वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 311, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri अष्टम अध्याय 283 राष्ट्र के नागरिकों को जीवनदर्शन भी धर्म के द्वारा ही निश्चित होता है। उन्हें सम्पूर्ण राष्ट्र को परिवार समझकर ही व्यवहार करना चाहिये। जैसे परिवार के सदस्यों में किसी प्रकार का वैमनस्य या भेदभाव नहीं होता है, उसी प्रकार राष्ट्र में भी नहीं होना चाहिये। हमारे धार्मिक ग्रन्थ- वेद, उपनिषद्, ब्राह्मण, आरण्यक और सूत्र आदि हमें यही सिखाते हैं कि मातृभूमि को माँ समझकर, राष्ट्रवासियों को पुत्र समझकर सदैव व्यवहार करना चाहिये जैसे माँ के द्वारा स्वयं के अच्छे पालन-पोषण होने पर पुत्र भी उसकी रक्षा के लिए अपने प्राणोत्सर्ग के लिए सदैव ही तैयार रहते हैं। किसी शत्रु को बुरी दृष्टि से देखना भी उन्हें मान्य नहीं होता है। धर्म के द्वारा निर्देशित व्यक्ति न स्वयं अन्याय के पथ पर चलना पसन्द करता है और न अन्य का चलना उसे मान्य होता है। जहाँ संस्कृति का स्वरूप ही नीति और धर्म द्वारा संचालित हो, वहाँ पर खुशियों और समृद्धि के अतिरिक्त कुछ सोचा ही नहीं जा सकता है। ऐसे राष्ट्र में, जहाँ नागरिक के रक्त में ही वेदों की ऋचाएँ, मंत्रों की शुद्धता और धार्मिकता प्रवाहित हो रही हो, उसकी एकता और अखण्डता के आधारतत्त्वों में प्रमुख - उसके नागरिकों का चरित्र, भावनायें और राष्ट्र के प्रति प्रेम और वसुधैव कुटुम्बकम् की पवित्र भावना ही कही जा सकती है। २. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में गृह्यसूत्र एवम् धर्मसूत्र के समाजदर्शन का अनुशीलन- मानव समाज में रहता है और समाज के नियमों का नियमन ऋषि, मुनि, विद्वानों द्वारा ही किया जाता है और उनका परिपालन करना समाज के सदस्यों के लिए अनिवार्य माना जाता था। गृह्यसूत्रों एवं धर्मसूत्रों में उसकी ही विशद व्याख्या प्राप्त होती है। कल्पान्तवर्ती धर्मसूत्रों के द्वारा निर्धारित सिद्धान्तों, नियमों तथा व्यवस्थाओं का परवर्ती धर्मग्रन्थों, विशेष रूप से स्मृति साहित्य पर बहुत प्रभाव पड़ा है। वर्ण व्यवस्था :- वैदिक काल में वर्ण व्यवस्था जन्ममूलक नहीं थी अपितु कर्ममूलक थी। सभी को उसके कर्मों के अनुसार ही जाति का नाम दिया जाता था। ब्रह्मा जी के मुख से ब्राह्मण की उत्पत्ति मानी गई है। अतः उसे वेद, पुराण आदि की शिक्षा देने का अधिकार प्राप्त हुआ। गौतम धर्मसूत्र ने यह व्यवस्था स्पष्ट की है कि बहुश्रुत वह ब्राह्मण है जो लोगों के आचार-व्यवहार, वेद-वेदाङ्ग, वाकोवाक्य (कथनोपकथन), इतिहास एवं पुराण जानता है- तस्य च व्यवहारो वेदो धर्म शास्त्राण्यङ्गान्युपवेदाः पुराणम्१ १. गौतम धर्मसूत्र ११/१९ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar