वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
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284 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता ब्राह्मण वर्ण सर्वश्रेष्ठ माना जाता था। दान आदि ग्रहण करने का अधिकार ब्राह्मण को ही प्राप्त था और वेदों की शिक्षा भी वही दे सकते थे। द्वितीय वर्ण में क्षत्रिय वर्ण आता है जिसे कि राजकीय कार्यों के लिये निश्चित किया गया था। क्षत्रिय शारीरिक दृष्टि से सुदृढ़ होते थे। युद्ध कला आदि की शिक्षा उनके लिये अनिवार्य थी और राजा के पद पर क्षत्रिय ही आरूढ़ होते थे। सामान्य जनों की रक्षा का कार्यभार उन्हीं के ऊपर ही रहता था। राष्ट्र का सम्पूर्ण रक्षादायित्व क्षत्रियों पर रहता था। राष्ट्र के लिए व्यापार का कार्य, पशु पालन और कृषि का कार्य करने वाले वैश्य वर्ण कहलाते थे। इन सभी वर्णों का सेवा-कार्य करने वाले शूद्र वर्ण कहलाते थे। इन्हें ब्रह्माजी के चरणों से उत्पन्न माना गया है और इसीलिए इन्हें सेवा-कार्य सौंपा गया था फिर भी उन्हें निकृष्ट दृष्टि से नहीं देखा गया है। यह वर्ण व्यवस्था वैदिककालीन समाज को सुगठित एवं संगठित बना देती थी और इस प्रकार अपने-अपने कार्य को धर्म समझकर पूर्ण करने वाले लोगों से राष्ट्र के परिवेश को भी बल मिलता है। 'गौतम धर्मसूत्र' के अध्याय नौ में चारों वर्णों के विशिष्ट धर्म का वर्णन प्राप्त होता है। आश्रम व्यवस्था :- मानव जीवन को चार आश्रमों में बाँट दिया गया था। उपनयन संस्कार से ही बालक को शिक्षा हेतु आचार्य के पास भेज दिया जाता था। यह उसका ब्रह्मचर्य आश्रम था। यह काल उसके लिए भावी जीवन में सफल होने के लिए परीक्षा देने का काल था तथा विद्याध्ययन और आचार्य द्वारा प्रदत्त सभी ज्ञान को आत्मसात करने का काल था। इसकी आयु २५ वर्ष तक की थी। गृह्यसूत्र तथा धर्मसूत्रों में ब्रह्मचारी के गुणों एवं व्रतों का विस्तृत वर्णन किया गया है। तन्त्र वार्तिकार 'भट्ट कुमारिल' का कथन है कि सभी धर्मसूत्र वर्णों एवं आश्रमों के कर्तव्यों का उपदेश करते हैं। इसकी परिधि में व्यवहार धर्म सम्मिलित है। यह आश्रम मानव को भावी जीवन के हेतु तैयार करता है। ब्रह्मचर्याश्रम के पश्चात् व्यक्ति गृहस्थाश्रम में प्रवेश करता है। इसमें वह विवाह संस्कार को पूर्ण करता है और गृहस्थ धर्म की पूर्ति के लिए अपने को तैयार रखता है। उसमें वह देव-ऋण, ऋषि-ऋण एवं पितृ-ऋण की पूर्ति करता है। धर्मसूत्रों एवं गृह्यसूत्रों में गौतम धर्मसूत्र के चतुर्थ अध्याय में गृहस्थ व्रत, अध्याय छह में माता-पिता का सत्कार, गुरुजनों तथा सम्बन्धियों का सत्कार सम्बन्धी वर्णन प्राप्त होता है। बोधायन धर्मसूत्र के द्वितीय प्रश्न में गृहस्थ के दैनिक कृत्यों का वर्णन प्राप्त होता है। तृतीय वानप्रस्थ आश्रम में मानव गृहस्थाश्रम की पूर्ति के बाद वानप्रस्थ में प्रवेश करता है। इसके बारे में गृह्यसूत्रों में कौमाक्षिगृह्यसूत्र के द्वितीय प्रश्न में वानप्रस्थ विधि, बौधायन धर्मसूत्र के तृतीय प्रश्न में भी वानप्रस्थ आश्रम के बारे में वर्णन प्राप्त
CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar