वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 299, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri सप्तम अध्याय 271 स्वयं ही निश्चित करता है। ब्राह्मण अपनी श्रेष्ठता क्षत्रिय में ही स्थापित करता है। क्षत्रियों की रचना के उपरान्त वैश्य जाति की उत्पत्ति के संदर्भ में उपनिषद् में वर्णित है— स नैव व्यभवत् स विशमसृजत यान्येतानि देवजातानि गणश आख्यान्ते वसवो रुद्रा आदित्या विश्वेदेवा मरुत इति॥१ अर्थात् वह (ब्रह्म) विभूति युक्त कर्म करने में समर्थ नहीं हुआ। उसने वैश्य जाति की रचना की। जो ये वसु, रुद्र, आदित्य, विश्वदेव और मरुत इत्यादि देवगण 'गणशः' कहे जाते हैं (उन्हें उत्पन्न किया)। क्षत्रिय जाति के द्वारा पराक्रम और शासन का कार्य तो सुचारु रूप से चलने लगा लेकिन धनोपार्जन हेतु कर्म करने में वे असमर्थ थे और इस कर्म के साधन भूतधन को उपार्जित करने के लिए वैश्य जाति की रचना की गई। इसके बाद भी कुछ कर्मों हेतु वर्ण का अभाव रहा, तब शूद्र वर्ण की उत्पत्ति की गई— स नैव व्यभवत्सशौद्रंवर्णमसृजत पूषणमियं वैपूषेयं हीदं सर्वं पुष्यति यदिदं किंच॥२ अर्थात् (फिर भी) वह विभूति युक्त कर्म करने में समर्थ नहीं हुआ। उसने शूद्र वर्ण की रचना की। पूषा शूद्रवर्ण है। यह पृथिवी ही पूषा है क्योंकि यह जो कुछ है, यही इसका पोषण करती है। इस प्रकार चारों वर्णों का विवरण प्राप्त होता है। पुरुषार्थ :- समाज की आधारशिला मानव जीवन के लिए पुरुषार्थ चतुष्ट्य में निहित कर दिया था। वह अपने सम्पूर्ण जीवन के कार्यकलापों का उपयोग इन्हीं चार पुरुषार्थों के लिए ही करता था और इनके पूर्ण होने से ही उसका जीवन सार्थक हो जाता था और परमपद मोक्ष की प्राप्ति में सफल हो जाता था। ब्राह्मण ग्रन्थों में “शाङ्खायन-ब्राह्मण” के अनुसार मानव जीवन चतुष्ट्यात्मक है। भाष्यकार विनायक के अनुसार³ 'चतुष्ट्य' शब्द पुरुषार्थों के लिए प्रयोग किया गया है और यह अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष की ओर लक्षित करता है। १. बृहदारण्यकोपनिषद् १/४/१२ २. बृहदारण्यकोपनिषद् १/४/१३ ३. शतपथ ब्राह्मण (वेंकटेश्वर प्रेस मुम्बई) से उपोद्घात् से। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar