भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 296

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 268 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तौ संपरीत्य विविनक्ति धीरः। श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद्वृणीते॥१ अर्थात् मनुष्य को जीवन में श्रेय और प्रेय दोनों ही प्राप्त होते हैं लेकिन वह अपनी बुद्धि और विवेक के अनुरूप ही उनको ग्रहण करता है। बुद्धिमान् श्रेय को चुनता है और अल्प बुद्धि वाला प्रेय की ओर आकर्षित होता है। इस मंत्र के यदि आन्तरिक भाव की ओर देखें तो ज्ञात होता है कि संसार में व्यक्ति को 'स्व' एवं 'पर' दोनों का ही विवेकपूर्ण चुनाव करना पड़ता है। बुद्धिमान् व्यक्ति श्रेय का चुनाव इसलिए करता है क्योंकि वह परम कल्याण का दाता है। उसमें सम्पूर्ण विश्व का कल्याण निहित है- 'तैत्तिरीय ब्राह्मण' में इसी प्रकार का उल्लेख किया गया है जहाँ पर राष्ट्र को धारण करने की प्रशंसा की गई है :- सविता राष्ट्रं राष्ट्रं राष्ट्रपति राष्ट्रमस्मिन् मयि दधतु। अर्थात् “सविता, राष्ट्र और राष्ट्रपति है। इस यज्ञ में मुझ में राष्ट्र धारण करा दें।” राष्ट्र को उस समय भी सम्माननीय स्थान प्राप्त था और उसको सब लोग दृढ़ एवं शक्तिशाली बनाने की कामना रखते थे। राष्ट्र के उत्थान की बात हर स्थान पर दुहरायी गई है ताकि राष्ट्र का अस्तित्व सदैव सुरक्षित रहे और राष्ट्र के अस्तित्व से ही व्यक्ति का अस्तित्व बना हुआ है। आ त्वाहार्षमन्तर भू ध्रुर्व स्तिष्ठा विचाचलिः। विश स्त्वा सर्वा वाञ्छन्तु मा त्वद्राष्ट्रमधिभ्रशत्॥२ अर्थात् 'हे अग्ने! मैं तुमको लाया हूँ, तुम भीतर हो (नाभि के ऊपर), (शरीर मध्य में) तुम चलन रहित हो, स्थिर बैठो। सारी प्रजा तुम्हें चाहे। राष्ट्र अर्थात् जनपद समूह तुमसे गिरे नहीं।' इस मंत्र के द्वारा राष्ट्र की अखण्डता का भाव प्रस्तुत होता है, उसकी एकता की भावना बलवती होती है। राष्ट्र सुदृढ़ रहे, निश्चल रहे, यही कामना उस समय भी की गई थी। प्रजा का सुन्दर ढंग से परिपालन, उसके लिए जीवन की सभी सुविधाओं को प्रस्तुत करना और उनमें सुरक्षा की भावना की जागृति, यह एक राष्ट्र के धारक के लिए अत्यन्त आवश्यक है। यह तत्त्व जीवन और जीव के लिए बहुत आवश्यक है। १. कठोपनिषद् १/२/२ २. वाजसनेही संहिता- १२/११ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar