वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri अष्टम अध्याय 285 होता है। उसके अनुसार सांसारिक मोह-माया से पूर्ण, मुक्ति पाने हेतु, गृह-निवास करते हुये भी व्यक्ति अपने को ईश्वर उपासना में समर्पित कर देता है। वानप्रस्थ की पूर्ति के पश्चात् मानव अपने जीवन के एक मात्र लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति के लिये गृहत्याग करके ईश्वर में लीन होने के लिए वनगमन कर जाता है और वहीं अपना शेष समय जप, तप और आराधना में व्यतीत करता है। पुरुषार्थ :- सम्पूर्ण जीवन में व्यक्ति को कुछ पुरुषार्थों की पूर्ति करनी पड़ती है और वे पुरुषार्थ हैं- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। उन्हें पुरुषार्थ चतुष्ट्य कहा जाता है। इसमें मोक्ष अन्तिम स्थिति होती है, अतः शेष तीन को त्रिवर्ग कहा जाता है। इन तीनों को ही जीवन में पूर्ति हेतु विशेष महत्त्व दिया गया है लेकिन इनमें से किसी वस्तु के अमर्यादित उपभोग की अनुमति नहीं दी जाती है। धर्म का पूर्ण पालन ही जीवन प्रमुख उद्देश्य होना चाहिये। ऋग्वेद में धर्म शब्द संधारक एवं संभारक अर्थ का द्योतक है। आगे धार्मिक कृत्य, आदेश अथवा विधान का भी वाचक हो गया।१ इसके पश्चात् आता है- अर्थ। जीवन के हर कार्य को पूर्ण करने के लिए अर्थ (धन) परमावश्यक है। इस अर्थ की उपार्जन विधि भी धर्मानुकूल होनी चाहिये। इस अर्थ से ही व्यक्ति परिवार का पालन, तीनों ऋणों से मुक्ति, यज्ञ, दान आदि कार्य सम्पन्न करता है। अतः वह सर्वथा श्रमपूर्ण कार्यों से अर्जित होना चाहिये। संग्रह की बात न्यायसंगत नहीं है। तीसरा पुरुषार्थ है- काम। इसकी पूर्ति हेतु ही व्यक्ति गृहस्थाश्रम में प्रवेश करता है। जीवन के सभी कर्मों एवं संस्कारों में यह भी अत्यन्त आवश्यक है। यज्ञ व दान की क्रिया सपत्नीक ही पूर्ण की जाती है। धर्म अकेले इन कार्यों की अनुमति नहीं देता है। 'काम' के द्वारा ही पुत्रेषणा की पूर्ति होती है। सृष्टि में प्रत्येक व्यक्ति का योगदान आवश्यक होता है। (आजन्म ब्रह्मचारी उसके अपवाद हैं)। सभी एषणाओं की पूर्ति के पश्चात् ही व्यक्ति संतुष्ट होने के बाद मोक्ष प्राप्ति की ओर उन्मुख होता है। मोक्ष की प्राप्ति के लिए वह सब कुछ त्याग कर वन में निवास करता है और वहीं ईश्वर आराधना में अपना शेष जीवन व्यतीत करता है, और ईश्वर में लीन होकर मोक्ष को प्राप्त होता है। संस्कार :- गृह्यसूत्र तथा धर्मसूत्रों में गृह्य-कर्मों का स्थूल रूप से वर्णन किया गया है। सम्पूर्ण गृह्यसूत्रों में पुंसवन, जातकर्म, नामकरण, अन्नप्राशन, चौलकर्म, उपनयन, चूड़ाकर्म, समावर्तन आदि संस्कारों के बारे में विस्तार से वर्णन किया गया है। विवाह संस्कार में विवाह के प्रकार, औचित्य, विवाहयोग्य कन्या के गुण, १. ऋग्वेद १/१८७/१ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar