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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 297

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri सप्तम अध्याय 269 प्रजां च परिपातु नः१ इसमें संवत्सर से प्रार्थना है कि वह यज्ञ को धारण करें और प्रजा का परिपालन करें। राजा के लिए प्रजा का परिपालन प्रथम कर्तव्य माना गया है। उसे सन्तति समझकर उसका पालन करने का आदेश दिया जाता है। जो कामनायें माता- पिता के मन में अपने पुत्र व पुत्रियों के प्रति हों, राजा में प्रजा के प्रति हों तभी राष्ट्र या राष्ट्रपति का सम्मान प्रजा की दृष्टि में बना रहता है। 'ऐतरेय ब्राह्मण' में राजा के लिए पुरोहित का विशेष महत्त्व निरूपित किया गया है कि राजा को पुरोहित की नियुक्ति अवश्य ही करनी चाहिये। पुरोहित का कार्य राजा को नीति व कूटनीति सम्बन्धी सलाह देने का होता है और एक राजा सम्पूर्ण राष्ट्र का शासन स्वविवेक के आधार पर संचालित नहीं कर सकता है। अतः राष्ट्र का विकास, जन-जीवन की खुशी और उन्नति तभी संभव है जबकि प्रबुद्ध व्यक्ति उसका सलाहकार हो। पुरोहित को आह्वनीयाग्नि तुल्य माना गया है और उसे प्रजा का प्रतिनिधि माना जाता है वह राजा से प्रतिज्ञा कराता है कि वह अपनी प्रजा से कभी द्रोह नहीं करेगा। राजकीय-जीवन में कर्मयोग का पालन करना ही सर्वोत्तम आदर्श है। राजकार्य में 'विशः' का महत्त्व बतलाते हुए शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है- श्रीर्वैराष्ट्रम्। ………………..श्रीवैंराष्ट्रस्य भारः। ………….. श्रीर्वैराष्ट्रस्य मध्यम। …… क्षेमो वै राष्ट्रस्य शीतम। विड्वै गमो पसो राष्ट्रमेव। विश्याहन्ति तस्माद् राष्ट्रो विशं धातुकः। विशमेव राष्ट्रायाद्यां करोति तस्माद्राष्ट्री विशमत्ति न पुष्टं पशु मन्यत इति।२ अर्थात् 'श्री' का अर्थ कुछ भाष्यकारों ने विद्यादि उत्तम गुणों से युक्त नीति किया है। यदि शक्ति का केन्द्रीकरण होता है तो प्रजा का शोषण एवं उत्पीड़न होता है। जैसे मांसाहारी मनुष्य पशु को देखकर उसको मारने की इच्छा करता है, उसी प्रकार अधिनायक (राजा) प्रजा के उत्कर्ष का हनन करता है और स्वेच्छाचारी होता है। अतः समष्टि के कल्याण के लिए आवश्यक है कि जनता की सहमति ही राजा का आधार बने। आज के लोकतंत्र की रूपरेखा उसी समय निश्चित कर दी गई थी, राष्ट्र का आज का स्वरूप कोई नया नहीं है बल्कि वही आधारतत्त्व लिये हुए हैं। आज भी प्रजा के सम्यक् पालन के लिए समुचित राष्ट्रपति और प्रजा के प्रतिनिधि होने चाहिये ताकि सम्पूर्ण रूप से उन्हें भी स्थान मिल सके। जब प्रजा का सम्यक् पालन १. वाजसनेही संहिता- २६/१४ २. शतपथ ब्राह्मण १३/२/९/२-८ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar