वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 298, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 270 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता होता है तब 'ऐतरेय ब्राह्मण' के इन शब्दों का उल्लेख आवश्यक हो जाता है— ब्रह्मण एवं तद्यत्र वशमेति तपन्न वै ब्राह्मणः क्षत्रं वशमेति तद्राष्ट्रं समृद्धं तद्वीरवदाहस्मिन् वीरो जायते।¹ ऐतरेय ब्राह्मण में 'जनपद' शब्द देश के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। इन्हीं जनपदों को मिलाकर राष्ट्र का निर्माण हुआ है। इन्हीं जनपदों को मिलाकर बना हुआ राष्ट्र संगठित होता है और इस संगठन में एकता होती है। राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में जब देखते हैं तो हमारे ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् ग्रन्थों से इस बात का पूर्ण ज्ञान होता है कि इसके आधार तत्त्व इसमें समाहित हैं। २. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषदों में समाजदर्शन का अनुशीलन : समाज मानव जीवन की छवि प्रस्तुत करने का एक सफल मंच है जिन्हें वह अपने जीवन में अपनाता चला आ रहा है और जिस तरह का जीवन वह स्वयं जी रहा है। सामाजिक, आध्यात्मिक एवं नैतिक मूल्यों का जो संयुक्त रूप होता है, वह है उसका समाज दर्शन। छोटी-छोटी बातों में निहित आदर्श ही उनके दर्शन का स्पष्ट स्वरूप प्रदान करता है। वैसे तो सम्पूर्ण वैदिक काल के समाज-दर्शन का आधार एक ही रहा है, उसके कुछ कर्मों और अधिकारों में परिवर्तन अवश्य ही होता रहा है। वैदिक काल में चार वर्णों में समाज का वर्गीकरण सर्वमान्य रहा है और उसके बारे में बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्यार्थ) में स्पष्ट रूप से उल्लिखित है— तस्मात् क्षत्रात्परं नास्ति तस्माद्ब्राह्मणः क्षत्रियमधस्तादुपास्ते राजसूये क्षत्र एव तद्यशो दधाति सैषा क्षत्रस्य योनिर्यद्ब्रह्म।² अर्थात् ब्रह्म ने इस वर्ण व्यवस्था को सम्पन्न किया है। उसके आधार स्वरूप देवताओं में क्षत्रिय माने जाने वाले इन्द्र, वरुण, सोम, रुद्र, मेघ, यम और ईशानादि हैं, उनके अनुसार क्षत्रिय जाति को उत्पन्न किया है और क्षत्रियों को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। उसके अनुसार राजसूय यज्ञ में ब्राह्मण नीचे बैठकर क्षत्रिय की उपासना करता है, वह क्षत्रिय में ही अपने यश को स्थापित करता है। चूँकि ब्राह्मण की उत्पत्ति ब्रह्म से मानी जाती है अतः वह श्रेष्ठतम माना गया है और वह अपने कर्मों को १. एतरेय ब्राह्मण ८/६/९ २. बृहदारण्यकोपनिषद् १/४/११ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar