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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 301, कुल 353 में से

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पृष्ठ 301

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri सप्तम अध्याय 273 तथा— शतायुर्वै पुरुष शतपर्वा शतवीर्यः शतेन्द्रियः।१ इस प्रकार सौ वर्ष की आयु को २५-२५ वर्ष के चार वर्गों में विभाजित करके उनके लिये एक-एक आश्रम निश्चित किया गया है। 'छान्दोग्योपनिषद्' में धर्म के तीन आधारभूत स्कन्ध निरूपित हैं— “त्रयो धर्म स्कन्धा।”२ धर्म के प्रतिष्ठाकारक प्रथम स्कन्ध में यज्ञ, अध्ययन और दान सम्मिलित है। यह समस्त कार्य ब्रह्मचर्य आश्रम में सम्पन्न करने चाहिये। सम्पूर्ण निष्ठा के साथ यह कार्य ब्रह्मचारी को पूर्ण करने होते हैं। सम्पूर्ण वेद-पुराणों और समस्त ग्रन्थों से ज्ञान अर्जित कर ही उसे धर्म के अनुसार आचरण करना चाहिये। द्वितीय स्कन्ध तपोमूलक है और तृतीय स्कन्ध आचार्य कुलवासी ब्रह्मचारी की साधना से अनुस्यूत है। शाङ्कर-भाष्य से विदित होता है कि धर्म की प्रस्तुत स्कन्धत्रयी की योजना विविध आश्रमों के अनुरूप ही हुई है। इस दृष्टि से यज्ञ, अध्ययन और दान गृहस्थ साध्य है। तपस्या का अनुष्ठान सामान्यतः सभी के लिए कल्याणसाधन होने पर भी मुख्यतः वानप्रस्थियों के द्वारा ही विधेय है। उसके साथ ही संन्यास आश्रम में सभी सांसारिक, भौतिक सुखों एवं वस्तुओं को त्याग कर ईश्वर प्राप्ति के लिए तप करने का प्राविधान है और वही मोक्ष प्राप्त करने की अवस्था है। उस आश्रम में वह पुत्र, पत्नी, गृह सब त्याग देता है— मैत्रेयीति होवाच याज्ञवल्क्य उद्यास्यन्वा अरेऽहमस्मात्स्थानादस्मि हन्त तेऽनया कात्यायन्यान्तं करवाणीति॥३ अर्थात् “याज्ञवल्क्य ने अपनी पत्नी मैत्रेयी से कहा कि मैं इस गृहस्थाश्रम से ऊपर संन्यास आश्रम में जाने वाला हूँ। अतः मैं तुम्हारी अनुमति चाहता हूँ और अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति का बँटवारा कात्यायनी और तेरे मध्य कर दूँ।” इससे स्पष्ट होता है कि संन्यास आश्रम में व्यक्ति सभी भौतिक वस्तुओं को त्याग देता है और तन-मन से ईश्वर भक्ति में लीन हो जाना चाहता है। स्त्री की स्थिति : वैदिक युग में नारी को पूर्ण सम्मान प्राप्त था। वह पुरुषों से किसी भी दृष्टि से हीन नहीं समझी जाती थी। शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार उसे ब्रह्मचारियों की तरह ही प्राप्त था। तत्पश्चात् अपने अनुरूप वर से ही विवाह करने १. शाङ्खायन ब्राह्मण १८/१० २. छान्दोग्योपनिषद् २/३१/१ ३. बृहदारण्यकोपनिषद् १/४/१ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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