वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 303, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri सप्तम अध्याय 275 वह प्रजा का प्रतिनिधि होता है, अतः वह प्रजा के अधिकारों एवं उनके हितों की रक्षा के लिए राजा को सदैव सलाह देता है। वह राजा से राज्याभिषेक के समय यह प्रतिज्ञा कराता है कि वह अपनी प्रजा से कभी द्रोह नही करेगा। ऐतरेय ब्राह्मण के एक उल्लेख से ज्ञात होता है कि राजसत्ता का उदय पारस्परिक अनुबन्ध से हुआ।१ उपनिषदों से ज्ञात होता है कि आरम्भ में इतना आत्मानुशासन था कि समाज में अपराधियों का अस्तित्व ही नहीं था। अतः राजसत्ता की कोई आवश्यकता नहीं की गई। धर्म ही समाज का नियंत्रक था। ऋग्वेदीय संज्ञान सूत्र के निम्नलिखित सुप्रसिद्ध मंत्र में, समिति में भाग लेने वालों के सन्दर्भ में वैचारिक एकता पर बल दिया गया है- स॒मा॒नो मन्त्रः॒ समि॑तिः समा॒नी स॒मानं॒ मनः॑ स॒ह चि॒त्तमे॑षाम्।२ वैचारिक एकता से ही राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता की कामना की जा सकती है। राष्ट्रीय सभा और समितियों का निर्माण जनप्रतिनिधियों के द्वारा होता है और उनकी वैचारिक एकता सम्पूर्ण राष्ट्र की एकता और अखण्डता का द्योतक है। ४. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषदों के धर्मदर्शन का अनुशीलन : समस्त वैदिककालीन ग्रंथों का आधार ही धर्म है। इसमें चाहे वर्णन राजनैतिक व्यवस्था का हो, सामाजिक व्यवस्था या कि आर्थिक व्यवस्था का- सभी का आधार धर्म ही रहा है। धर्मानुसार किया गया आचरण सदैव ही समाज द्वारा स्वीकृत होता है। उपनिषदों में धार्मिकअनुष्ठानों का प्रमुख प्रयोजन विश्वात्मभाव की अनुभूति कराना है। याग के समान अन्य धर्मानुष्ठानों की मूल प्रेरणा आनन्द प्राप्ति है और वह अन्तःकरण की व्यापकता तथा उदारता में निहित है। एतदर्थ छान्दोग्योपनिषद् में भूमा शब्द का प्रयोग है, जो स्वयं सुख स्वरूप है- यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति। ३ 'भूमा' का अभिप्राय सबको अपना समझना है। ऊपर-नीचे, आगे- पीछे, दायें-बायें सर्वत्र आत्मभाव की अनुभूति ही 'भूमा' है। १. ऐतरेय ब्राह्मण १/१४ २. ऋग्वेद संहिता १०/१९१/३ ३. छान्दोग्योपनिषद् ७/२३/१ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar