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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 300, कुल 353 में से

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पृष्ठ 300

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 272 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता तैत्तिरीय ब्राह्मण में भी ब्रह्मचर्य के पालन पर विशेष बल दिया गया है। कर्म करना ही मनुष्य का धर्म होना चाहिए। इन कर्मों का आधार धर्म होना चाहिए। अधर्मपूर्ण कार्य व्यक्ति को दिशाहीन बना देते हैं। अर्थ की प्राप्ति के लिए प्रयत्न आवश्यक है, लेकिन धन प्राप्ति के बाद भी त्यागमय जीवन व्यतीत करना चाहिये, धन के प्रति प्रलोभित नहीं होना चाहिये— ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्चत् जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम्॥१ द्वितीय मंत्र में कर्मयोग के सिद्धान्त की प्रस्तुति है— कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः। एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे।। अर्थ और काम के प्रलोभनवश कोई भी कार्य करना आत्मघात के सदृश माना गया है। अर्थ के मोह से व्यक्ति कभी मुक्त नहीं हो सकता है और उससे कभी तृप्त भी नहीं होता है। इसीलिये अर्थ को आवश्यक समझते हुए ही अर्जित करना श्रेयस्कर है। संग्रह की एषणा ही उसे कुमति प्रदान करती है। इसीलिये— श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसोवृणीते। प्रेयो मन्दोयोग क्षेमाद् वृणीते॥२ अर्थात् मन्दबुद्धि भले ही प्रेय (लौकिक भोगों) की आकांक्षा करे, लेकिन प्रबुद्ध व्यक्ति श्रेय (परम कल्याण) की ही इच्छा करता है। उनमें शेष तीन पुरुषार्थों की पूर्ति के बाद मोक्ष के लिए प्रयत्नशील हो जाना चाहिये अर्थात् ईश्वर आराधना में लीन होकर मोक्ष प्राप्त करना चाहिये। आश्रम व्यवस्था :- उपनिषदों के अनुसार एक व्यक्ति को १०० वर्ष के जीवन की कामना करनी चाहिये और उन सौ वर्ष के जीवन को पुरुषार्थ के अनुसार ही चार भागों में विभक्त कर देना चाहिये और यह चार भाग— ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यास आश्रम के रूप में जाने जाते हैं। शाङ्खायन ब्राह्मण में पुरुष के शतायुष्य, उत्सवमयता, शताधिक-पराक्रमों और ऐन्द्रिक सामर्थ्य की आकांक्षा व्यक्त की गई है— शतायुर्वे पुरुषः।३ १. ईशोपनिषद् १. २. कठोपनिषद् १/२/२ ३. शाङ्खायन ब्राह्मण १७/७ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar