित में कल्याण करे। अ॒भीव॒स्वः प्र जि॑हीते॒ यव॑: प॒क्वः पृ॒थो बिल॑म्। जनु॑ः स भ॒द्रमेध॑ति रा॒ष्ट्रे राज्ञ॑ः परि॒क्षित॑ः॥३ अर्थात् जिस प्रकार सूर्य की धूप में परिपक्व जौ आदि अन्न, जिस प्रकार खेत की हल से बनी रेखाओं पर खड़ा होता है, उसी प्रकार वह प्रजाजन भी प्रजाओं को सब प्रकार से स्थापित करने और उसकी रक्षा करने वाले राजा के राष्ट्र में अत्यन्त सुख खूब अधिक मात्रा में भोग करता है। उत्तम राजा के राज्य में प्रजा खूब सम्पन्न हो जाती है।
१. अथर्ववेद २०/७०/१४ २. अथर्ववेद २०/१२७/८ ३. अथर्ववेद २०/१२७/१०
CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
258 वैदिक वाङ्गमय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता राष्ट्र के मंगल के लिए प्रयास करना ही वैदिक राजा का परम लक्ष्य है और राष्ट्र एवं मातृभूमि की सुरक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति तक देना उस राष्ट्र के नागरिकों का परमधर्म माना जाता है। उस काल में प्रजातंत्रमूलक राजतंत्र था, जिसमें राजा के निरंकुश होने पर कोई भी अवसर प्राप्त न था तथा उसके राज्य में सभा और समिति नाम्नी दो संस्थाओं का महत्त्वपूर्ण स्थान था। इसमें विद्वान् लोग एकत्र होकर उत्तमोत्तम रीति से अपने विचारों को प्रकट किया करते थे। सभा॒ च॑ मा॒ समि॑तिश्चावतां प्रजाप॑तेर्दुहि॒तरौ सं॑विदा॒ने। येना॑ सं॒गच्छा॒ उप॑ मा॒ स शि॑क्षाच्चारु॑ वदानि पितरः सङ्गेतेषु॥ वि॒द्म ते॑ सभे॒ नाम॑ नर॒ष्टा नाम॒ वा अ॑सि। ये ते॑ के च॑ सभा॒सद॒स्ते मे॑ सन्तु सवा॑चसः॥१ समिति में राजा की उपस्थिति अनिवार्य थी। समिति ही राजा का चुनाव करके उससे समस्त राष्ट्र का भार वहन करने का आग्रह करती थी और राजा से कहा जाता था कि प्रजा ने ही उसे राजापद के लिए चुना है। वह राष्ट्र के कंधे पर बैठे तथा भौतिक समृद्धि का विकास करे। इन तथ्यों से स्पष्ट है कि वैदिक युग में राजनैतिक दृष्टि से प्रचुर प्रबुद्धता एवं जागृति विद्यमान थी। ४. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में अथर्ववेद के धर्मदर्शन का अनुशीलन : वैदिक काल में धर्म ही जीवन का आधार था और इसका अनुकरण ही मानव के लिए अनिवार्य माना जाता था। धर्म के द्वारा ही मानव जीवन की दिशा निर्धारित की जाती थी। वैदिक वाङ्गमय की एक विशेषता यह भी है कि वह मानव मात्र के लिए कल्याण की भावना को अग्रसर करता है। साहित्य संस्कृत का अग्रदूत है, साहित्य संस्कृति का वाहन है। समाज की भावना को दर्पणवत् प्रतिबिम्बित करने वाला साहित्य कितना भी आदर्शवादी क्यों न हो वह यथार्थ से विमुख कभी नहीं हो सकता है। उसकी व्याप्ति राष्ट्र को परिधि के द्वारा नियंत्रित करती है। राष्ट्र के लिए भी धर्म का आधार अनिवार्य होता है और उससे भी आदर्श राष्ट्र की परिकल्पना पूर्ण होती है। धर्म मानव मात्र को यह बतलाता है कि उसका कर्तव्य है कि सदैव एक दूसरे की रक्षा तथा सहायता करे। केवल अपने स्वार्थ में उसे निविष्ट नहीं रहना चाहिये। १. अथर्ववेद ७/१२/१-२ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri षष्ठ अध्याय 259 वैदिक ऋषि भगवान् से प्रार्थना करता है कि वे मानव मात्र के लिए सुमति (सद्भावना) धारण करें, उन प्राणियों के लिए ही नहीं जिन्हें वह देखता है, प्रत्युत उनके लिए भी जो उसकी दृष्टि से ओझल हैं और जिन्हें वह नहीं देखता- यश्च पश्यामि यांश्च न। तेषु मा सुमति कृधि॥१ कितनी उदात्त भावना है यह। सामान्यतः हम उन्हीं के कल्याण की कामना करते हैं जिन्हें अपनी आँखों से देखते हैं, परन्तु वैदिक ऋषि यहीं तक अपनी प्रार्थना को सीमित नहीं रखता, अपितु वह अखिल विश्व में अदृष्ट प्राणियों के प्रति भी यही भावना रखने का विनम्र निवेदन करता है। यह भावना मनुष्य को आपस में बंधुत्व का भाव बनाये रखने में सहायक होती है। ऐसे व्यक्ति न तो स्वयं दूसरों के अहित की बात सोचते हैं और न ही ऐसी भावना को पैदा करने वाली स्थितियों को उत्पन्न होने देते हैं। सम्पूर्ण विश्व में सभी पदार्थों एवं द्रव्यों के परस्पर संयोग तथा एकत्र-धारण से जीवन का निर्वाह होता है। धर्म का उद्भव ही इस निर्वाह के लिए है। सूर्य, चन्द्र, तारा मण्डल और पृथ्वी आदि पदार्थ परस्पर के उपकार्य-उपकारक भाव से विधृत हैं और वे परमेश्वर द्वारा निर्दिष्ट अपने-अपने विशिष्ट कार्यों को सम्पन्न करते हैं। मानवों को अपने उत्कृष्ट-साधन के लिए समाज की अपेक्षा होती है। समाज का समाजत्व इसी में है कि वह विभिन्न प्रकार की मानस-वृत्तियों से युक्त एक-एक मानव की स्थिति का सामञ्जस्य करता है। यही कारण है कि धर्म में ही समाज की प्रतिष्ठा है। केवल मानवसमाज की ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण जगत् की प्रतिष्ठा धर्म में है। इस विषय में यह श्रुति वाक्य है- "धर्म विश्वस्य जगत् प्रतिष्ठा।" (धर्म ही विश्व का आश्रयभूत है)। वैदिक धर्म दर्शन है। व्यक्ति के लिए हर कदम पर धर्म निश्चित करता है कि राष्ट्र धर्म क्या है, राष्ट्र के नागरिकों का राष्ट्र के प्रति क्या धर्म है? जीवन का धर्म दर्शन क्या है? प्राणिभाव के प्रति दया, क्षमता और अहिंसा का भाव ही एक शांतिपूर्ण समाज की स्थापना में सहायक होता है। सभी सामाजिक सदस्यों में आपसी समझदारी व सहिष्णुता की भावना का समावेश उन्हें एक पारंपरिक सदस्यों की तरह व्यवहार करने की प्रेरणा प्रदान करता है। जिस धरती पर मनुष्य जन्म लेता है, उसका स्थान माँ के समान ही होता है और उसकी रक्षा का दायित्व भी उसके पुत्रों का ही होता है। मातृभूमि के प्रति १. अथर्ववेद १७/१७ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 260 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता राष्ट्रवासियों का दायित्व भी उनके धर्म के द्वारा ही निश्चित होता है। राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता की रक्षा तभी संभव है जबकि वहाँ पर सर्वधर्म व समानता का भाव विद्यमान हो। वैदिक धर्म में किसी भी धर्म के प्रति अनादर या उपेक्षा का भाव नहीं बतलाया गया है। जहाँ प्राणि मात्र में ईश्वर का अंश देखा जाता हो, वहाँ धर्मगुरु या धर्म के प्रति सम्मान का होना निश्चित ही है। यही वह सब कारक है जो कि आज के सन्दर्भ में भी उतने ही महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। ५. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में अथर्ववेद के आचार- दर्शन, शिक्षादर्शन एवं अर्थदर्शन का अनुशीलन : वेदों के अनुशीलन से उस युग के आचार-दर्शन, शिक्षा-दर्शन एवं अर्थ-दर्शन सम्बन्धी धारणाओं का परिज्ञान हमें भली-भाँति होता है। आचार्यों ने अपने निरीक्षण में रखे ब्रह्मचर्य आश्रम में मानव को शिक्षा एवं आचार-विचारों का पूर्ण ज्ञान कराया। उन्हें इस जगत् में एक आदर्श मानव और राष्ट्रभक्त बनकर जीवन व्यतीत करने के योग्य बनाया था। इसके लिए अथर्ववेद में विभिन्न मंत्रों में उल्लिखित किया गया है— य॒माय॒ सोम॑ः पवते य॒माये॑ क्रियते ह॒विः। य॒मं ह॑ य॒ज्ञो ग॑च्छत्य॒ग्निदू॑तो॒ अरं॑कृतः॥१ अर्थात् यम और नियम व्यवस्था करने वाले राजा प्रभु के लिए सोमरस छाना जाता है। यम राजा के लिए ही हवि अर्थात् अन्न उत्पन्न किया जाता है। यज्ञ, राष्ट्र, ज्ञानवान् पुरुषों को अपना दूत प्रतिनिधि बनाकर और सुभूषित, सुशोभित होकर नियामक राजा की शरण में आता है। इसमें राष्ट्र के मानवों से भी यह अपेक्षा की जाती है कि वे यम व नियम को अंगीकार करके अपने जीवन का अंग बनायें। उसके द्वारा ही उनका जीवन सदाचारमय होगा। य॒माय॒ मधु॑मत्तमं जुहोता॒ प्र च॑ तिष्ठत। इ॒दं नम॒ ऋषि॑भ्यः पूर्व॒जेभ्यः॒ पूर्वे॑भ्यः पथि॒कृद्भ्य॑ः॥२ अर्थात् उस परमपिता परमेश्वर के लिए ही अति मधुर वचन का एक दूसरे के प्रति प्रयोग करना चाहिये। ऐसे ही सद्गुण लेकर ही एक दूसरे के देशों में प्रस्थान १. अथर्ववेद १८/२/१ एवं ऋग्वेद १०/१४/३ २. अथर्ववेद १८/२/२ एवं ऋग्वेद १०/१४/१५ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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षष्ठ अध्याय 261 करों। पूर्वउत्पन्न मार्ग विधाताओं, मार्ग दृष्टाओं का पूर्ण आत्मिक रूप से आदर करना चाहिये। समाज में रहकर एक दूसरे के प्रति प्रेम, दया व सहिष्णुता का व्यवहार करना ही मनुष्य का परम कर्तव्य होना चाहिए। अपने गुरुओं, आचार्यों, माता-पिता आदि पूज्य लोगों को आदर एवं श्रद्धा प्रदान करना ही व्यक्ति का स्वभाव होना चाहिए। जीवन के आदर्शों में इन बातों का समावेश होना ही चाहिए तभी मानव जीवन की सार्थकता संभव है। इस जीवन को सिर्फ भौतिक सुखों के लिये स्वार्थी बना देना उचित नहीं है और न ही किसी के प्रति द्वेष और ईर्ष्या की भावना को अपने मन में स्थान देना चाहिए। य॒माय॑ घृ॒तव॑त् पयो॒ राज्ञे॑ ह॒विर्जु॑होतन्। स नौ॑ जी॒वेष्वा य॑मे॒द् दीर्घमायुः प्र जी॒वसै॑॥१ अर्थात् हे पुरुषों! सर्वनियन्ता राजा के समान सब लोगों के राजा परमपिता परमेश्वर के लिए घृत से युक्त पुष्टिकारक दुग्ध और अन्न आदि अग्नि में समर्पित करें और साथ ही साथ उसके समान ही विद्वान् तेजस्वी ब्राह्मण को प्रदान करें। इस कार्य के करने से ही ईश्वर हमें और समस्त जीवों को दीर्घ जीवन प्रदान करेंगे और हमें अपने जीवन के लिए आवश्यक सभी पदार्थ प्रदान करेंगे। इस मंत्र के द्वारा यज्ञ कर्म पर विशेष जोर दिया गया है। होम का भी जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान है। जो भोजन ग्रहण किया जाय उसको ग्रहण करने से पूर्व उसे अग्नि को समर्पित करना ही ईश्वर को समर्पित करने के समान है और यह क्रिया आज भी उतनी ही मान्य है। वैदिक काल में शिक्षा का कार्य आचार्यों द्वारा किया जाता था। बालक को उपनयन संस्कार करने के पश्चात् गुरुकुल में शिक्षा हेतु भेजने का प्राविधान पाया जाता था। बालक के लिए गुरु पिता एवं गुरुपत्नी माता के समान सम्मानीय थे और जिस तरह पुत्र अपने माता-पिता की सेवा किया करता था, उसी प्रकार वह गुरु एवं गुरुपत्नी की सेवा भी करता था। इस काल में वह ब्रह्मचर्य का पालन करके शिक्षा एवं ज्ञान प्राप्त किया करता था और गुरु भी उन्हें अपनी सम्पूर्ण विद्याओं का ज्ञान करा देता था। अथर्ववेद में गुरु का शिष्यों के प्रति व्यवहार के बारे में इस मंत्र में उल्लेख प्राप्त होता है—
१. अथर्ववेद १८/२/३ एवं ऋग्वेद १०/१४/१४
CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 262 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता मैन॑मग्ने॒ वि द॑हो॒ माभि शू॑शुचो॒ मास्य॒ त्वचं॑ चिक्षिपो॒ मा शरी॑रम्। शृ॒तं य॒दा कर॑सि जातवे॒दोऽथे॑मेनं॒ प्र हि॑णुतात् पि॒तृभ्यः॑॥ १ अर्थात् हे अग्ने ! आचार्य ! इस शिष्य को जलाइये मत। संतप्त मत कीजिये, उसकी त्वचा को काटकर विकृत न करें और न ही उसके शरीर का विनाश करें। हे जातप्रज्ञ ! विद्वान् ! जब इसको परिपक्वपूर्ण ज्ञानवान् कर दें, तब ही सम्पूर्ण विद्याओं से युक्त हो जाने पर इसे वापस माता-पिता के पास भेजें। आचार्य के पास आने वाला हर शिष्य ज्ञान शून्य होता है और उसकी इस ज्ञान शून्यता के कारण ही शिष्य दण्डित भी किया जाता है, लेकिन उसको पूर्ण ज्ञानी बनाकर ही माता पिता के पास वापस भेजा जाता है। इससे वह इतना परिपक्व और ज्ञानी हो जाता है कि जीवन में उसे कभी कठिनाईयों का सामना नहीं करना पड़ता है। गुरु मार्गदर्शक, असत् से सत् की दिशा दिखाने वाला, अज्ञान के गहरे अंधकार से मुक्त कराके प्रकाश की ओर ले जाने वाला होता था। उक्त मंत्र में आचार्य के लिए ही आदेश दिया गया है- अ॒जो भा॒गस्तप॑सा॒तं त॑पस्व॒ तं तै॑ शो॒चिस्त॑पतु॒ तं तै॑ अ॒र्चिः। यास्ते॑ शि॒वास्त॒न्वो॑ जातवेद॒स्ताभि॑र्वहैनं सु॒कृता॑मु लो॒कम्॥ २ अर्थात् हे जातप्रज्ञ परमात्मन् आचार्य ! अज अजन्मा जीवात्मा ही शरीर में दुःख-सुख का सेवन करता है। अतः तू उसे ही तप, ज्ञान, स्वाध्याय और प्रवचन एवम् तपस्या द्वारा सन्तप्त कर, उसे तपोमय आचरण करा। उस आत्मा को ही तेरी इस स्वरूप ज्वाला या प्रकाश तप्त करें। उसको तेरी दीप्ति प्रकाशित करें। हे ईश्वर ! तेरी जो कल्याणकारी रचित पदार्थ ये देह हैं उनसे इस जीव को पुण्यकर्ताओं के लोक को प्राप्त करा। आचार्य से जिन बातों की अपेक्षा की जाती है वह सब अथर्ववेद में वर्णित है। गुरु के बिना तो ज्ञान प्राप्त हो ही नहीं सकता है और इसीलिए गुरु को ईश्वर से भी श्रेष्ठ बताया गया है। ईश्वर से परिचय गुरु के माध्यम से ही होता है। उस पथ का, उस आचरण का जो ईश्वर तक जाता है, गुरु ही मार्ग दिखा सकता है। अव॑ सृज॒ पुन॑रग्ने पि॒तृभ्यो॒ यस्त॒ आहु॑तश्चर॑ति स्व॒धावा॑न्। आयु॒र्वसा॑न॒ उप॑ यातु॒ शेषः॒ सं ग॑च्छतां त॒न्वा॑ सु॒वर्चाः॑॥ ३ १. अथर्ववेद १८/२/४ एवं ऋग्वेद १०/१६/१ २. अथर्ववेद १८/२/८ एवं ऋग्वेद १०/१६/३ ३. अथर्ववेद १८/२/१० एवं ऋग्वेद १०/१६/५ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri षष्ठ अध्याय 263 अर्थात् हे ज्ञानवान् आचार्य! जो स्व अर्थात् आत्मा या शरीर को धारण-पोषण करने वाले वीर्य से युक्त होकर आपके समीप अपने को सर्वार्पण करके ब्रह्मचर्य व्रत का आचरण करें, आप उसको फिर माता-पिता एवं वृद्धों की सेवा के लिए या पिता के योग्य गृहस्थ कार्यों के लिए तैयार करके, उसके लिए आज्ञा देते हैं और वह आपके द्वारा शिक्षित व आज्ञा पाया हुआ शिष्य या पुत्र अपने जीवन में आपके समीप और आपकी आज्ञा में रहकर अपने गृहों को वापस जायें और वहाँ अपने जीवन में उत्तम तेजस्वी होकर सद्संगों में लाभ करें। इस प्रकार अथर्ववेद में प्राप्त शिक्षादर्शन से व्यक्ति को एक सदाचारी जीवन प्राप्त होता है। उसकी शिक्षा उसे पूर्ण मानव बनाकर सूर्य, पृथिवी, माता-पिता, बाल एवं वृद्ध के परिपालन की शिक्षा देती है। ऐसे आचरण की शिक्षा से देश और राष्ट्र सदैव ही सुदृढ़ होता है। 'अर्थ' जीवन के लिए उतना ही आवश्यक है जितना की अन्य सभी वस्तुयें। बिना अर्थोपार्जन के जीवनयापन संभव ही नहीं है। वैदिक आर्य उस अवस्था को पूर्ण कर चुके थे जब मनुष्य अपनी क्षुधाशान्ति के लिए फल-मूल पर ही निर्भर रहता था। इस काल में कृषि को आजीविका के लिए प्रमुख साधन माना जाने लगा था और कृषि कार्य भी उस समय अत्यन्त महत्त्वपूर्ण था। अथर्ववेद के एक मंत्र में कहा गया है कि पृथी (अथवा पृथु) वैन्य ने सर्वप्रथम मनुष्यों के लिए कृषिकर्म के द्वारा फसल उत्पन्न की। उन्होंने ही मानव समुदाय के लिए कृषि की पद्धति प्रशस्त की— तां पृ॒थीं वै॒न्योऽधो॒क् तां कृ॒षिं च॑ स॒स्यं चा॑धोक्॥११॥ ते कृ॒षिं च॑ स॒स्यं च॑ मनु॒ष्या॑३ उप॑ जीवन्ति कृ॒ष्टरा॑धिरुपजीव॒नीयो॑ भव॒ति॒ य एवं वेद॑॥१ चारों वेदों के काल में अथर्ववेद का काल सबसे बाद का रहा और यह काल प्रगतिशील भी था। ईश्वर एवं आराधना के अतिरिक्त भी इस वेद में कई विषयों पर उल्लेख किया गया है जो शेष वेदों में अनुपलब्ध था। अथर्ववेद से ही यह बात स्पष्ट होती है कि वैदिक युग में पशु पुरीषजन्य खाद के महत्त्व की जानकारी थी। फसल कटाई के लिए उपकरण 'दात्र' तथा 'शृणी' (हंसिया) था। सिंचाई के लिए कुओं तथा नहरों पर निर्भर रहते थे।२ कृषि कार्य के लिए पशुपालन का भी महत्त्व बहुत अधिक था। १. अथर्ववेद ८/१३/१२-१२ २. अथर्ववेद ३/१४/३-४ एवं १९/३१/३ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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264 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता
उस समय खेती के अतिरिक्त अन्य प्रकार के उद्यम भी किये जाते थे, जिनमें हाथ के कौशल और कारीगरी की विशेष आवश्यकता पड़ती थी। बढ़ई (तक्षन्), लोहार (कर्मार), वैद्य (भिषक्) स्तोत्र बनाने वाले (थारु), कुम्हार (कुलाल), रथ बनाने वाले (रथकार), मल्लाह (कैवर्त, निषाद) तथा बुनकर (वाय) आदि का उल्लेख कई स्थानों पर है। कृषि से उत्पन्न अनाजों, औद्योगिक-शिल्पों से उत्पन्न वस्तुओं का क्रय-विक्रय हुआ करता था। वस्तु-विनियम का उस समय प्रचलन था। वस्तु के बदले वस्तु ही प्राप्त की जाती थी। अथर्ववेद में दूर्श (वस्त्र), पवस्त (चादर) तथा अजिन (चर्म खरीदने) का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।¹ समुद्र पार करके दूसरे स्थानों पर भी व्यापार करने का उल्लेख प्राप्त होता है। व्यापारियों की स्थिति उस समय सुदृढ़ होती थी और उसी के अनुरूप उन्हें 'शतिन्' और सहसितु कहा गया है। फिर भी अर्थ के प्रति मोह रखने की शिक्षा नहीं दी जाती थी। वैदिक काल में अत्यन्त समृद्ध एवं सम्पन्न अर्थव्यवस्था विद्यमान थी। आर्थिक आधार पर समाज में श्रेणियाँ नहीं थी। समतामूलक, श्रम की प्रतिष्ठाकारक और सांस्कृतिक जीवन के लिए उपादेय वह अर्थव्यवस्था हमें आज भी स्पृहणीय प्रतीत होती है, जिसमें धनोपार्जन को केवल शुद्ध, विधिसम्मत और समाज के द्वारा अनुमोदित प्रणाली ही प्रशस्त समझी जाती थी। अग्नि से प्रार्थना करते हुये ऋषि-कवि यही कामना करते थे— तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः मागृधः कस्यस्विद्धनम्। अर्थात् हम किसी अन्य के धन की कामना न करें, यह भाव भी इसमें मुखरित है। ६. राष्ट्रीयएकता एवम् अखण्डता को अथर्ववेद का प्रदेय : वैदिक काल के सभी ग्रन्थों में राष्ट्र की कभी भी अवहेलना नहीं की गई है। पृथिवी और मातृभूमि को जितना सम्माननीय स्थान प्रदान किया गया है, देशभक्ति और देशरक्षा के लिए भी पूर्ण वर्णन उपलब्ध है। 'पृथिवी-सूक्त' में ऋषि आर्थवण ने ६३ मंत्रों में 'मातृस्वरूपिणी-भूमि' को समग्र पार्थिव-पदार्थों की जननी और जीवों की पोषिका के रूप में उद्घोषित किया है तथा प्रजा को समस्त बुराईयों, क्लेशों तथा अनर्थों से बचाने तथा सुख-सम्पत्ति की वृष्टि करने की कामना की गई है।
१. अथर्ववेद ४/७/६
CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
षष्ठ अध्याय 265 मा॒ता भूमिः॑ पु॒त्रो अ॒हं पृ॑थि॒व्याः।$^१$ अर्थात् 'मेरी माता भूमि है और मैं मातृभूमि का पुत्र हूँ, बड़ी ही उदात्त भावना है और इस पुत्र होने की भावना से ही राष्ट्र में अपनी मातृभूमि के प्रति प्रेम का बीज स्फुरित होता है। राष्ट्र (मातृभूमि) के सभी पुत्र इसकी रक्षा के लिए, इसकी अखण्डता के लिए सदैव ही तत्पर रहते हैं। उनकी यह कामना रहती है कि इस पृथिवी पर सभी एक परिवार के सदस्यों की तरह रहें, उनमें आपस में विद्वेष आदि भावना को कोई स्थान नहीं होना चाहिये। जिस मातृभूमि के गर्भ से उत्पन्न वस्तुएँ हमें जीवन देती है, इसमें व्याप्त 'पंचतत्त्व' ही हमें निर्मित करते हैं। वह राष्ट्र जो हमें संरक्षण, सुरक्षा देता है, जिसके विद्वान् एवं योग्य राजा का हम संवरण करते हैं, उसके प्रति निष्ठा होनी चाहिये- यस्ते॑ ग॒न्धः पु॒रु॑षे॒षु स्त्री॒षु पुंसु॒ भगो॑ रु॒चिः॑। यो अश्वे॑षु वी॒रेषु॒ यो मृ॒गेषू॒त ह॒स्तिषु॑। क॒न्यायां॒ वर्चो॒ यद् भूमे॒ तेना॒स्माँ अपि॒ सं सृ॑ज॒ मा नो॑ द्वि॒क्षत॒ कश्च॒न॥$^२$ अर्थात् हे मातृभूमि! हम सबकी उत्पत्ति-स्थली पृथिवी! तेरी जो गंध (अंश) स्त्री व पुरुषों में सौभाग्यमय कान्ति रूप से विद्यमान है, जो अश्वों में, वीर्यवान् पुरुषों में, जो मृगों में और जो हस्तियों में है, जो वर्चस (कान्तिमया भाग) कन्याकुमारी में विद्यमान है, उस गंध और कान्ति से हमें भी युक्त कर और हमें आपस में विद्वेष की भावना से मुक्त कर। राष्ट्र के लिए एक भयमुक्त समाज, आपस में वैर व वैमनस्य का अभाव, ज्येष्ठता और कनिष्ठता की भावना की अनुपस्थिति ही एक सबल आधार होता है और यह स्वतंत्र राष्ट्र के नागिरकों का प्रमुख कर्तव्य होता है कि वह सत्य का आश्रय लेकर ही जीवन-यापन करें तभी उन्हें वैभव की प्राप्ति होगी एवं सर्वोत्कृष्ट स्वतंत्र राष्ट्र का निर्माण होना संभव है। इस बारे में निम्न मंत्र में उल्लिखित है- यार्णवेऽधि॑ स॒लिल॒मग्र॑ आसी॒द् यां मा॒याभि॒रन्वचर॑न् मनी॒षिण॑ः। यस्या॒ हृद॑यं प॒र॒मे व्योम॒न्त्स॒त्येनावा॑त॒ममृ॑तं पृथि॒व्याः। सा नो॒ भूमि॒स्त्विषिं॒ बलं॑ रा॒ष्ट्रे द॑धातूत्त॒मे॥$^३$
१. अथर्ववेद १२/१/१२ २. अथर्ववेद १२/१/२५ ३. अथर्ववेद १२/१/८
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 266 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अर्थात् सर्वोत्तम राष्ट्र के रूप में हमारी मातृभूमि हमारे व्यक्तिगत एवं सामूहिक पराक्रम एवं उत्कर्ष का धारक हो। इस प्रकार 'भूमि' या 'उत्तम राष्ट्र' पर्यायवाची शब्द माने गये हैं। इस प्रकार से राष्ट्र की सर्वोच्चता की कामना की गई है। इस भावना से ही राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता को बल मिलता है। यस्यां गायन्ति नृत्यन्ति भूम्यां मर्त्या व्यैलबाः। युध्यन्ते यस्यामाक्रन्दो यस्यां वदति दुन्दुभिः। सा नो भूमिः प्र णुदतां सपत्नानसपत्नं मां पृथिवी कृणोतु॥१ अर्थात् कर्तव्यपालन करने से व्यक्ति एक अनुपम आनन्द की अनुभूति करता है। जो राष्ट्रभक्त समझकर मातृभूमि की रक्षा करते हैं, उन्हें अनुपम आत्मतुष्टि की अनुभूति होती है। इसीलिए वीरों से वह अपेक्षा की जाती है कि जब कभी शत्रु मातृभूमि पर आक्रमण कर उन पर विपत्ति लाने का प्रयास करेगा तो वे अपनी पूर्ण शक्ति एवं सामर्थ्य से विरोध करेंगे और अपने देश को संकट से मुक्त रखेंगे। अथर्ववेद में राष्ट्रीय एकता और अखण्डता के प्रति राष्ट्रवासियों के कर्तव्यों एवं उनके प्रति श्रद्धा रखने के बारे में वर्णन किया गया है। इसके लिए बारहवें काण्ड में पृथिवी सूक्त में विशेष रूप से वर्णन किया गया है। यदि राष्ट्र में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के शत्रु उत्पन्न हो जायें तो उन्हें विनष्ट करने के लिए सेना को कुशल संचालन से उनके नाश के लिए प्रयास करना चाहिये, ताकि भविष्य में इस राष्ट्र के अहित के लिए कोई मन में विचार भी न ला सकें। व्याकूतय एषामितार्थो चित्तानि मुह्यत। अथो यदद्यैषां हृदि तदैषां परि निर्जहि॥२ देश में व्याप्त शत्रुता का भाव प्रतिकूल दिशा में गमन करें अर्थात् उनकी भावनाएँ परिवर्तित हो जायें। वे राष्ट्र हित में सोचने लगे और अपने कर्तव्यों का अहसास करें। राष्ट्रवासियों के लिए शुभ एवं अनुकूल मार्ग प्रशस्त किया गया है। १. अथर्ववेद १२/१/४१ २. अथर्ववेद ३/२/४ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri सप्तम अध्याय ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद् में राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता का अनुशीलन १. ब्राह्मण, आरण्यक एवम् उपनिषद् में निरूपित राष्ट्रीयएकता एवम् अखण्डता के आधारतत्त्व : राष्ट्र की महत्ता को किसी भी काल में अस्वीकार नहीं किया जा सकता है। मनुष्य के अस्तित्व और उसके पारिवारिक, सामाजिक और राजनीतिक जीवन को उससे पृथक् करके वर्णित नहीं किया जा सकता है। दैवशासन में भी इन्द्र के राजा होने का और उसके शासित इन्द्रलोक का जिस तरह वर्णन प्राप्त होता है, ठीक उसी प्रकार मानव समूहों में मानवश्रेष्ठ का राजा और शेष लोगों के शासित होने का उल्लेख सभी ग्रन्थों में प्राप्त होता है। आपस में हिल मिलकर रहने का सन्देश भी सभी युगों में गूँजता रहा है क्योंकि इसमें निहित प्रेम की भावना ही उस संसार का आधारतत्त्व है। राष्ट्र में व्याप्त यही भावना राष्ट्रीय एकता और अखण्डता को बल प्रदान करती है। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै।१ अर्थात् हम जीवन भर परस्पर स्नेह के सूत्र में बँधे रहें और कभी एक दूसरे से परस्पर द्वेष न करें। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और इस समाज में सहयोग, प्रेम और आपसी समझदारी के साथ ही जीवन व्यतीत करने का सन्देश प्रदान किया गया है जिससे कि एक राष्ट्र की जड़े और मजबूत होती हैं, जिन पर प्रहार करने का साहस कोई भी शत्रु नहीं कर सकता। राष्ट्र के निवासियों में भी सभी श्रेणी के लोग प्राप्त होते हैं जिनमें कुछ स्वार्थी होते हैं। उन्हें निजस्वार्थ हेतु ही विचार करना होता है और अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए प्रयास करते हैं। जो व्यक्ति प्रबुद्ध होते हैं वे सदैव ही परम कल्याण की कामना करते हैं। १. कठोपनिषद् CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 268 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तौ संपरीत्य विविनक्ति धीरः। श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद्वृणीते॥१ अर्थात् मनुष्य को जीवन में श्रेय और प्रेय दोनों ही प्राप्त होते हैं लेकिन वह अपनी बुद्धि और विवेक के अनुरूप ही उनको ग्रहण करता है। बुद्धिमान् श्रेय को चुनता है और अल्प बुद्धि वाला प्रेय की ओर आकर्षित होता है। इस मंत्र के यदि आन्तरिक भाव की ओर देखें तो ज्ञात होता है कि संसार में व्यक्ति को 'स्व' एवं 'पर' दोनों का ही विवेकपूर्ण चुनाव करना पड़ता है। बुद्धिमान् व्यक्ति श्रेय का चुनाव इसलिए करता है क्योंकि वह परम कल्याण का दाता है। उसमें सम्पूर्ण विश्व का कल्याण निहित है- 'तैत्तिरीय ब्राह्मण' में इसी प्रकार का उल्लेख किया गया है जहाँ पर राष्ट्र को धारण करने की प्रशंसा की गई है :- सविता राष्ट्रं राष्ट्रं राष्ट्रपति राष्ट्रमस्मिन् मयि दधतु। अर्थात् “सविता, राष्ट्र और राष्ट्रपति है। इस यज्ञ में मुझ में राष्ट्र धारण करा दें।” राष्ट्र को उस समय भी सम्माननीय स्थान प्राप्त था और उसको सब लोग दृढ़ एवं शक्तिशाली बनाने की कामना रखते थे। राष्ट्र के उत्थान की बात हर स्थान पर दुहरायी गई है ताकि राष्ट्र का अस्तित्व सदैव सुरक्षित रहे और राष्ट्र के अस्तित्व से ही व्यक्ति का अस्तित्व बना हुआ है। आ त्वाहार्षमन्तर भू ध्रुर्व स्तिष्ठा विचाचलिः। विश स्त्वा सर्वा वाञ्छन्तु मा त्वद्राष्ट्रमधिभ्रशत्॥२ अर्थात् 'हे अग्ने! मैं तुमको लाया हूँ, तुम भीतर हो (नाभि के ऊपर), (शरीर मध्य में) तुम चलन रहित हो, स्थिर बैठो। सारी प्रजा तुम्हें चाहे। राष्ट्र अर्थात् जनपद समूह तुमसे गिरे नहीं।' इस मंत्र के द्वारा राष्ट्र की अखण्डता का भाव प्रस्तुत होता है, उसकी एकता की भावना बलवती होती है। राष्ट्र सुदृढ़ रहे, निश्चल रहे, यही कामना उस समय भी की गई थी। प्रजा का सुन्दर ढंग से परिपालन, उसके लिए जीवन की सभी सुविधाओं को प्रस्तुत करना और उनमें सुरक्षा की भावना की जागृति, यह एक राष्ट्र के धारक के लिए अत्यन्त आवश्यक है। यह तत्त्व जीवन और जीव के लिए बहुत आवश्यक है। १. कठोपनिषद् १/२/२ २. वाजसनेही संहिता- १२/११ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar