वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 302, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 274 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता की अनुमति प्रदान की गई थी। 'शतपथ ब्राह्मण' के अनुसार पत्नी को पुरुष की आत्मा का आधा भाग स्वीकार किया गया है- अर्धो हवा एष आत्मनो याज्जाया।१ स्त्री के बिना सामाजिक या धार्मिक अनुष्ठान की पूर्ति सम्भव नहीं थी। यही स्थिति नारी की स्थिति को व्यक्त करने के लिए ऐतरेय ब्राह्मण से ज्ञात होता है कि उस समय समाज में स्त्रियों को विशिष्ट स्थान प्राप्त था। कहा गया है कि पत्नी को प्राप्त करके ही पुरुष पूर्ण होता है- पुरुषो जायां वित्त्वा कृत्स्नतमिवात्मानं मन्यते।२ इस प्रकार उपनिषद्, ब्राह्मण और आरण्यक में प्रस्तुत सामाजिक दर्शन में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के लिए एक ऐसा वातावरण प्रस्तुत होता है जिससे एक सुदृढ़ राष्ट्र का निर्माण होता है। हमारे वैदिक वाङ्मय ने इस देश की मिट्टी में, हवा में और वातावरण में अपने मंत्रों, ऋचाओं से एकता के सूत्र में बद्ध रहने का वेदमंत्र प्रदान किया है। ३. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषदों के राजदर्शन का अनुशीलन : राजनीति मानवसमाज का अपरिहार्य अंग है। वैदिक युग में एक सुव्यवस्थित, कल्याणकेन्द्रित और सर्वाभिमुखी राजनैतिक व्यवस्था दिखलाई देती है। ऐतरेय ब्राह्मण में 'जनपद' शब्द देश के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। इन्हीं जनपदों को मिलाकर राष्ट्र का निर्माण हुआ था। ब्राह्मण ग्रन्थों में राज्यों की समृद्धि और सांस्कृतिक दृष्टि से उन्नति का विशेष उल्लेख है। इस बात से यह ज्ञात होता है कि राजा उस समय अपने दायित्वों को पूर्ण निष्ठा से निभाते थे। उपनिषदों में राज्यों के ब्रह्मवादियों एवं याज्ञिकों का भी विशेष उल्लेख मिलता है। ऐतरेय ब्राह्मण में जिन शासन प्रणालियों का उल्लेख प्राप्त होता है उनमें से कुछ राजतांत्रिक थीं और कुछ लोकतांत्रिक। इस ग्रन्थ के अन्तिम अध्याय में पुरोहित को विशेष महत्त्व प्रदान किया गया है। राजा द्वारा पुरोहित की नियुक्ति पर विशेष बल दिया गया है। पुरोहित राजा के कार्यों में सलाहकार की भूमिका निभाता है और चूँकि १. शतपथ ब्राह्मण ५/२१/१० २. ऐतरेय ब्राह्मण १/३/५ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar