वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 272 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता तैत्तिरीय ब्राह्मण में भी ब्रह्मचर्य के पालन पर विशेष बल दिया गया है। कर्म करना ही मनुष्य का धर्म होना चाहिए। इन कर्मों का आधार धर्म होना चाहिए। अधर्मपूर्ण कार्य व्यक्ति को दिशाहीन बना देते हैं। अर्थ की प्राप्ति के लिए प्रयत्न आवश्यक है, लेकिन धन प्राप्ति के बाद भी त्यागमय जीवन व्यतीत करना चाहिये, धन के प्रति प्रलोभित नहीं होना चाहिये— ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्चत् जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम्॥१ द्वितीय मंत्र में कर्मयोग के सिद्धान्त की प्रस्तुति है— कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः। एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे।। अर्थ और काम के प्रलोभनवश कोई भी कार्य करना आत्मघात के सदृश माना गया है। अर्थ के मोह से व्यक्ति कभी मुक्त नहीं हो सकता है और उससे कभी तृप्त भी नहीं होता है। इसीलिये अर्थ को आवश्यक समझते हुए ही अर्जित करना श्रेयस्कर है। संग्रह की एषणा ही उसे कुमति प्रदान करती है। इसीलिये— श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसोवृणीते। प्रेयो मन्दोयोग क्षेमाद् वृणीते॥२ अर्थात् मन्दबुद्धि भले ही प्रेय (लौकिक भोगों) की आकांक्षा करे, लेकिन प्रबुद्ध व्यक्ति श्रेय (परम कल्याण) की ही इच्छा करता है। उनमें शेष तीन पुरुषार्थों की पूर्ति के बाद मोक्ष के लिए प्रयत्नशील हो जाना चाहिये अर्थात् ईश्वर आराधना में लीन होकर मोक्ष प्राप्त करना चाहिये। आश्रम व्यवस्था :- उपनिषदों के अनुसार एक व्यक्ति को १०० वर्ष के जीवन की कामना करनी चाहिये और उन सौ वर्ष के जीवन को पुरुषार्थ के अनुसार ही चार भागों में विभक्त कर देना चाहिये और यह चार भाग— ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यास आश्रम के रूप में जाने जाते हैं। शाङ्खायन ब्राह्मण में पुरुष के शतायुष्य, उत्सवमयता, शताधिक-पराक्रमों और ऐन्द्रिक सामर्थ्य की आकांक्षा व्यक्त की गई है— शतायुर्वे पुरुषः।३ १. ईशोपनिषद् १. २. कठोपनिषद् १/२/२ ३. शाङ्खायन ब्राह्मण १७/७ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri सप्तम अध्याय 273 तथा— शतायुर्वै पुरुष शतपर्वा शतवीर्यः शतेन्द्रियः।१ इस प्रकार सौ वर्ष की आयु को २५-२५ वर्ष के चार वर्गों में विभाजित करके उनके लिये एक-एक आश्रम निश्चित किया गया है। 'छान्दोग्योपनिषद्' में धर्म के तीन आधारभूत स्कन्ध निरूपित हैं— “त्रयो धर्म स्कन्धा।”२ धर्म के प्रतिष्ठाकारक प्रथम स्कन्ध में यज्ञ, अध्ययन और दान सम्मिलित है। यह समस्त कार्य ब्रह्मचर्य आश्रम में सम्पन्न करने चाहिये। सम्पूर्ण निष्ठा के साथ यह कार्य ब्रह्मचारी को पूर्ण करने होते हैं। सम्पूर्ण वेद-पुराणों और समस्त ग्रन्थों से ज्ञान अर्जित कर ही उसे धर्म के अनुसार आचरण करना चाहिये। द्वितीय स्कन्ध तपोमूलक है और तृतीय स्कन्ध आचार्य कुलवासी ब्रह्मचारी की साधना से अनुस्यूत है। शाङ्कर-भाष्य से विदित होता है कि धर्म की प्रस्तुत स्कन्धत्रयी की योजना विविध आश्रमों के अनुरूप ही हुई है। इस दृष्टि से यज्ञ, अध्ययन और दान गृहस्थ साध्य है। तपस्या का अनुष्ठान सामान्यतः सभी के लिए कल्याणसाधन होने पर भी मुख्यतः वानप्रस्थियों के द्वारा ही विधेय है। उसके साथ ही संन्यास आश्रम में सभी सांसारिक, भौतिक सुखों एवं वस्तुओं को त्याग कर ईश्वर प्राप्ति के लिए तप करने का प्राविधान है और वही मोक्ष प्राप्त करने की अवस्था है। उस आश्रम में वह पुत्र, पत्नी, गृह सब त्याग देता है— मैत्रेयीति होवाच याज्ञवल्क्य उद्यास्यन्वा अरेऽहमस्मात्स्थानादस्मि हन्त तेऽनया कात्यायन्यान्तं करवाणीति॥३ अर्थात् “याज्ञवल्क्य ने अपनी पत्नी मैत्रेयी से कहा कि मैं इस गृहस्थाश्रम से ऊपर संन्यास आश्रम में जाने वाला हूँ। अतः मैं तुम्हारी अनुमति चाहता हूँ और अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति का बँटवारा कात्यायनी और तेरे मध्य कर दूँ।” इससे स्पष्ट होता है कि संन्यास आश्रम में व्यक्ति सभी भौतिक वस्तुओं को त्याग देता है और तन-मन से ईश्वर भक्ति में लीन हो जाना चाहता है। स्त्री की स्थिति : वैदिक युग में नारी को पूर्ण सम्मान प्राप्त था। वह पुरुषों से किसी भी दृष्टि से हीन नहीं समझी जाती थी। शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार उसे ब्रह्मचारियों की तरह ही प्राप्त था। तत्पश्चात् अपने अनुरूप वर से ही विवाह करने १. शाङ्खायन ब्राह्मण १८/१० २. छान्दोग्योपनिषद् २/३१/१ ३. बृहदारण्यकोपनिषद् १/४/१ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 274 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता की अनुमति प्रदान की गई थी। 'शतपथ ब्राह्मण' के अनुसार पत्नी को पुरुष की आत्मा का आधा भाग स्वीकार किया गया है- अर्धो हवा एष आत्मनो याज्जाया।१ स्त्री के बिना सामाजिक या धार्मिक अनुष्ठान की पूर्ति सम्भव नहीं थी। यही स्थिति नारी की स्थिति को व्यक्त करने के लिए ऐतरेय ब्राह्मण से ज्ञात होता है कि उस समय समाज में स्त्रियों को विशिष्ट स्थान प्राप्त था। कहा गया है कि पत्नी को प्राप्त करके ही पुरुष पूर्ण होता है- पुरुषो जायां वित्त्वा कृत्स्नतमिवात्मानं मन्यते।२ इस प्रकार उपनिषद्, ब्राह्मण और आरण्यक में प्रस्तुत सामाजिक दर्शन में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के लिए एक ऐसा वातावरण प्रस्तुत होता है जिससे एक सुदृढ़ राष्ट्र का निर्माण होता है। हमारे वैदिक वाङ्मय ने इस देश की मिट्टी में, हवा में और वातावरण में अपने मंत्रों, ऋचाओं से एकता के सूत्र में बद्ध रहने का वेदमंत्र प्रदान किया है। ३. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषदों के राजदर्शन का अनुशीलन : राजनीति मानवसमाज का अपरिहार्य अंग है। वैदिक युग में एक सुव्यवस्थित, कल्याणकेन्द्रित और सर्वाभिमुखी राजनैतिक व्यवस्था दिखलाई देती है। ऐतरेय ब्राह्मण में 'जनपद' शब्द देश के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। इन्हीं जनपदों को मिलाकर राष्ट्र का निर्माण हुआ था। ब्राह्मण ग्रन्थों में राज्यों की समृद्धि और सांस्कृतिक दृष्टि से उन्नति का विशेष उल्लेख है। इस बात से यह ज्ञात होता है कि राजा उस समय अपने दायित्वों को पूर्ण निष्ठा से निभाते थे। उपनिषदों में राज्यों के ब्रह्मवादियों एवं याज्ञिकों का भी विशेष उल्लेख मिलता है। ऐतरेय ब्राह्मण में जिन शासन प्रणालियों का उल्लेख प्राप्त होता है उनमें से कुछ राजतांत्रिक थीं और कुछ लोकतांत्रिक। इस ग्रन्थ के अन्तिम अध्याय में पुरोहित को विशेष महत्त्व प्रदान किया गया है। राजा द्वारा पुरोहित की नियुक्ति पर विशेष बल दिया गया है। पुरोहित राजा के कार्यों में सलाहकार की भूमिका निभाता है और चूँकि १. शतपथ ब्राह्मण ५/२१/१० २. ऐतरेय ब्राह्मण १/३/५ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri सप्तम अध्याय 275 वह प्रजा का प्रतिनिधि होता है, अतः वह प्रजा के अधिकारों एवं उनके हितों की रक्षा के लिए राजा को सदैव सलाह देता है। वह राजा से राज्याभिषेक के समय यह प्रतिज्ञा कराता है कि वह अपनी प्रजा से कभी द्रोह नही करेगा। ऐतरेय ब्राह्मण के एक उल्लेख से ज्ञात होता है कि राजसत्ता का उदय पारस्परिक अनुबन्ध से हुआ।१ उपनिषदों से ज्ञात होता है कि आरम्भ में इतना आत्मानुशासन था कि समाज में अपराधियों का अस्तित्व ही नहीं था। अतः राजसत्ता की कोई आवश्यकता नहीं की गई। धर्म ही समाज का नियंत्रक था। ऋग्वेदीय संज्ञान सूत्र के निम्नलिखित सुप्रसिद्ध मंत्र में, समिति में भाग लेने वालों के सन्दर्भ में वैचारिक एकता पर बल दिया गया है- स॒मा॒नो मन्त्रः॒ समि॑तिः समा॒नी स॒मानं॒ मनः॑ स॒ह चि॒त्तमे॑षाम्।२ वैचारिक एकता से ही राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता की कामना की जा सकती है। राष्ट्रीय सभा और समितियों का निर्माण जनप्रतिनिधियों के द्वारा होता है और उनकी वैचारिक एकता सम्पूर्ण राष्ट्र की एकता और अखण्डता का द्योतक है। ४. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषदों के धर्मदर्शन का अनुशीलन : समस्त वैदिककालीन ग्रंथों का आधार ही धर्म है। इसमें चाहे वर्णन राजनैतिक व्यवस्था का हो, सामाजिक व्यवस्था या कि आर्थिक व्यवस्था का- सभी का आधार धर्म ही रहा है। धर्मानुसार किया गया आचरण सदैव ही समाज द्वारा स्वीकृत होता है। उपनिषदों में धार्मिकअनुष्ठानों का प्रमुख प्रयोजन विश्वात्मभाव की अनुभूति कराना है। याग के समान अन्य धर्मानुष्ठानों की मूल प्रेरणा आनन्द प्राप्ति है और वह अन्तःकरण की व्यापकता तथा उदारता में निहित है। एतदर्थ छान्दोग्योपनिषद् में भूमा शब्द का प्रयोग है, जो स्वयं सुख स्वरूप है- यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति। ३ 'भूमा' का अभिप्राय सबको अपना समझना है। ऊपर-नीचे, आगे- पीछे, दायें-बायें सर्वत्र आत्मभाव की अनुभूति ही 'भूमा' है। १. ऐतरेय ब्राह्मण १/१४ २. ऋग्वेद संहिता १०/१९१/३ ३. छान्दोग्योपनिषद् ७/२३/१ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 276 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता छान्दोग्य-उपनिषद् में बहुविध उपासना में विद्या, श्रद्धा और योग की आवश्यकता होती है। यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवतीति।¹ इसके साथ ही मनन-चिन्तन, विज्ञान और निष्ठा की अपरिहार्यता भी प्रदर्शित है। अभिमत-विशेष का प्रमाद रहित होकर ध्यान करना ही उपासना है- ध्यायात् न प्रमत्तः।² धर्म के बारे में बृहदारण्यकोपनिषद् में इस प्रकार वर्णित किया गया है-- अयं धर्मः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्धर्मे तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं धर्मस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदꣳ सर्वम्॥³ अर्थात् यह धर्म समस्त भूतों का मधु है तथा समस्त भूत इस धर्म के मधु है। इस धर्म में जो यह तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म धर्मसम्बन्धी तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है'। 'यह अमृत है', 'यह ब्रह्म है', 'यह सत्य है'। कठोपनिषद् में आत्मज्ञान के लिए तर्क, प्रवचन एवं बुद्धिजन्य उपायों को अपर्याप्त समझा गया है। इसके लिए अपने को सुपात्र बनाना पड़ता है। ताकि आत्मतत्त्व स्वयं वरण कर सकें। जो मनुष्य विज्ञान (विवेक) सारथि से सम्पन्न और मनरूप लगाम वाला है, वही परम पद प्राप्त करता है। कठोपनिषद् सावधान करता है कि हम अज्ञाननिद्रा से उठें, जागें और श्रेष्ठ पुरुषों के समीप जाकर ज्ञान प्राप्त करें। सम्पूर्ण ग्रन्थों में धर्माचरण का उपदेश दिया गया है। ईश्वर की प्राप्ति ही एक मात्र उद्देश्य मानकर मानव जीवन में सदैव सत्याचरण करके परम पद की प्राप्ति करें। ५. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषदों के आचारदर्शन, शिक्षादर्शन तथा अर्थदर्शन का अनुशीलन : राष्ट्र का निर्माण मनुष्यों के द्वारा होता है और मनुष्यों के चारित्रिक बल, नैतिक मूल्य एवं आध्यात्मिक विचारधारा से ही राष्ट्र की दृढ़ता में शक्ति का समावेश होता है। हमारे धर्म ग्रन्थ, वैदिक वाङ्ग्मय ही हमें नैतिक मूल्यों, जीवन आदर्शों और आध्यात्मिक आधारों से अवगत कराते हैं। १. छान्दोग्योपनिषद् १/१/१० २. छान्दोग्योपनिषद् १/३/१२ ३. बृहदारण्यकोपनिषद् २/५/११ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri सप्तम अध्याय 277 ऐतरेय ब्राह्मण में नैतिक मूल्यों और उदात्त आचार-व्यवहार के सिद्धान्तों पर विशेष बल दिया गया है। प्रथम अध्याय के षष्ठ खण्ड में वर्णित है कि दीक्षित यजमान को सत्य ही बोलना चाहिए- ऋतं वाव दीक्षा सत्यं दीक्षा तस्माद्दीक्षितेन सत्यमेव वदितव्यम्। शाङ्ख्यायनब्राह्मण में भी मानवीय आचार के नियामक और निर्देशक तत्त्व बाहुल्य में उपलब्ध होते हैं। व्यक्ति के लिए वाणी परम उपादेय सिद्ध होती है। इस बारे में शाङ्ख्यायन ब्राह्मणकार का कथन है- अथो वाग्वै सार्पराज्ञी। वाग्वि सर्प तो राज्ञी।१ शतपथ ब्राह्मण में श्रम एवं तप का महत्त्व पौनः पुन्येन प्रदर्शित है।२ अनृतभाषी को अमेध्य कहा गया है- अमेध्यों वै पुरुषो यदनृतं वदति।३ तैत्तिरीय ब्राह्मण के अनुसार मनुष्य का आचरण देवों के समान होना चाहिये- इति देवा अकुर्वत। इत्यु वै मनुष्याः कुर्वति।४ सत्यभाषण, वाणी की मधुरता, तपोमय जीवन, अतिथि सत्कार, संगठनशीलता, सम्पत्ति के परोपकार हेतु विनियोग, मांस-भक्षण से दूर रहने तथा ब्रह्मचर्य के पालन पर विशेष बल दिया गया है। 'अहिताग्नि-व्यक्ति' को असत्य कदापि नहीं बोलना चाहिए क्योंकि तेजोमयता सत्य से ही है- 'अहिताग्निः न अनृतं वदेत।' तपोमय-जीवन, 'तैत्तिरीय-ब्राह्मण' में प्रतिपादित, द्वितीय महनीय जीवन मूल्य है- तपस्या से देवों ने उच्च स्थिति प्राप्त की, ऋषियों ने स्वर्गिक सुख पाया और शत्रुओं का विनाश किया- तपसा देवा देवतामग्रआयन् तपसृषयः स्वर्गमन्वविन्दन्। तपसा सपत्नान् प्रणुदोमशतीः।५ गोपथ ब्राह्मण के अनुसार मन का बहुत महत्त्व है। आदमी मन से जो सोचता है, वही होता है- १. कौषीतकि ब्राह्मण २६/४ २. शतपथ ब्राह्मण १४/१/१/१ ३. शतपथ ब्राह्मण १/१/१ ४. तैत्तिरीय ब्राह्मण १/५/९/४ ५. तैत्तिरीय ब्राह्मण ३/१२/३/१ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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278 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता स मनसा ध्यायेद् यद् वा अहं किञ्च मनसा ध्यास्यामि तदैव या तद् भविष्यति। यद्धस्म तथैव भवति।१ ब्राह्मणकार ने आधे-अधूरेपन से कार्य करने से मना किया है। द्वितीय पाठक में ब्रह्मचारी के कर्तव्यों का विस्तार से निरूपण किया गया है। ऐन्द्रिय रागों एवं आकर्षणों से बचने की सलाह दी गई है। स्त्री सम्पर्क, दूसरों को कष्ट पहुँचाना, ऊँचे आसन पर बैठना उसके लिए वर्जित बताया गया है। संरक्षित धर्म ही उसकी रक्षा करता है— 'धर्मो हैनं गुप्तो गोपायति' ।२ संभवतः यही गोपथ ब्राह्मणोक्ति सूक्ति लौकिक संस्कृत में 'धर्मो रक्षितः' में परिणत हो गई। आचार की दृष्टि से गोपथ ब्राह्मण का स्तर अत्यन्त उच्च और उदात्त है। आरण्यक-साहित्य भी नैतिकता और आचार-दर्शन की दृष्टि से मानवीय मानस के ऊर्ध्वारोहण में परम सहायक है। वैदिकवाङ्ग्मय से प्राप्त शिक्षादर्शन बहुत ही महत्त्वपूर्ण था। उस काल की शिक्षा का उद्देश्य मात्र ज्ञान प्राप्त करना नहीं था अपितु उसे जीवन में आत्मसात कर लेना ही ब्रह्मचारी की शिक्षा परीक्षा और सफलता मानी जाती थी। शिक्षा काल के दौरान ब्रह्मचर्य का पालन इस बात का द्योतक है कि सम्पूर्ण इन्द्रियों एवं मस्तिष्क को शिक्षा ग्रहण करने के लिए केन्द्रित करके अध्ययन कार्य सम्पन्न करना। इसी तरह से गुरु भी अपने शिष्यों की सफलता को अपने शिक्षा दान की सफलता मानता था। शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य मानव की प्राकृतिक शक्तियों को सुविकसित कर उसे जीवन की समस्याओं को सुलझाने में समर्थ बनाना था। तपस्या के अनुष्ठानपूर्वक वेद और सत्य का ज्ञान प्राप्त करना ही विद्यार्थी की चर्चा थी जिससे वह मृत्यु तक पर विजय प्राप्त कर सके। तत्कालीन शिक्षादर्शन स्मृति, धारणा और बोध तीनों पर आश्रित थी। ज्ञान प्राप्त करने की अदम्य जिज्ञासा से ओतप्रोत उदाहरण नचिकेता है, जिन्होंने यम सरीखे गुरु के पास जाकर मृत्यु का रहस्य सीखना चाहा था और यमराज द्वारा विविध प्रलोभनों से डिगाये जाने पर भी वह सर्वथा अविचलित रहा। तब यम ने स्वयं नचिकेता की पात्रता को स्वीकार करते हुये कहा— स त्वं प्रियान्प्रियरूपांश्च कामानभिध्यायन्नचिकेतोऽत्यस्त्राक्षीः। नैतां सृङ्कां वित्तमयीमवाप्तो यस्यां मज्जन्ति बहवो मनुष्याः॥३ १. गोपथ ब्राह्मण १/१/९ २. गोपथ ब्राह्मण १/२/४ ३. कठोपनिषद् १/२/३
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सप्तम अध्याय 279 अर्थात् 'यमराज कहते हैं- हे नचिकेता! तुम्हारी परीक्षा करके मैंने अच्छी तरह देख लिया कि तुम बड़े बुद्धिमान्, विवेकी और वैराग्यसम्पन्न हो। अपने को बहुत बड़े चतुर, विवेकी और तार्किक मानने वाले लोग भी जिस चमक-दमक वाली सम्पत्ति के मोहजाल में फँस जाया करते हैं, उसे भी तुमने स्वीकार नहीं किया। मैंने बड़ी ही लुभावनी भाषा में तुम्हें बार-बार पुत्र, पौत्र, हाथी, घोड़े, गौयें, धन, सम्पत्ति, भूमि आदि अनेकों दुष्प्राप्य और लोभनीय भोगों का प्रलोभन दिया। इतना ही नहीं स्वर्ग के दिव्य भोगों और अप्रतिम सुन्दरी स्वर्गीय रमणियों के चिर-भोग सुख का लालच दिया, किन्तु तुमने सहज ही उन सबकी उपेक्षा कर दी। अतः तुम अवश्य ही परमात्मतत्त्व का श्रवण करने के सर्वोत्तम अधिकारी हो।' इस प्रकार की शिक्षा व्यक्ति को एक आदर्श नागरिक बना सकती है। सत्याचरण, धर्माचरण का पाठ सदैव ही पढाया गया है। ऐसे ही नागरिक राष्ट्रीयएकता और अखण्डता के लिए प्रतीक बन जाते हैं। ६. राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता को ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषदों का प्रदेय : राष्ट्र की भूमिका मानव जीवन में सर्वोपरि रही है। एक स्वतंत्र राष्ट्र, सुयोग्य शासक, धन-धान्य से परिपूर्ण भूमि और सुरक्षित देश की सीमाओं में ही नागरिक सुख-चैन की साँस लेकर, अपने समाज तथा राष्ट्र की प्रगति के बारे में विचार कर सकता है। एक व्यक्ति के लिए कर्मनिष्ठ जीवन और पुरुषार्थ साधन का महत्त्व सर्वाधिक होता है। उसके इन्हीं गुणों एवं कार्यों से राष्ट्र के प्रति योगदान की गणना होती है जिसके कारण राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता को किसी प्रत्यक्ष सम्बल की आवश्यकता अनुभव नहीं होती है, अपितु प्रत्येक मानव के जन्म से लेकर दी जाने वाली शिक्षा, वातावरण और सामाजिक तथा नैतिक मूल्यों से ही उसकी आधारशिला सुदृढ़ होती है। ऐतरेय ब्राह्मण में 'शुनःशेप' से सम्बद्ध आख्यान में दिया गया उपदेश व्यक्ति को कर्मण्यता की ओर ले जाता है। कहा गया है कि "बिना थके हुए 'श्री' नहीं मिलती।" जो विचरता है, उसके पैर पुष्पयुक्त होते हैं, उसकी आत्मा फल को उगाती और काटती है। भ्रमण के श्रम से उसकी समस्त पापराशि नष्ट हो जाती है। बैठे हुए व्यक्ति का भाग्य भी बैठ जाता है और सोते हुए व्यक्ति का सो जाता है और चलते हुए का चलता रहता है। चलते हुए ही मनुष्य स्वादिष्ट फल प्राप्त करता है। सूर्य के श्रम को देखो, जो चलते हुए कभी आलस्य नहीं करता-
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 280 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता सूर्यस्य पस्य शृङ्गार यो न तन्द्रयते चरंश्चरैवेति।१ इस प्रकार के कर्मठ नागरिकों के जीवन सन्देश से राष्ट्र स्वयं सुदृढ़ होता है। राष्ट्र की शक्ति वैचारिक एकता एवं आपसी सद्भाव से ही बढ़ती है, शस्त्रों की होड़ और युद्ध के लिए तैयार सैनिकों से नहीं। हमारे ब्राह्मण ग्रन्थ, आरण्यक और उपनिषद् वास्तविक अर्थों में मनुष्य को मानवता से परिचित कराते हैं। राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता के लिए आवश्यक है कि सभी राष्ट्रवासी आपस में हिल-मिलकर रहें क्योंकि उसमें निहित प्रेम की भावना उन्हें एकता के सूत्र में बाँधती है। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै।।२ इस मंत्र का आशय आपस में स्नेहसूत्र में बँधे रहने तथा एक दूसरे कें प्रति कभी विद्वेष न रखने से है। यही भावना उन्हें एक दूसरे के सुख-दुःख में सहयोग देने के लिए प्रेरित करती है। 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की अवधारणा हमारे ऋषि और मुनियों द्वारा ही प्रदान की गई है। इस दिशा में ईशोपनिषद् के निम्न मंत्र से स्वयं की सर्वत्र व्यापकता मनुष्य को एक उच्च विचारधारा प्रदान करती है। जब व्यक्ति स्वयं को ही देखेगा तो उसके लिए घृणा और विद्वेष के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता है। यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति। सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते॥ सबसे अधिक समाज में व्यक्ति के भावों और कर्मों का महत्त्व होता है। चरित्रवान् नागरिकों से ही राष्ट्र की एकता और अखण्डता को बल प्राप्त होता है। यह ग्रन्थ ही हिन्दू संस्कृति के लिए बहुत ही आदरणीय है। उनका महत्त्व हर युग में समान ही रहा है। वे कारक, जो पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति के प्रभाव से पनपने लगे हैं, उनके प्रभाव को मुक्त कराने के लिए ही हमारी वैदिकग्रन्थों की उपादेयता बहुत अधिक बढ़ जाती है। हमारे ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् ग्रन्थों से प्राप्त शिक्षा ही आज भी देश को विश्व में एक महत्त्वपूर्ण स्थान दिलाये हुए है और पाश्चात्य विद्वान् भी इन ग्रन्थों के अध्ययन हेतु उत्सुक रहते हैं। हमारे राष्ट्र की अनेकता में एकता का आधार यही वैदिक साहित्य है। सभी के चारित्रिक बल का आधार यही है। विभिन्न भाषाओं की उपस्थिति के बाद भी वेदों, उपनिषदों, सभी का ज्ञान सभी विद्वानों को है और वे उन तथ्यों को स्वीकार करते हैं। १. ऐतरेय ब्राह्मण ३३/१ २. कठोपनिषद् CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri अष्टम अध्याय गृह्यसूत्र एवं धर्मसूत्र में राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता का अनुशीलन १. गृह्यसूत्र एवं धर्मसूत्र में निरूपित राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के आधार तत्त्व- वैदिकवाङ्मय की शाखाओं और प्रशाखाओं का अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि सम्पूर्ण साहित्य वेदों की सामग्री से निकली हुई ज्ञानसरिता की विभिन्न धाराएँ हैं। राष्ट्र व्यक्ति के जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण आधार है। यह सम्बन्ध भावात्मक है और पृथिवी से जुड़े हुए सम्बन्ध की आधारशिला है, जो उसके शारीरिक अस्तित्व से जुड़ा ही रहता है। राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में उस काल के आधारतत्त्व में सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति की धार्मिक मानसिकता है। राजनीति धर्म से कभी पृथक् हुई ही नहीं है। धर्म से पूर्ण राजनीति ही सर्वमान्य मानी जाती थी और जहाँ व्यक्ति धार्मिकता, नैतिकता से जुड़ा हुआ होता है, वहाँ इनकी मर्यादाओं का सम्मान करना उसका परम कर्तव्य होता है। ऐसे राष्ट्र में व्यक्ति की अपनी मातृभूमि के प्रति पूर्ण श्रद्धा और विश्वास होता है। इस वर्णन से हमें अपने गृह्यसूत्रों एवं धर्मसूत्रों का आधार वेद ग्रन्थों से ही प्राप्त होता है। सर्वोत्तम राष्ट्र के रूप में हम अपनी मातृभूमि को सर्वोत्तम उत्कर्ष के धारक के रूप में अवश्य ही देखना चाहते हैं। इस प्रकार मातृभूमि और राष्ट्र को पर्यायवाची माना गया है। तुलनात्मक योग्यता बताने के लिए संस्कृत में तरप् और तमप् प्रत्ययों का प्रयोग किया गया है और इस प्रकार 'उत्' से उत्तर, उत्तम-उच्चता की ये तीन श्रेणियाँ मानी गई हैं। हमारा राष्ट्र उत्तम हो अर्थात् संसार में विद्यमान समस्त राष्ट्रों में सर्वोत्तम एवं सर्वोत्कृष्ट हो, यह कामना की जाती है। इस भाव को निम्न मंत्र द्वारा स्पष्टतया देखा जा सकता है। यार्ण॒वेऽधि॑ स॒लिल॒मग्र॒ आसी॒द् यां मा॒याभि॑र॒न्वच॑रन् मनी॒षिण॑:। यस्या॒ हृद॑यं प॒र॒मे व्योम॒न्त्सत्ये॒नावृ॑त॒ममृ॑तं पृथि॒व्याः। सा नो॒ भूमि॒स्त्विषिं॒ बलं॑ रा॒ष्ट्रे द॑धातूत्त॒मे॥१ १. अथर्ववेद १२/१/८ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 282 वैदिक वाङ्गमय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अर्थात् जो राष्ट्र अपने विकास की प्राथमिक अवस्था में जल के समान शीतल गुण वाले मननशील विद्वानों के संरक्षण रूप समुद्र के समान स्थिर था, जिस राष्ट्र के मध्य फेन रूप अमरस्थान या सार्वभौम ज्ञान की अनन्य राशि सत्य से व्याप्त है अर्थात् राष्ट्र का नियंत्रण केवल सत्य के आधार पर ही हो सकता है जो राष्ट्र आकाश में विद्यमान अर्थात् जिस प्रकार के समस्त तत्त्वों की गति समान होती है उसी प्रकार जिस राष्ट्र में समस्त जन समुदाय को सामान्य रूप से गति या उन्नति करने का अवसर प्राप्त होता है, ऐसे सर्वोत्तम राष्ट्र में हम तेज और पराक्रम को धारण करें। सार्वजनिक जीवन में तप भी एक महान् आवश्यक एवं अनिवार्य गुण है। व्यक्तिगत उत्तरदायित्व के कार्यों में प्रायः हानि-लाभ, शीत-उष्ण, सुख-दुःख आदि द्वन्द्वों को सहन करना पड़ता है। इसी प्रकार मातृभूमि, देश अथवा राष्ट्र की सेवा में हमको अनेक प्रकार के कष्टों का अनुभव हो सकता है। सभी कष्टों को यथावत् सहते हुये राष्ट्र की उन्नति में सतत् प्रयत्नशील रहना ही मातृभूमि में सच्चे सेवक के लिए परम तप है। तप के अनन्तर ब्रह्म या यथार्थ ज्ञान भी एक आवश्यक राष्ट्रीय गुण बताया गया है। 'ऋते ज्ञानान्न मोक्षः' अर्थात् ज्ञान के अभाव में मोक्ष संभव ही नहीं है। राष्ट्र एवं समाज का हित उसी दशा में संभव है जबकि प्रत्येक व्यक्ति व्यक्तिगत रूप में अथवा समाज या राष्ट्र के सामूहिक रूप में ज्ञान का अर्जन करें। प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य होना चाहिये कि वह अपने देश की परिस्थिति का अधिक से अधिक ज्ञान प्राप्त करे तथा जहाँ तक संभव हो नाना प्रकार के शिल्प एवं कला कौशल के संबंध में भी अपने आपको प्रवीण बनाने का प्रयास करे। धर्मयुक्त समाज एवं समाज के सदस्यों का धर्मयुक्त आचरण ही राष्ट्र की उन्नति में सहायक होता है। धर्म ही राजा के चयन से लेकर आचरण, कर्तव्यों एवं गुणों को निश्चित करता है। धर्म की कसौटी पर खरा उतरने वाला राजा ही राष्ट्र की एकता और अखण्डता की रक्षा के लिए सहायक होता है। इसीलिए अथर्ववेद में उल्लिखित है— त्वां विशो॑ वृणतां राज्याय॒ त्वामि॒माः प्र॒दिशः॒ पञ्च॑ दे॒वीः। वर्ष्मन्॑ राष्ट्रस्य॑ क॒कुदि॑ श्रयस्व॒ ततो॑ न उ॒ग्रो वि भ॑जा॒ वसू॑नि॥१ अर्थात् तुम्हें प्रजा द्वारा राज्य के लिये चयन किया जाये, ये पाँच दिव्य दिशायें भी तुम्हें स्वीकार करें। राष्ट्र के उच्च स्थान और उत्कृष्ट पद पर सदैव आसीन रहो। राजन्, सदैव राष्ट्र में रक्षा के प्रति उग्र रहो और हमें वहाँ से धन प्राप्त कराओं। १. अथर्ववेद ३/४/२ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri अष्टम अध्याय 283 राष्ट्र के नागरिकों को जीवनदर्शन भी धर्म के द्वारा ही निश्चित होता है। उन्हें सम्पूर्ण राष्ट्र को परिवार समझकर ही व्यवहार करना चाहिये। जैसे परिवार के सदस्यों में किसी प्रकार का वैमनस्य या भेदभाव नहीं होता है, उसी प्रकार राष्ट्र में भी नहीं होना चाहिये। हमारे धार्मिक ग्रन्थ- वेद, उपनिषद्, ब्राह्मण, आरण्यक और सूत्र आदि हमें यही सिखाते हैं कि मातृभूमि को माँ समझकर, राष्ट्रवासियों को पुत्र समझकर सदैव व्यवहार करना चाहिये जैसे माँ के द्वारा स्वयं के अच्छे पालन-पोषण होने पर पुत्र भी उसकी रक्षा के लिए अपने प्राणोत्सर्ग के लिए सदैव ही तैयार रहते हैं। किसी शत्रु को बुरी दृष्टि से देखना भी उन्हें मान्य नहीं होता है। धर्म के द्वारा निर्देशित व्यक्ति न स्वयं अन्याय के पथ पर चलना पसन्द करता है और न अन्य का चलना उसे मान्य होता है। जहाँ संस्कृति का स्वरूप ही नीति और धर्म द्वारा संचालित हो, वहाँ पर खुशियों और समृद्धि के अतिरिक्त कुछ सोचा ही नहीं जा सकता है। ऐसे राष्ट्र में, जहाँ नागरिक के रक्त में ही वेदों की ऋचाएँ, मंत्रों की शुद्धता और धार्मिकता प्रवाहित हो रही हो, उसकी एकता और अखण्डता के आधारतत्त्वों में प्रमुख - उसके नागरिकों का चरित्र, भावनायें और राष्ट्र के प्रति प्रेम और वसुधैव कुटुम्बकम् की पवित्र भावना ही कही जा सकती है। २. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में गृह्यसूत्र एवम् धर्मसूत्र के समाजदर्शन का अनुशीलन- मानव समाज में रहता है और समाज के नियमों का नियमन ऋषि, मुनि, विद्वानों द्वारा ही किया जाता है और उनका परिपालन करना समाज के सदस्यों के लिए अनिवार्य माना जाता था। गृह्यसूत्रों एवं धर्मसूत्रों में उसकी ही विशद व्याख्या प्राप्त होती है। कल्पान्तवर्ती धर्मसूत्रों के द्वारा निर्धारित सिद्धान्तों, नियमों तथा व्यवस्थाओं का परवर्ती धर्मग्रन्थों, विशेष रूप से स्मृति साहित्य पर बहुत प्रभाव पड़ा है। वर्ण व्यवस्था :- वैदिक काल में वर्ण व्यवस्था जन्ममूलक नहीं थी अपितु कर्ममूलक थी। सभी को उसके कर्मों के अनुसार ही जाति का नाम दिया जाता था। ब्रह्मा जी के मुख से ब्राह्मण की उत्पत्ति मानी गई है। अतः उसे वेद, पुराण आदि की शिक्षा देने का अधिकार प्राप्त हुआ। गौतम धर्मसूत्र ने यह व्यवस्था स्पष्ट की है कि बहुश्रुत वह ब्राह्मण है जो लोगों के आचार-व्यवहार, वेद-वेदाङ्ग, वाकोवाक्य (कथनोपकथन), इतिहास एवं पुराण जानता है- तस्य च व्यवहारो वेदो धर्म शास्त्राण्यङ्गान्युपवेदाः पुराणम्१ १. गौतम धर्मसूत्र ११/१९ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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284 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता ब्राह्मण वर्ण सर्वश्रेष्ठ माना जाता था। दान आदि ग्रहण करने का अधिकार ब्राह्मण को ही प्राप्त था और वेदों की शिक्षा भी वही दे सकते थे। द्वितीय वर्ण में क्षत्रिय वर्ण आता है जिसे कि राजकीय कार्यों के लिये निश्चित किया गया था। क्षत्रिय शारीरिक दृष्टि से सुदृढ़ होते थे। युद्ध कला आदि की शिक्षा उनके लिये अनिवार्य थी और राजा के पद पर क्षत्रिय ही आरूढ़ होते थे। सामान्य जनों की रक्षा का कार्यभार उन्हीं के ऊपर ही रहता था। राष्ट्र का सम्पूर्ण रक्षादायित्व क्षत्रियों पर रहता था। राष्ट्र के लिए व्यापार का कार्य, पशु पालन और कृषि का कार्य करने वाले वैश्य वर्ण कहलाते थे। इन सभी वर्णों का सेवा-कार्य करने वाले शूद्र वर्ण कहलाते थे। इन्हें ब्रह्माजी के चरणों से उत्पन्न माना गया है और इसीलिए इन्हें सेवा-कार्य सौंपा गया था फिर भी उन्हें निकृष्ट दृष्टि से नहीं देखा गया है। यह वर्ण व्यवस्था वैदिककालीन समाज को सुगठित एवं संगठित बना देती थी और इस प्रकार अपने-अपने कार्य को धर्म समझकर पूर्ण करने वाले लोगों से राष्ट्र के परिवेश को भी बल मिलता है। 'गौतम धर्मसूत्र' के अध्याय नौ में चारों वर्णों के विशिष्ट धर्म का वर्णन प्राप्त होता है। आश्रम व्यवस्था :- मानव जीवन को चार आश्रमों में बाँट दिया गया था। उपनयन संस्कार से ही बालक को शिक्षा हेतु आचार्य के पास भेज दिया जाता था। यह उसका ब्रह्मचर्य आश्रम था। यह काल उसके लिए भावी जीवन में सफल होने के लिए परीक्षा देने का काल था तथा विद्याध्ययन और आचार्य द्वारा प्रदत्त सभी ज्ञान को आत्मसात करने का काल था। इसकी आयु २५ वर्ष तक की थी। गृह्यसूत्र तथा धर्मसूत्रों में ब्रह्मचारी के गुणों एवं व्रतों का विस्तृत वर्णन किया गया है। तन्त्र वार्तिकार 'भट्ट कुमारिल' का कथन है कि सभी धर्मसूत्र वर्णों एवं आश्रमों के कर्तव्यों का उपदेश करते हैं। इसकी परिधि में व्यवहार धर्म सम्मिलित है। यह आश्रम मानव को भावी जीवन के हेतु तैयार करता है। ब्रह्मचर्याश्रम के पश्चात् व्यक्ति गृहस्थाश्रम में प्रवेश करता है। इसमें वह विवाह संस्कार को पूर्ण करता है और गृहस्थ धर्म की पूर्ति के लिए अपने को तैयार रखता है। उसमें वह देव-ऋण, ऋषि-ऋण एवं पितृ-ऋण की पूर्ति करता है। धर्मसूत्रों एवं गृह्यसूत्रों में गौतम धर्मसूत्र के चतुर्थ अध्याय में गृहस्थ व्रत, अध्याय छह में माता-पिता का सत्कार, गुरुजनों तथा सम्बन्धियों का सत्कार सम्बन्धी वर्णन प्राप्त होता है। बोधायन धर्मसूत्र के द्वितीय प्रश्न में गृहस्थ के दैनिक कृत्यों का वर्णन प्राप्त होता है। तृतीय वानप्रस्थ आश्रम में मानव गृहस्थाश्रम की पूर्ति के बाद वानप्रस्थ में प्रवेश करता है। इसके बारे में गृह्यसूत्रों में कौमाक्षिगृह्यसूत्र के द्वितीय प्रश्न में वानप्रस्थ विधि, बौधायन धर्मसूत्र के तृतीय प्रश्न में भी वानप्रस्थ आश्रम के बारे में वर्णन प्राप्त
CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri अष्टम अध्याय 285 होता है। उसके अनुसार सांसारिक मोह-माया से पूर्ण, मुक्ति पाने हेतु, गृह-निवास करते हुये भी व्यक्ति अपने को ईश्वर उपासना में समर्पित कर देता है। वानप्रस्थ की पूर्ति के पश्चात् मानव अपने जीवन के एक मात्र लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति के लिये गृहत्याग करके ईश्वर में लीन होने के लिए वनगमन कर जाता है और वहीं अपना शेष समय जप, तप और आराधना में व्यतीत करता है। पुरुषार्थ :- सम्पूर्ण जीवन में व्यक्ति को कुछ पुरुषार्थों की पूर्ति करनी पड़ती है और वे पुरुषार्थ हैं- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। उन्हें पुरुषार्थ चतुष्ट्य कहा जाता है। इसमें मोक्ष अन्तिम स्थिति होती है, अतः शेष तीन को त्रिवर्ग कहा जाता है। इन तीनों को ही जीवन में पूर्ति हेतु विशेष महत्त्व दिया गया है लेकिन इनमें से किसी वस्तु के अमर्यादित उपभोग की अनुमति नहीं दी जाती है। धर्म का पूर्ण पालन ही जीवन प्रमुख उद्देश्य होना चाहिये। ऋग्वेद में धर्म शब्द संधारक एवं संभारक अर्थ का द्योतक है। आगे धार्मिक कृत्य, आदेश अथवा विधान का भी वाचक हो गया।१ इसके पश्चात् आता है- अर्थ। जीवन के हर कार्य को पूर्ण करने के लिए अर्थ (धन) परमावश्यक है। इस अर्थ की उपार्जन विधि भी धर्मानुकूल होनी चाहिये। इस अर्थ से ही व्यक्ति परिवार का पालन, तीनों ऋणों से मुक्ति, यज्ञ, दान आदि कार्य सम्पन्न करता है। अतः वह सर्वथा श्रमपूर्ण कार्यों से अर्जित होना चाहिये। संग्रह की बात न्यायसंगत नहीं है। तीसरा पुरुषार्थ है- काम। इसकी पूर्ति हेतु ही व्यक्ति गृहस्थाश्रम में प्रवेश करता है। जीवन के सभी कर्मों एवं संस्कारों में यह भी अत्यन्त आवश्यक है। यज्ञ व दान की क्रिया सपत्नीक ही पूर्ण की जाती है। धर्म अकेले इन कार्यों की अनुमति नहीं देता है। 'काम' के द्वारा ही पुत्रेषणा की पूर्ति होती है। सृष्टि में प्रत्येक व्यक्ति का योगदान आवश्यक होता है। (आजन्म ब्रह्मचारी उसके अपवाद हैं)। सभी एषणाओं की पूर्ति के पश्चात् ही व्यक्ति संतुष्ट होने के बाद मोक्ष प्राप्ति की ओर उन्मुख होता है। मोक्ष की प्राप्ति के लिए वह सब कुछ त्याग कर वन में निवास करता है और वहीं ईश्वर आराधना में अपना शेष जीवन व्यतीत करता है, और ईश्वर में लीन होकर मोक्ष को प्राप्त होता है। संस्कार :- गृह्यसूत्र तथा धर्मसूत्रों में गृह्य-कर्मों का स्थूल रूप से वर्णन किया गया है। सम्पूर्ण गृह्यसूत्रों में पुंसवन, जातकर्म, नामकरण, अन्नप्राशन, चौलकर्म, उपनयन, चूड़ाकर्म, समावर्तन आदि संस्कारों के बारे में विस्तार से वर्णन किया गया है। विवाह संस्कार में विवाह के प्रकार, औचित्य, विवाहयोग्य कन्या के गुण, १. ऋग्वेद १/१८७/१ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 286 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता गृह्यालंकार आदि का विस्तृत वर्णन किया गया है। पाप के कारणों, प्रकार एवं उसके प्रायश्चित के बारे में भी इनमें पूर्ण जानकारी प्रदान की गई है। श्राद्ध, अंत्येष्टि, तर्पण- मासबद्ध, पितृदेवता, ऋषि तर्पण आदि की विस्तृत जानकारी धर्मसूत्र एवं गृह्यसूत्र में उपलब्ध है। नारी की स्थिति :- वैदिक वाङ्मय में कहीं भी नारी की स्थिति हीन दृष्टि से नहीं देखी गयी है क्योंकि उसको सदैव ही पुरुष की अर्द्धांगिनी स्वीकार किया गया है। शिक्षा की दृष्टि से भी उसे पुरुष के बराबर ही पूर्ण अधिकार प्राप्त थे। वह भी ब्रह्मचर्य व्रत का पूर्ण पालन करती हुई वेदाध्ययन और सम्पूर्ण विद्याओं का ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात् ही विवाह के योग्य समझी जाती थी। उसे अपने योग्य ही पति चुनने का पूर्ण अधिकार था। अयोग्य वर को कन्या सौंपने का प्रावधान नहीं मिलता है। जहाँ नारी की पूजा होती है वहीं देवता का वास होता है, यह उक्ति इसी वातावरण में चरितार्थ होती है। माँ के रूप में उसे पुत्रों में अच्छे संस्कार और गुणों के समावेश का दायित्व माँ के ऊपर ही माना जाता था। धार्मिक कृत्यों की पूर्ति भी पुरुष बिना पत्नी के नहीं कर सकता था। बहुपत्नी की प्रथा उस समय नहीं थी। अपवाद अवश्य प्राप्त होते थे जैसे याज्ञवल्क्य की दो पत्नियों का उल्लेख प्राप्त होता है। यत्र नार्यः पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः। विवाह :- गृह्यसूत्र एवं धर्मसूत्रों में वैदिक आर्यों की प्राचीन सामाजिक एवं गृहस्थजीवन से सम्बन्धित जानकारी प्राप्त होती है। इसमें विवाह के बारे में पूर्ण एवं विशद वर्णन प्राप्त होता है। आश्वलायन गृह्यसूत्र में कहा गया है कि विवाह के सन्दर्भ जनपदों और ग्रामों में प्रचलित बहुविध धर्मों का अनुसरण करना चाहिए- अथ खलु उच्चावचाः जनपदः धर्माः ग्रामधर्मांश्च, ताने विवाहे प्रतीत्यात्। १ विवाह के समय की सारी रस्में, यथा- अग्नि परिक्रमा, लाजा-होमा, पाणिग्रहण, सप्तपदी आदि कृत्य प्रायः सभी ग्रन्थों में उपलब्ध हैं। इस प्रकार राष्ट्रीयएकता एवम् अखण्डता में गृह्यसूत्रों एवं धर्मसूत्रों द्वारा प्रदत्त सारी दिशाओं से व्यक्ति का जीवन संतुलित, धार्मिक एवं निष्ठावान् बनता है। वह अपने सारे दायित्वों चाहे वे राष्ट्र के प्रति हो, समाज के प्रति हो या फिर परिवार के प्रति, उसे कहीं भी नैतिकता की सीमाओं का अतिक्रमण करने की अनुमति नहीं देता है। १. आश्वलायन गृह्यसूत्र १/५/१-२ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri अष्टम अध्याय 287 ३. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में गृह्यसूत्र एवम् धर्मसूत्र के राजदर्शन का अनुशीलन- वैदिकवाङ्मय में वेदों से लेकर सूत्रों तक सभी में राजनीति को लेकर सभी प्रकार के विषयों पर विशिष्ट रूप से विचार किया गया है क्योंकि राजा, पुरोहित या जन- समुदाय, धर्म और नीति से कहीं भी परे नहीं हैं। सबको इन्हीं के अनुरूप आचरण करना पड़ता है। धर्मसूत्रों में गृहस्थ सूत्रों की अपेक्षा विस्तृत क्षेत्र को लिया गया है। 'गौतम धर्मसूत्र' में राजा के कर्तव्य, कर, स्वत्व के स्रोत, राजधर्म, राजपुरोहित के गुण इत्यादि का विस्तृत वर्णन किया गया है। राष्ट्र की राजनीति का आधार राजा ही होता है और उसके गुणों के आधार पर उसका चयन करने का अधिकार जनसामान्य को प्राप्त होता है। धर्म के अनुसार आचरण करने वाला, प्रजा को पुत्रवत् समझने वाला, शत्रु के लिए भूखे शेर का भाव रखने वाला, राजा ही श्रेष्ठ होता है। भारतीय राजनीति का मूल सिद्धान्त रहा है कि राष्ट्र के परिपालन में क्षात्र-तेज के साथ ब्रह्मवर्चस का पूर्ण सहयोग होने पर ही देश और राष्ट्र की समृद्धि निश्चित रहती है। वसिष्ठ ने इस विषय में ब्राह्मण ग्रन्थों से एक बहुमूल्य उद्धरण दिया है- 'ब्रह्म पुरोहितं राष्ट्र भृष्योनीति' महाकवि कालिदास ने अनेक शताब्दियों के अनन्तर इस राष्ट्रीय एकता की भावना को पवन और अग्नि का परिचित दृष्टान्त देकर परिपुष्ट किया है (रघु० ८/४)- स बभूव दुरासदः परैर्गुरुणाथर्वविदा कृत क्रियः। पवनाग्नि समागमो ह्यं सहितं ब्रह्म यद सुतेज सा॥ राजा का प्रधान कार्य है- देश का रक्षण और अपराधियों का दण्डन। दण्ड से दण्डित अपराधी अपने पापों से मुक्त होकर निर्मल बन जाता है तथा पुण्यात्माओं के समान स्वर्ग जाता है। यदि राजा अपराधी को दण्ड नहीं देता तो वह पाप उस राजा को पकड़ लेता है। अतः अपने कल्याण और अपराधी के कल्याण के लिये भी अपराधी को दण्ड देना राजा का मुख्य कर्तव्य होता है- राजाभिर्धुत दण्डास्तु कृत्वा पापानि मानवाः। निर्मला स्वर्गमायान्ति सन्तः सुवृतिनो यथा॥ (१९/४५) राजदर्शन में ही सूद ब्याज के ग्रहण पर प्रायश्चित का विधान है। साक्षी के कथन पर सन्देह होने की स्थिति में दिव्य परीक्षा का विधान किया गया है। (आपस्तम्ब धर्मसूत्र) CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 288 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता गृह्यसूत्रों और धर्मसूत्रों के अनुसार ही राजा राष्ट्र का प्रधान होने के नाते राष्ट्र की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध होता है। राजपुरोहित उसे नैतिकता से परिचित एवं निर्णय हेतु परामर्श प्रदान करता रहता है। राष्ट्र की शत्रुओं से रक्षा करना और प्रजा की भी रक्षा एवं भरण-पोषण का दायित्व राजा के प्रति होता है। जहाँ पर शत्रुरहित राष्ट्र हो, प्रजा खुशहाल रहती है। आपस में वैर और वैमनस्य का भाव न हो तो ऐसे राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता को कहीं से कोई खतरा नही होता है। हमारे धर्मसूत्र ही हमें धार्मिक व नैतिकतापूर्ण राष्ट्र के बारे में अवगत कराते हैं। ४. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में गृह्यसूत्र एवम् धर्मसूत्र के धर्मदर्शन का अनुशीलन- धर्म ही से सम्बद्ध सारे नियम, सिद्धान्त और व्यवस्थाओं को ही मानव जीवन को संचालित करने के लिए निश्चित किया गया है। धर्म की धुरी पर परिक्रमा करता हुआ मानव जीवन उससे अलग होकर कुछ धर्म विरुद्ध कर ही नहीं सकता है। तन्त्रवार्तिककार भट्ट कुमारिल का कथन है कि सभी धर्मसूत्र वर्णों और आश्रमों के कर्तव्यों का उपदेश देते हैं। व्यवहारधर्म तथा राजधर्म भी इसमें सम्मिलित है। इसमें 'सामयाचारिक धर्म' (समय अथवा परम्परा पर आधृत धर्म) की विशेष व्याख्या की गई है। 'स्मृति' में इसी का नामान्तर है। अतएव स्मार्त धर्म भी इसे कहा जा सकता है। गौतम धर्मसूत्र के मतानुसार वेद, वेदज्ञों के आचरण तथा उनकी धर्मपरम्परा के मूल हैं- वेदो धर्ममूलम्। तद्विदाञ्च स्मृतिशीले।१ इसी की पुष्टि आपस्तम्ब तथा अन्य धर्मसूत्रों ने भी की है- धर्मज्ञसमयः प्रमाणं वेदाश्च२ एवम् श्रुति स्मृति विहितो धर्मः। तदलाभे शिष्टाचारः प्रमाणम्।३ मनुप्रभृति धर्मशास्त्रियों ने वेद वेदज्ञों के साथ ही शिष्ट तथा साधु पुरुषों के आचरण को भी धर्म कोटि में सम्मिलित कर दिया है। शिष्ट श्रेणी में स्वार्थहीन और निःस्पृह व्यक्तियों को ही रखा गया है। १. गौतम धर्मसूत्र १/१-२ २. आपस्तम्ब धर्मसूत्र १/१/२ ३. आपस्तम्ब धर्मसूत्र १/१/३ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri अष्टम अध्याय 289 वसिष्ठ धर्मसूत्र का अन्तिम अध्याय समग्र धर्मशास्त्र की कुञ्जी है— धर्म महिमा की प्रशस्ति है। भारतीय स्मृतिकारों ने स्वर में स्वर मिलाकर वसिष्ठ द्वारा यह घोषणा की है— धर्मं चरत माऽधर्मं सत्यं वदत माऽनृतम्। दीर्घं पश्यत मा ह्रस्वं परं पश्यत माऽपरम्॥१ अर्थात् 'धर्म का आचरण करो, अधर्म का आचरण मत करो, सत्य बोलो, झूठ मत बोलो, दीर्घ देखो, ह्रस्व मत देखो— अर्थात् किसी वस्तु के विषय में दूरदर्शी बनो। छोटी वस्तु को देखकर अपने विचारों को क्षुद्र, हीन और छोटा मत बनाओ। सदा श्रेष्ठ वस्तु को देखो। जीवन का लक्ष्य सदा ऊँचा बनाये रखो। वसिष्ठ की यह शिक्षा स्वर्णाक्षरों में लिखने योग्य है। इस तरह धर्म के आचरण द्वारा ही जीवन का ध्येय निश्चित कर दिया जाता है। जहाँ इस प्रकार का समाजदर्शन और धर्मदर्शन होगा वहाँ पर राष्ट्र के स्वरूप को निश्चित करने में अधिक समय नहीं लगता है। वसिष्ठ का जीवनदर्शन नितान्त उदात्त एवं कर्मनिष्ठ तथा पूर्णतया आध्यात्मिक है। वे हमें स्वस्थ, शिष्ट तथा संस्कृत भारतीय बनकर जीवन-यापन का उपदेश देते हैं तथा उस तृष्णा के परिहार की शिक्षा देते हैं जिसे दुर्बुद्धि कठिनता से छोड़ सकता है, जो व्यक्ति के जीर्ण होने पर भी स्वयं जीर्ण नहीं होता और जो प्राणान्तिक व्याधि है— या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः। याऽसौ प्राणान्तिको व्याधिस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम्॥२ धर्म के द्वारा ही व्यक्ति अपने जीवन के अन्तिम लक्ष्य तक पहुँच सकता है। जहाँ ब्रह्मचर्य आश्रम काल में ही मानव को धर्म के चारों ओर परिक्रमा का व्रत दिया जाता है, वहाँ अधर्म के बारे में व्यक्ति सोच ही नहीं सकता है। जहाँ राष्ट्रधर्म, पितृधर्म, पुत्रधर्म और पतिधर्म का पालन ही जीवन का अन्तिम लक्ष्य हो, तो वह इस धर्म से विलग वह कहाँ हो सकता है। यदि राष्ट्रीय एकता और अखण्डता के सन्दर्भ में इस पर विचार किया जाये तो जीवन के सभी धर्म का सबल पालन करने वाला मानव राष्ट्रधर्म से विमुख हो ही नहीं सकता है। जब वह प्रजाधर्म का पालन करके राष्ट्रधर्म की पूर्ति करता है, तो ऐसे नागरिकों पर राष्ट्र सदैव ही गर्व कर सकता है। १. वसिष्ठ धर्मसूत्र ३०/१ २. योगवासिष्ठ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 290 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता ५. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में गृह्यसूत्र एवं धर्मसूत्र के आचारदर्शन, शिक्षादर्शन एवं अर्थदर्शन का अनुशीलन- मानवजीवन में आचार और विचार, दोनों की ही महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। धर्म से ही आचार का प्रादुर्भाव होता है। इन आचारों के लिये कोई भी अन्य विकल्प नहीं है। वसिष्ठधर्मसूत्र में आचार पर बहुत अधिक बल दिया गया है— आचार: परमोधर्मः सर्वेषामिति निश्चयः। हीनाचार परीतात्मा प्रेत्य चेह च नश्यति॥१ अर्थात् आचार ही जीवन का सबके बड़ा धर्म है, इस बात को सर्वसम्मति से विद्वानों ने स्वीकार किया है। आचारहीन व्यक्ति उसी तरह नष्ट हो जाता है जिस तरह प्रेतात्मा आदि अपना कोई अस्तित्व नहीं रखती। वसिष्ठ ने अपने मतों का प्रतिपादन थोड़े में, परन्तु बड़ी ही स्पष्ट भाषा में किया है। मौलिक विचार और प्रौढ़ विवेचना की छाप सम्पूर्ण ग्रन्थ में स्पष्ट परिलक्षित है। अन्य स्मृतिकारों के समान वसिष्ठ का सम्पूर्ण आग्रह 'आचार' ही है। आचार ही व्यक्ति तथा समाज को मान्यता, दीर्घ जीवन और सत्कार प्राप्त कराता है। शास्त्र का अभ्यास, विद्या का अर्जन तथा विज्ञान का उपार्जन अवश्य ही उपादेय वस्तु है, परन्तु व्यवहार में लाये बिना, अर्थात् आचार के रूप में परिणत किये बिना, वह सब केवल भाव मात्र हैं— उपयोग से हीन होने के कारण केवल बोझ मात्र बन जाता है। आचार से हीन व्यक्ति के लिए यह लोक भी नष्ट है और परलोक भी असिद्ध ही है। आचाररहित व्यक्ति में समस्त यज्ञ तथा षडङ्गों से युक्त वेद भी उस प्रकार प्रीति उत्पन्न नहीं करते जिस प्रकार अन्धे के हृदय में सुन्दरी भार्या की उपस्थिति :- आचारहीनस्य तु ब्राह्मणस्य वेदाः षडङ्गास्त्वखिलाः सयज्ञाः। कां प्रीतिमुत्पादयितुं समर्था अन्धस्य दारा इव दर्शनीयाः॥२ इन आचार-विचारों की शुद्धि और उन पर आचरण का उपदेश ब्रह्मचर्य आश्रम के काल में गुरु द्वारा शिष्यों को प्रदान किया जाता था क्योंकि जीवन समर में उनकी प्रवृत्ति इसी के बाद ही होती थी। वे अपने पूर्ण दायित्वों से परिचित होकर, सम्पूर्ण शिक्षाओं को ग्रहण करके ही सही अर्थों में दायित्वों के क्षेत्र में तब आते थे जबकि वे गृहस्थाश्रम में प्रवेश करते थे। छात्रों को दीक्षान्त अवसर पर प्रदत्त उपदेश इस बात १. वसिष्ठ धर्मसूत्र ६/१ २. वसिष्ठ धर्मसूत्र ६/४ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri अष्टम अध्याय 291 को प्रदर्शित करता है कि जिन बातों का ज्ञान उसे अपने शिक्षाकाल में कराया गया है, उनका परिपालन अब गृहस्थ जीवन में अवश्य ही करना है और इसी के परिप्रेक्ष्य में वह इस प्रकार अपने शिष्य को उपदेश देता है :- सत्य बोलो, धर्माचरण करो, स्वाध्याय में प्रमाद मत करो। गृहस्थाश्रम में प्रवेश कर वंश परम्परा को आगे बढ़ाओ। सत्य, धर्म, कुलक्षेत्र, समृद्धि, देव-पितृकार्यों में कभी प्रमाद न करो। माता, पिता, आचार्य और अतिथि को देवता के समान समझो। गुरुजनों के निर्दोष आचरण का ही अनुकरण करो, अन्यों का नहीं। जो कल्याणकारी ब्राह्मण हैं, उनके निकट बैठकर उनमें विश्वास करो। दान श्रद्धा, भक्ति, लज्जा, भय और अनुबन्ध, सभी प्रकार से देना चाहिये। अपने कर्म और आचरण के विषय में किसी प्रकार का सन्देह होने पर विचारशील, संतुलित, धर्मात्मा व्यक्तियों के व्यवहार से मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहिये। यही वेदों का रहस्य है। यही अनुशासन है। इसी की उपासना करनी चाहिये।१ गृह्यसूत्रों एवं धर्मसूत्रों के आचार दर्शन से प्राप्त होता है- आदर्श समाज और उसके अनुशासित नागरिक। उनसे ही बनता है- सम्पूर्ण राष्ट्र। जिनके लिये संस्कृति से एक आदर्श परिकल्पना उत्पन्न हो, वहाँ पर राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता को सदैव बल ही प्राप्त होगा। वैदिकवाङ्मय में प्राप्त शिक्षाव्यवस्था भी आदर्श शिक्षादर्शन पर आधारित थी। शिक्षा प्रणाली का आधार स्मृति, ज्ञान और बोध तीनों ही थे। शिक्षा प्रयोगों के द्वारा प्रमाणित करके ही दी जाती थी और यही आज्ञा दी जाती थी कि वह जीवन में इन शिक्षाओं को पूरी तरह ग्रहण करके समाहित कर लेगा। गुरु योग्य शिष्य को ही शिक्षा देना स्वीकारता था ताकि उसकी दी हुई शिक्षा सार्थक हो सके। शिक्षा के बारे में इस प्रकार उल्लिखित है- यमेव विद्याः शुचि म प्रमत्तः मेधाविनं ब्रह्मचर्योपपन्न। गुरु उसी शिष्य को अपना ज्ञान प्रदान करें जो पवित्र मेधा, अप्रमादी, ब्रह्मचारी और ज्ञान का संरक्षक हो। गुरु द्वारा शिष्य से सदैव यही अपेक्षा की जाती थी कि वह अपने भावी जीवन के सभी कर्तव्यों एवं दायित्वों को धर्मपूर्वक निर्वाह करेगा और सत्य के मार्ग पर चलते हुए ही मोक्ष की प्राप्ति करेगा। गृह्यसूत्रों एवं धर्मसूत्रों में प्राप्त अर्थदर्शन भी उतना ही महत्त्वपूर्ण स्थान रखता था। वैसे तो इन सूत्रों में जीवन के संस्कारों, क्रियाओं और कर्तव्यों के बारे में वर्णन १. तैत्तिरीय उपनिषद् ७/११ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar