वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 315, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri अष्टम अध्याय 287 ३. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में गृह्यसूत्र एवम् धर्मसूत्र के राजदर्शन का अनुशीलन- वैदिकवाङ्मय में वेदों से लेकर सूत्रों तक सभी में राजनीति को लेकर सभी प्रकार के विषयों पर विशिष्ट रूप से विचार किया गया है क्योंकि राजा, पुरोहित या जन- समुदाय, धर्म और नीति से कहीं भी परे नहीं हैं। सबको इन्हीं के अनुरूप आचरण करना पड़ता है। धर्मसूत्रों में गृहस्थ सूत्रों की अपेक्षा विस्तृत क्षेत्र को लिया गया है। 'गौतम धर्मसूत्र' में राजा के कर्तव्य, कर, स्वत्व के स्रोत, राजधर्म, राजपुरोहित के गुण इत्यादि का विस्तृत वर्णन किया गया है। राष्ट्र की राजनीति का आधार राजा ही होता है और उसके गुणों के आधार पर उसका चयन करने का अधिकार जनसामान्य को प्राप्त होता है। धर्म के अनुसार आचरण करने वाला, प्रजा को पुत्रवत् समझने वाला, शत्रु के लिए भूखे शेर का भाव रखने वाला, राजा ही श्रेष्ठ होता है। भारतीय राजनीति का मूल सिद्धान्त रहा है कि राष्ट्र के परिपालन में क्षात्र-तेज के साथ ब्रह्मवर्चस का पूर्ण सहयोग होने पर ही देश और राष्ट्र की समृद्धि निश्चित रहती है। वसिष्ठ ने इस विषय में ब्राह्मण ग्रन्थों से एक बहुमूल्य उद्धरण दिया है- 'ब्रह्म पुरोहितं राष्ट्र भृष्योनीति' महाकवि कालिदास ने अनेक शताब्दियों के अनन्तर इस राष्ट्रीय एकता की भावना को पवन और अग्नि का परिचित दृष्टान्त देकर परिपुष्ट किया है (रघु० ८/४)- स बभूव दुरासदः परैर्गुरुणाथर्वविदा कृत क्रियः। पवनाग्नि समागमो ह्यं सहितं ब्रह्म यद सुतेज सा॥ राजा का प्रधान कार्य है- देश का रक्षण और अपराधियों का दण्डन। दण्ड से दण्डित अपराधी अपने पापों से मुक्त होकर निर्मल बन जाता है तथा पुण्यात्माओं के समान स्वर्ग जाता है। यदि राजा अपराधी को दण्ड नहीं देता तो वह पाप उस राजा को पकड़ लेता है। अतः अपने कल्याण और अपराधी के कल्याण के लिये भी अपराधी को दण्ड देना राजा का मुख्य कर्तव्य होता है- राजाभिर्धुत दण्डास्तु कृत्वा पापानि मानवाः। निर्मला स्वर्गमायान्ति सन्तः सुवृतिनो यथा॥ (१९/४५) राजदर्शन में ही सूद ब्याज के ग्रहण पर प्रायश्चित का विधान है। साक्षी के कथन पर सन्देह होने की स्थिति में दिव्य परीक्षा का विधान किया गया है। (आपस्तम्ब धर्मसूत्र) CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar