वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 286 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता गृह्यालंकार आदि का विस्तृत वर्णन किया गया है। पाप के कारणों, प्रकार एवं उसके प्रायश्चित के बारे में भी इनमें पूर्ण जानकारी प्रदान की गई है। श्राद्ध, अंत्येष्टि, तर्पण- मासबद्ध, पितृदेवता, ऋषि तर्पण आदि की विस्तृत जानकारी धर्मसूत्र एवं गृह्यसूत्र में उपलब्ध है। नारी की स्थिति :- वैदिक वाङ्मय में कहीं भी नारी की स्थिति हीन दृष्टि से नहीं देखी गयी है क्योंकि उसको सदैव ही पुरुष की अर्द्धांगिनी स्वीकार किया गया है। शिक्षा की दृष्टि से भी उसे पुरुष के बराबर ही पूर्ण अधिकार प्राप्त थे। वह भी ब्रह्मचर्य व्रत का पूर्ण पालन करती हुई वेदाध्ययन और सम्पूर्ण विद्याओं का ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात् ही विवाह के योग्य समझी जाती थी। उसे अपने योग्य ही पति चुनने का पूर्ण अधिकार था। अयोग्य वर को कन्या सौंपने का प्रावधान नहीं मिलता है। जहाँ नारी की पूजा होती है वहीं देवता का वास होता है, यह उक्ति इसी वातावरण में चरितार्थ होती है। माँ के रूप में उसे पुत्रों में अच्छे संस्कार और गुणों के समावेश का दायित्व माँ के ऊपर ही माना जाता था। धार्मिक कृत्यों की पूर्ति भी पुरुष बिना पत्नी के नहीं कर सकता था। बहुपत्नी की प्रथा उस समय नहीं थी। अपवाद अवश्य प्राप्त होते थे जैसे याज्ञवल्क्य की दो पत्नियों का उल्लेख प्राप्त होता है। यत्र नार्यः पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः। विवाह :- गृह्यसूत्र एवं धर्मसूत्रों में वैदिक आर्यों की प्राचीन सामाजिक एवं गृहस्थजीवन से सम्बन्धित जानकारी प्राप्त होती है। इसमें विवाह के बारे में पूर्ण एवं विशद वर्णन प्राप्त होता है। आश्वलायन गृह्यसूत्र में कहा गया है कि विवाह के सन्दर्भ जनपदों और ग्रामों में प्रचलित बहुविध धर्मों का अनुसरण करना चाहिए- अथ खलु उच्चावचाः जनपदः धर्माः ग्रामधर्मांश्च, ताने विवाहे प्रतीत्यात्। १ विवाह के समय की सारी रस्में, यथा- अग्नि परिक्रमा, लाजा-होमा, पाणिग्रहण, सप्तपदी आदि कृत्य प्रायः सभी ग्रन्थों में उपलब्ध हैं। इस प्रकार राष्ट्रीयएकता एवम् अखण्डता में गृह्यसूत्रों एवं धर्मसूत्रों द्वारा प्रदत्त सारी दिशाओं से व्यक्ति का जीवन संतुलित, धार्मिक एवं निष्ठावान् बनता है। वह अपने सारे दायित्वों चाहे वे राष्ट्र के प्रति हो, समाज के प्रति हो या फिर परिवार के प्रति, उसे कहीं भी नैतिकता की सीमाओं का अतिक्रमण करने की अनुमति नहीं देता है। १. आश्वलायन गृह्यसूत्र १/५/१-२ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar