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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 286 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता गृह्यालंकार आदि का विस्तृत वर्णन किया गया है। पाप के कारणों, प्रकार एवं उसके प्रायश्चित के बारे में भी इनमें पूर्ण जानकारी प्रदान की गई है। श्राद्ध, अंत्येष्टि, तर्पण- मासबद्ध, पितृदेवता, ऋषि तर्पण आदि की विस्तृत जानकारी धर्मसूत्र एवं गृह्यसूत्र में उपलब्ध है। नारी की स्थिति :- वैदिक वाङ्मय में कहीं भी नारी की स्थिति हीन दृष्टि से नहीं देखी गयी है क्योंकि उसको सदैव ही पुरुष की अर्द्धांगिनी स्वीकार किया गया है। शिक्षा की दृष्टि से भी उसे पुरुष के बराबर ही पूर्ण अधिकार प्राप्त थे। वह भी ब्रह्मचर्य व्रत का पूर्ण पालन करती हुई वेदाध्ययन और सम्पूर्ण विद्याओं का ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात् ही विवाह के योग्य समझी जाती थी। उसे अपने योग्य ही पति चुनने का पूर्ण अधिकार था। अयोग्य वर को कन्या सौंपने का प्रावधान नहीं मिलता है। जहाँ नारी की पूजा होती है वहीं देवता का वास होता है, यह उक्ति इसी वातावरण में चरितार्थ होती है। माँ के रूप में उसे पुत्रों में अच्छे संस्कार और गुणों के समावेश का दायित्व माँ के ऊपर ही माना जाता था। धार्मिक कृत्यों की पूर्ति भी पुरुष बिना पत्नी के नहीं कर सकता था। बहुपत्नी की प्रथा उस समय नहीं थी। अपवाद अवश्य प्राप्त होते थे जैसे याज्ञवल्क्य की दो पत्नियों का उल्लेख प्राप्त होता है। यत्र नार्यः पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः। विवाह :- गृह्यसूत्र एवं धर्मसूत्रों में वैदिक आर्यों की प्राचीन सामाजिक एवं गृहस्थजीवन से सम्बन्धित जानकारी प्राप्त होती है। इसमें विवाह के बारे में पूर्ण एवं विशद वर्णन प्राप्त होता है। आश्वलायन गृह्यसूत्र में कहा गया है कि विवाह के सन्दर्भ जनपदों और ग्रामों में प्रचलित बहुविध धर्मों का अनुसरण करना चाहिए- अथ खलु उच्चावचाः जनपदः धर्माः ग्रामधर्मांश्च, ताने विवाहे प्रतीत्यात्। १ विवाह के समय की सारी रस्में, यथा- अग्नि परिक्रमा, लाजा-होमा, पाणिग्रहण, सप्तपदी आदि कृत्य प्रायः सभी ग्रन्थों में उपलब्ध हैं। इस प्रकार राष्ट्रीयएकता एवम् अखण्डता में गृह्यसूत्रों एवं धर्मसूत्रों द्वारा प्रदत्त सारी दिशाओं से व्यक्ति का जीवन संतुलित, धार्मिक एवं निष्ठावान् बनता है। वह अपने सारे दायित्वों चाहे वे राष्ट्र के प्रति हो, समाज के प्रति हो या फिर परिवार के प्रति, उसे कहीं भी नैतिकता की सीमाओं का अतिक्रमण करने की अनुमति नहीं देता है। १. आश्वलायन गृह्यसूत्र १/५/१-२ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri अष्टम अध्याय 287 ३. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में गृह्यसूत्र एवम् धर्मसूत्र के राजदर्शन का अनुशीलन- वैदिकवाङ्मय में वेदों से लेकर सूत्रों तक सभी में राजनीति को लेकर सभी प्रकार के विषयों पर विशिष्ट रूप से विचार किया गया है क्योंकि राजा, पुरोहित या जन- समुदाय, धर्म और नीति से कहीं भी परे नहीं हैं। सबको इन्हीं के अनुरूप आचरण करना पड़ता है। धर्मसूत्रों में गृहस्थ सूत्रों की अपेक्षा विस्तृत क्षेत्र को लिया गया है। 'गौतम धर्मसूत्र' में राजा के कर्तव्य, कर, स्वत्व के स्रोत, राजधर्म, राजपुरोहित के गुण इत्यादि का विस्तृत वर्णन किया गया है। राष्ट्र की राजनीति का आधार राजा ही होता है और उसके गुणों के आधार पर उसका चयन करने का अधिकार जनसामान्य को प्राप्त होता है। धर्म के अनुसार आचरण करने वाला, प्रजा को पुत्रवत् समझने वाला, शत्रु के लिए भूखे शेर का भाव रखने वाला, राजा ही श्रेष्ठ होता है। भारतीय राजनीति का मूल सिद्धान्त रहा है कि राष्ट्र के परिपालन में क्षात्र-तेज के साथ ब्रह्मवर्चस का पूर्ण सहयोग होने पर ही देश और राष्ट्र की समृद्धि निश्चित रहती है। वसिष्ठ ने इस विषय में ब्राह्मण ग्रन्थों से एक बहुमूल्य उद्धरण दिया है- 'ब्रह्म पुरोहितं राष्ट्र भृष्योनीति' महाकवि कालिदास ने अनेक शताब्दियों के अनन्तर इस राष्ट्रीय एकता की भावना को पवन और अग्नि का परिचित दृष्टान्त देकर परिपुष्ट किया है (रघु० ८/४)- स बभूव दुरासदः परैर्गुरुणाथर्वविदा कृत क्रियः। पवनाग्नि समागमो ह्यं सहितं ब्रह्म यद सुतेज सा॥ राजा का प्रधान कार्य है- देश का रक्षण और अपराधियों का दण्डन। दण्ड से दण्डित अपराधी अपने पापों से मुक्त होकर निर्मल बन जाता है तथा पुण्यात्माओं के समान स्वर्ग जाता है। यदि राजा अपराधी को दण्ड नहीं देता तो वह पाप उस राजा को पकड़ लेता है। अतः अपने कल्याण और अपराधी के कल्याण के लिये भी अपराधी को दण्ड देना राजा का मुख्य कर्तव्य होता है- राजाभिर्धुत दण्डास्तु कृत्वा पापानि मानवाः। निर्मला स्वर्गमायान्ति सन्तः सुवृतिनो यथा॥ (१९/४५) राजदर्शन में ही सूद ब्याज के ग्रहण पर प्रायश्चित का विधान है। साक्षी के कथन पर सन्देह होने की स्थिति में दिव्य परीक्षा का विधान किया गया है। (आपस्तम्ब धर्मसूत्र) CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 288 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता गृह्यसूत्रों और धर्मसूत्रों के अनुसार ही राजा राष्ट्र का प्रधान होने के नाते राष्ट्र की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध होता है। राजपुरोहित उसे नैतिकता से परिचित एवं निर्णय हेतु परामर्श प्रदान करता रहता है। राष्ट्र की शत्रुओं से रक्षा करना और प्रजा की भी रक्षा एवं भरण-पोषण का दायित्व राजा के प्रति होता है। जहाँ पर शत्रुरहित राष्ट्र हो, प्रजा खुशहाल रहती है। आपस में वैर और वैमनस्य का भाव न हो तो ऐसे राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता को कहीं से कोई खतरा नही होता है। हमारे धर्मसूत्र ही हमें धार्मिक व नैतिकतापूर्ण राष्ट्र के बारे में अवगत कराते हैं। ४. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में गृह्यसूत्र एवम् धर्मसूत्र के धर्मदर्शन का अनुशीलन- धर्म ही से सम्बद्ध सारे नियम, सिद्धान्त और व्यवस्थाओं को ही मानव जीवन को संचालित करने के लिए निश्चित किया गया है। धर्म की धुरी पर परिक्रमा करता हुआ मानव जीवन उससे अलग होकर कुछ धर्म विरुद्ध कर ही नहीं सकता है। तन्त्रवार्तिककार भट्ट कुमारिल का कथन है कि सभी धर्मसूत्र वर्णों और आश्रमों के कर्तव्यों का उपदेश देते हैं। व्यवहारधर्म तथा राजधर्म भी इसमें सम्मिलित है। इसमें 'सामयाचारिक धर्म' (समय अथवा परम्परा पर आधृत धर्म) की विशेष व्याख्या की गई है। 'स्मृति' में इसी का नामान्तर है। अतएव स्मार्त धर्म भी इसे कहा जा सकता है। गौतम धर्मसूत्र के मतानुसार वेद, वेदज्ञों के आचरण तथा उनकी धर्मपरम्परा के मूल हैं- वेदो धर्ममूलम्। तद्विदाञ्च स्मृतिशीले।१ इसी की पुष्टि आपस्तम्ब तथा अन्य धर्मसूत्रों ने भी की है- धर्मज्ञसमयः प्रमाणं वेदाश्च२ एवम् श्रुति स्मृति विहितो धर्मः। तदलाभे शिष्टाचारः प्रमाणम्।३ मनुप्रभृति धर्मशास्त्रियों ने वेद वेदज्ञों के साथ ही शिष्ट तथा साधु पुरुषों के आचरण को भी धर्म कोटि में सम्मिलित कर दिया है। शिष्ट श्रेणी में स्वार्थहीन और निःस्पृह व्यक्तियों को ही रखा गया है। १. गौतम धर्मसूत्र १/१-२ २. आपस्तम्ब धर्मसूत्र १/१/२ ३. आपस्तम्ब धर्मसूत्र १/१/३ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri अष्टम अध्याय 289 वसिष्ठ धर्मसूत्र का अन्तिम अध्याय समग्र धर्मशास्त्र की कुञ्जी है— धर्म महिमा की प्रशस्ति है। भारतीय स्मृतिकारों ने स्वर में स्वर मिलाकर वसिष्ठ द्वारा यह घोषणा की है— धर्मं चरत माऽधर्मं सत्यं वदत माऽनृतम्। दीर्घं पश्यत मा ह्रस्वं परं पश्यत माऽपरम्॥१ अर्थात् 'धर्म का आचरण करो, अधर्म का आचरण मत करो, सत्य बोलो, झूठ मत बोलो, दीर्घ देखो, ह्रस्व मत देखो— अर्थात् किसी वस्तु के विषय में दूरदर्शी बनो। छोटी वस्तु को देखकर अपने विचारों को क्षुद्र, हीन और छोटा मत बनाओ। सदा श्रेष्ठ वस्तु को देखो। जीवन का लक्ष्य सदा ऊँचा बनाये रखो। वसिष्ठ की यह शिक्षा स्वर्णाक्षरों में लिखने योग्य है। इस तरह धर्म के आचरण द्वारा ही जीवन का ध्येय निश्चित कर दिया जाता है। जहाँ इस प्रकार का समाजदर्शन और धर्मदर्शन होगा वहाँ पर राष्ट्र के स्वरूप को निश्चित करने में अधिक समय नहीं लगता है। वसिष्ठ का जीवनदर्शन नितान्त उदात्त एवं कर्मनिष्ठ तथा पूर्णतया आध्यात्मिक है। वे हमें स्वस्थ, शिष्ट तथा संस्कृत भारतीय बनकर जीवन-यापन का उपदेश देते हैं तथा उस तृष्णा के परिहार की शिक्षा देते हैं जिसे दुर्बुद्धि कठिनता से छोड़ सकता है, जो व्यक्ति के जीर्ण होने पर भी स्वयं जीर्ण नहीं होता और जो प्राणान्तिक व्याधि है— या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः। याऽसौ प्राणान्तिको व्याधिस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम्॥२ धर्म के द्वारा ही व्यक्ति अपने जीवन के अन्तिम लक्ष्य तक पहुँच सकता है। जहाँ ब्रह्मचर्य आश्रम काल में ही मानव को धर्म के चारों ओर परिक्रमा का व्रत दिया जाता है, वहाँ अधर्म के बारे में व्यक्ति सोच ही नहीं सकता है। जहाँ राष्ट्रधर्म, पितृधर्म, पुत्रधर्म और पतिधर्म का पालन ही जीवन का अन्तिम लक्ष्य हो, तो वह इस धर्म से विलग वह कहाँ हो सकता है। यदि राष्ट्रीय एकता और अखण्डता के सन्दर्भ में इस पर विचार किया जाये तो जीवन के सभी धर्म का सबल पालन करने वाला मानव राष्ट्रधर्म से विमुख हो ही नहीं सकता है। जब वह प्रजाधर्म का पालन करके राष्ट्रधर्म की पूर्ति करता है, तो ऐसे नागरिकों पर राष्ट्र सदैव ही गर्व कर सकता है। १. वसिष्ठ धर्मसूत्र ३०/१ २. योगवासिष्ठ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 290 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता ५. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में गृह्यसूत्र एवं धर्मसूत्र के आचारदर्शन, शिक्षादर्शन एवं अर्थदर्शन का अनुशीलन- मानवजीवन में आचार और विचार, दोनों की ही महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। धर्म से ही आचार का प्रादुर्भाव होता है। इन आचारों के लिये कोई भी अन्य विकल्प नहीं है। वसिष्ठधर्मसूत्र में आचार पर बहुत अधिक बल दिया गया है— आचार: परमोधर्मः सर्वेषामिति निश्चयः। हीनाचार परीतात्मा प्रेत्य चेह च नश्यति॥१ अर्थात् आचार ही जीवन का सबके बड़ा धर्म है, इस बात को सर्वसम्मति से विद्वानों ने स्वीकार किया है। आचारहीन व्यक्ति उसी तरह नष्ट हो जाता है जिस तरह प्रेतात्मा आदि अपना कोई अस्तित्व नहीं रखती। वसिष्ठ ने अपने मतों का प्रतिपादन थोड़े में, परन्तु बड़ी ही स्पष्ट भाषा में किया है। मौलिक विचार और प्रौढ़ विवेचना की छाप सम्पूर्ण ग्रन्थ में स्पष्ट परिलक्षित है। अन्य स्मृतिकारों के समान वसिष्ठ का सम्पूर्ण आग्रह 'आचार' ही है। आचार ही व्यक्ति तथा समाज को मान्यता, दीर्घ जीवन और सत्कार प्राप्त कराता है। शास्त्र का अभ्यास, विद्या का अर्जन तथा विज्ञान का उपार्जन अवश्य ही उपादेय वस्तु है, परन्तु व्यवहार में लाये बिना, अर्थात् आचार के रूप में परिणत किये बिना, वह सब केवल भाव मात्र हैं— उपयोग से हीन होने के कारण केवल बोझ मात्र बन जाता है। आचार से हीन व्यक्ति के लिए यह लोक भी नष्ट है और परलोक भी असिद्ध ही है। आचाररहित व्यक्ति में समस्त यज्ञ तथा षडङ्गों से युक्त वेद भी उस प्रकार प्रीति उत्पन्न नहीं करते जिस प्रकार अन्धे के हृदय में सुन्दरी भार्या की उपस्थिति :- आचारहीनस्य तु ब्राह्मणस्य वेदाः षडङ्गास्त्वखिलाः सयज्ञाः। कां प्रीतिमुत्पादयितुं समर्था अन्धस्य दारा इव दर्शनीयाः॥२ इन आचार-विचारों की शुद्धि और उन पर आचरण का उपदेश ब्रह्मचर्य आश्रम के काल में गुरु द्वारा शिष्यों को प्रदान किया जाता था क्योंकि जीवन समर में उनकी प्रवृत्ति इसी के बाद ही होती थी। वे अपने पूर्ण दायित्वों से परिचित होकर, सम्पूर्ण शिक्षाओं को ग्रहण करके ही सही अर्थों में दायित्वों के क्षेत्र में तब आते थे जबकि वे गृहस्थाश्रम में प्रवेश करते थे। छात्रों को दीक्षान्त अवसर पर प्रदत्त उपदेश इस बात १. वसिष्ठ धर्मसूत्र ६/१ २. वसिष्ठ धर्मसूत्र ६/४ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri अष्टम अध्याय 291 को प्रदर्शित करता है कि जिन बातों का ज्ञान उसे अपने शिक्षाकाल में कराया गया है, उनका परिपालन अब गृहस्थ जीवन में अवश्य ही करना है और इसी के परिप्रेक्ष्य में वह इस प्रकार अपने शिष्य को उपदेश देता है :- सत्य बोलो, धर्माचरण करो, स्वाध्याय में प्रमाद मत करो। गृहस्थाश्रम में प्रवेश कर वंश परम्परा को आगे बढ़ाओ। सत्य, धर्म, कुलक्षेत्र, समृद्धि, देव-पितृकार्यों में कभी प्रमाद न करो। माता, पिता, आचार्य और अतिथि को देवता के समान समझो। गुरुजनों के निर्दोष आचरण का ही अनुकरण करो, अन्यों का नहीं। जो कल्याणकारी ब्राह्मण हैं, उनके निकट बैठकर उनमें विश्वास करो। दान श्रद्धा, भक्ति, लज्जा, भय और अनुबन्ध, सभी प्रकार से देना चाहिये। अपने कर्म और आचरण के विषय में किसी प्रकार का सन्देह होने पर विचारशील, संतुलित, धर्मात्मा व्यक्तियों के व्यवहार से मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहिये। यही वेदों का रहस्य है। यही अनुशासन है। इसी की उपासना करनी चाहिये।१ गृह्यसूत्रों एवं धर्मसूत्रों के आचार दर्शन से प्राप्त होता है- आदर्श समाज और उसके अनुशासित नागरिक। उनसे ही बनता है- सम्पूर्ण राष्ट्र। जिनके लिये संस्कृति से एक आदर्श परिकल्पना उत्पन्न हो, वहाँ पर राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता को सदैव बल ही प्राप्त होगा। वैदिकवाङ्मय में प्राप्त शिक्षाव्यवस्था भी आदर्श शिक्षादर्शन पर आधारित थी। शिक्षा प्रणाली का आधार स्मृति, ज्ञान और बोध तीनों ही थे। शिक्षा प्रयोगों के द्वारा प्रमाणित करके ही दी जाती थी और यही आज्ञा दी जाती थी कि वह जीवन में इन शिक्षाओं को पूरी तरह ग्रहण करके समाहित कर लेगा। गुरु योग्य शिष्य को ही शिक्षा देना स्वीकारता था ताकि उसकी दी हुई शिक्षा सार्थक हो सके। शिक्षा के बारे में इस प्रकार उल्लिखित है- यमेव विद्याः शुचि म प्रमत्तः मेधाविनं ब्रह्मचर्योपपन्न। गुरु उसी शिष्य को अपना ज्ञान प्रदान करें जो पवित्र मेधा, अप्रमादी, ब्रह्मचारी और ज्ञान का संरक्षक हो। गुरु द्वारा शिष्य से सदैव यही अपेक्षा की जाती थी कि वह अपने भावी जीवन के सभी कर्तव्यों एवं दायित्वों को धर्मपूर्वक निर्वाह करेगा और सत्य के मार्ग पर चलते हुए ही मोक्ष की प्राप्ति करेगा। गृह्यसूत्रों एवं धर्मसूत्रों में प्राप्त अर्थदर्शन भी उतना ही महत्त्वपूर्ण स्थान रखता था। वैसे तो इन सूत्रों में जीवन के संस्कारों, क्रियाओं और कर्तव्यों के बारे में वर्णन १. तैत्तिरीय उपनिषद् ७/११ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 292 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता किया गया है, लेकिन यह विचार किया जा सकता है कि इस क्षेत्र में किया गया वर्णन या तो इस विषय के लुप्त साहित्य में वर्णित होगा अथवा उसको सभी कर्मों के साथ समाहित करके प्रस्तुत किया गया होगा। इस प्रकार से यदि देखा जाय तो इन ग्रन्थों का राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में महत्त्वपूर्ण योगदान है। ६. राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता को गृह्यसूत्र एवं धर्मसूत्र का प्रदेय- राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता को गृह्यादि एवम् धर्मसूत्र के योगदान को भी इतना ही महत्त्व प्रदान किया जा सकता है, जितना कि शेष ग्रन्थों को। इन सूत्र ग्रन्थों के प्रादुर्भाव का आधार हमारे चारों वेद ही हैं। इन ग्रन्थों में वर्णित राजा के कर्तव्यों एवं गुणों से यह प्रदर्शित होता है कि सदा सत्य का पालन करने वाला, न्यायप्रिय, विधि का सम्मान'रखने वाला तथा वेद संहिता का पालन करने वाला राजा सबसे अधिक योग्य एवं कुशल राष्ट्र संचालक कहा जा सकता है। ऐसे राजा के लिए समाज में, राष्ट्र की प्रजा में, सदैव श्रद्धा और निष्ठा का भाव बना रहता है। जहाँ निष्ठावान प्रजा हो, धर्माचरण करने वाली प्रजा हो, राष्ट्र की आचार संहिता का पालन करने वाली प्रजा हो, तो उस राष्ट्र की एकता और अखण्डता पर सन्देह किया ही नहीं जा सकता है। राष्ट्र के लिए राजा और पुरोहित सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति होते हैं। राजा को सही दिशा-निर्देश देने का कार्य पुरोहित का ही होता है। राजा एवं पुरोहित के मध्य मतैक्य तथा वैचारिक अनुकूलता ही राष्ट्र की समृद्धि में पूर्ण सहायक सिद्ध होती है। एक व्यक्ति सम्पूर्ण राष्ट्र के बारे में सही विचार कर सकता है, यह पूरी तरह संभव नहीं है। और यदि यही कार्य सभा और समिति के परामर्श के अनुसार राजा और पुरोहित करते हैं तो वह राष्ट्रहित में और धर्म के अनुसार होता है। इसमें राजा के निरंकुश होने के अवसर समाप्त हो जाते हैं। राष्ट्र के प्रति सजग राजा ही सही अर्थों में पिता की भूमिका का निर्वाह करता है। यह गुण इस राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के लिए सार्थक सिद्ध होता है। राजा की तरह ही प्रजा का भी राजा एवं राष्ट्र के प्रति कुछ दायित्व होते हैं, जिनको पालन करकें ही वह राष्ट्र की सुख एवम् समृद्धि में अपना पूर्ण योगदान दे सकती है। राष्ट्र में अनेक श्रेणियों के लोग होते हैं। सभी ज्ञानपूर्ण एवं दुर्गुणों से रहित हों ऐसा तो संभव नहीं होता है। सम्पूर्ण राष्ट्र में विभिन्न श्रेणियों के व्यक्ति होंगे, उनमें स्वार्थ या अज्ञानवश विद्वेष की भावना का भी विकास हो सकता है। उनमें विद्या या CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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अष्टम अध्याय 293 धन के आधार पर ऊँच-नीच की भावना आ सकती है जो कि राष्ट्र के हित में नहीं होगी। मातृभूमि के प्रति त्याग, उत्सर्ग और समग्र का हित चाहने की भावना रखने वाला ही सच्चे अर्थों में मातृभूमि का भक्त कहा जा सकता है। ऐसे व्यक्ति ही मातृभूमि के लिए गौरव का विषय होते हैं- यां रक्षन्त्यस्वप्ना विश्वदानीं देवा भूमिं पृथिवीमप्रमादम्। सा नो मधु प्रियं दुधमथो उक्षतु वर्चस्व॥ अर्थात् वे राष्ट्रभक्त या राष्ट्रपुत्र जिनमें आलस्य, निद्रा और तन्द्रा का अभाव होता है और वे कुशल, वीर एवं संयमी व्यक्ति अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए सदैव ही सजग रहते हैं जो अपने राष्ट्र की सुख एवं समृद्धि के लिए सदैव तत्पर रहते हैं तथा राष्ट्र की रक्षा के प्रति सदैव सावधान रहते हैं। वे राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता की रक्षा में सदैव सहायक होते हैं। अ॒सं॒बा॒धं ब॑ध्य॒तो मानु॑वानां॒ यस्या॑ उ॒द्वतः॑ प्र॒वत॑: स॒मं बहु॑। नाना॑वी॒र्या ओष॑धी॒र्या बिभ॑र्ति पृथि॒वी न॑: प्रथ॒तां राध्य॑तां नः॥१ अर्थात् जिस विशाल राष्ट्र में, मातृभूमि की गोद में, मननशील विद्वानों के मध्य भी उच्चता एवं भिन्नता का भाव पाये जाने पर भी उसमें समता और मतैक्य पाया जाता है और जो अपनी मातृभूमि या कर्मभूमि के लिए, जिसने हमारे विकास एवं निरोग शरीर हेतु रोगनाशक, बलदायक वनस्पतियों को अपने गर्भ से प्रकट करके हमें बल प्रदान किया है वह मातृभूमि हमारे यश एवं कीर्ति के साधनों का विस्तार करें। जहाँ नागरिकों में ऐसे सुन्दर विचार एवं भावनाओं का समावेश वैदिक साहित्य से प्राप्त हो रहा है जो कि इस राष्ट्र की संस्कृति और जीवन का आधार है, वहाँ पर राष्ट्र के प्रति सुन्दर विचार एवं भावों का समाहित होना स्वाभाविक ही है। जहाँ प्रत्येक धर्म के प्रति सम्मान और श्रद्धा व्याप्त हो, जहाँ हर मस्तक, चाहे वह मस्जिद हो, गुरुद्वारा, चर्च या मन्दिर हो, झुकता हो, वहाँ की एकता पर प्रश्नचिह्न लगने का प्रश्न ही नहीं होता है। सभी धर्मों और संस्कृतियों को अपने में समाहित करके एक नया स्वरूप प्रदान करना ही भारतीय संस्कृति की सदियों से विशेषता रही है। यही नहीं बल्कि दूसरे देशों तक अपनी संस्कृति का सम्मान दिलाने वाले राष्ट्रजनों पर यह राष्ट्र गर्व करता है। अपने राष्ट्रीयगौरव को सम्पूर्ण विश्व में बढ़ाने वाले राष्ट्रपुत्रों का अभाव नहीं है।

१. अथर्ववेद १२/१/२

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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294 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता सदैव बुराइयों को दृष्टिगत न करने की शिक्षा देने वाली संस्कृति वाले राष्ट्र में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के लिए यह साहित्य अमूल्य निधि है, जिसने हर दृष्टि से राष्ट्र को एकता के सूत्र में बँधने में सहायता प्रदान की है।

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri नवम अध्याय तुलनात्मक अनुशीलन शोध विषय के अनुरूप ही वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत विचारों के बारे में तुलनात्मक अध्ययन कर उसकी उपयोगिता के प्रति तर्कसंगत विचारों का प्रस्तुतीकरण किया जा रहा है। १. प्राचीनवाङ्मय में राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के सम्बन्ध में विचार- प्राचीनवाङ्मय हो या आधुनिक, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक व नैतिक मूल्यों में आमूल चूल परिवर्तन कभी भी नहीं होता। भारत जैसे आदर्श एवं आध्यात्मिकता से ओतप्रोत राष्ट्र में संस्कृति का सम्मान बहुत अधिक है। प्राचीन वाङ्मय का सम्मान भी बहुत अधिक किया जाता है। प्राचीनवाङ्मय में राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के प्रति सम्पूर्ण दायित्व प्रजा का ही नहीं था। इसमें सर्वप्रथम भूमिका राजा की होती थी। नैतिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों का सम्मान करने वाला राजा ही राष्ट्र के विकास एवं समृद्धि में सहायक हो सकता है- ब्रह्मचर्ये॑ण॒ तप॑सा॒ राजा॑ रा॒ष्ट्रं वि रक्ष॑ति।१ अर्थात् ब्रह्मचर्य और तपस्या का पालन करने वाला राजा ही राष्ट्र की रक्षा कर सकता है। जहाँ राष्ट्र का नायक सद् चरित्र और धर्म का पालन करने वाला होगा, उस राष्ट्र की प्रजा का चरित्र स्वाभाविक रूप से उसी के अनुरूप होगा क्योंकि राष्ट्रनायक एक आदर्श माना जाता है और जब सम्पूर्ण राष्ट्र एक आदर्श व्यक्तित्व को अपना आदर्श मानकर चलेगा तो राष्ट्र की एकता और अखण्डता को पृथक् परिभाषित करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। अथर्ववेद के अनुसार नागरिकों में व्याप्त सद्गुण राष्ट्र की एकता और अखण्डता को कायम रख सकते हैं। महती सत्यनिष्ठा, तरलता, प्रचण्ड क्षात्र-तेज, धर्मानुष्ठान एवं कर्त्तव्यपालन का गुण, प्रत्येक शुभ-कार्य को दक्षतापूर्वक सम्पन्न करना, १. अथर्ववेद ११/५/१७ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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296 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता यथार्थ-ज्ञान, समर्पण की भावना से युक्त नागरिक ही मातृभूमि, राष्ट्र अथवा देश को धारण अथवा पालन-पोषण करने में सक्षम होते हैं। वह मातृभूमि भी वर्तमान, भूत और भविष्य में सकल पदार्थों से अपने पुत्रों का पालन करने में सक्षम होती है, ऐसी मातृभूमि हमारी उन्नति के लिए अत्यन्त विस्तृत स्थान एवं अवसर प्रदान करती है। स॒त्यं बृ॒हदृ॒तमु॒ग्रं दी॒क्षा तपो॒ ब्रह्म॑ य॒ज्ञः पृ॑थि॒वीं धारयन्ति। सा नो॑ भू॒तस्य॒ भव्य॑स्य॒ पत्न्यु॒रुं लो॒कं पृ॑थि॒वी नः॑ कृणोतु॥१ इस मंत्र के द्वारा सरल स्वभाव, पराक्रमशीलता, दक्षता, तप, ब्रह्म या ज्ञान एवं यज्ञ रूप आत्मसमर्पण की भावना को मातृभूमि की उन्नति के लिए अनिवार्य बताया गया है। इन्हीं की सहायता से राष्ट्र में एक ऐसी सुव्यवस्था स्थापित हो सकती है जिसमें किसी भी प्रकार शत्रु द्वारा राष्ट्र की अखण्डता पर प्रहार करने का दुःसाहस करना सम्भव न हो। प्रत्येक राष्ट्रभक्त का कर्तव्य है कि इन नियमों का सम्यक् पालन करे। मंत्र के पूर्वार्द्ध में राष्ट्ररक्षा के अनिवार्य सिद्धान्तों का प्रतिपादन करके उत्तरार्द्ध में बतलाया गया है कि आदर्श नागरिक इन नियमों का पालन करता है। मातृभूमि से भी वह कुछ अपेक्षा रखता है कि उसे अपने भविष्य को संवारने का पूर्ण अवसर प्राप्त हो। वह जिस दिशा में जाना चाहेगा, उसे सम्यक् उन्नति करने के लिए द्वार खुले होंगे और इन इच्छाओं की पूर्ति होने पर नागरिक सभी दृष्टि से संतुष्ट हो जाता है और अपने राष्ट्र के प्रति पूर्णतया समर्पित रहता है। इस समर्पण की भावना का सन्देश वैदिक वाङ्ग्मय की ही देन है। यस्याः मानवानां मध्यतः बहु असम्बाधम्। जिस राष्ट्र या मातृभूमि के विभिन्न सम्प्रदायों में सहज भेद होते हुए निर्वैरभाव एवं सामूहिक उन्नति में परस्पर सौहार्द एवं सहयोग करने की भावना होती है, वही यथार्थ रूप से प्रगति कर सकता है। इस प्रकार का राष्ट्र वास्तव में यश और कीर्ति के साधनों का विस्तार कर सकता है। जनं॒ बिभ्र॑ती बहु॒धा विर्वाचसं॒ नाना॑धर्माणं पृथि॒वी यथौक॑सम्। स॒हस्रं॒ धारा॒ द्रवि॑णस्य मे दुहां ध्रु॒वेव॑ धे॒नुरन॑पस्फुरन्ती॥२ १. अथर्ववेद १२/१/१ २. अथर्ववेद १२/१/४५ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri नवम अध्याय 297 अर्थात् इसमें राष्ट्र की प्रगति का मूलमंत्र बताते हुए कहा गया है कि सामूहिक प्रगति उस दिशा में ही संभव है जबकि नाना प्रकार के धर्मों को मानने वाले एवं भिन्न-भिन्न प्रकार के भाषाभाषी जन उसी प्रकार संगठित होकर रहते हैं जैसे कि एक परिवार में अत्यधिक विषमता रहने पर भी परिवार के सभी सदस्य परस्पर सद्भावना और सहानुभूतिपूर्वक रहते हैं। प्रत्येक परिवार में बाल, वृद्ध, युवा, महिलाएँ और पुरुष रहते हैं लेकिन एक छत के नीचे कोई भेदभाव नहीं होता। सभी आपस में समस्त भेदभावों से दूर होकर संगठित रूप से रहते हैं। आज के वर्तमानभारत में उस काल में वर्णित सभी दशाएँ विद्यमान हैं। इस विशाल राष्ट्र में नाना धर्म के लोग निवास करते हैं लेकिन मानव धर्म की परिभाषा सभी धर्मों में एक ही है। छोटी-छोटी बातों को देखा जायें तो जो बात एक धर्म में मान्य है वही दूसरे धर्म में अमान्य हो सकती है। अनेक भाषाभाषी लोग यहाँ पर रहते हैं। जब मिलते हैं तो भाषा न जानने पर भी टूटी-फूटी राष्ट्रभाषा का सहारा लेकर आपस में बात समझ ही लेते हैं। आज राष्ट्र की संघ-व्यवस्था का स्वरूप सम्पूर्ण राज्यों को एक संविधान के अन्तर्गत बाँध कर रखे है तथा हमारे राष्ट्र की शासन प्रणाली का लोकतांत्रिक स्वरूप आज की देन नहीं है अपितु यह वैदिक वाङ्मय में ही निश्चित कर दी गई थी। यह भी राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता की दिशा में अमूल्य योगदान है। २. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के सम्बन्ध में आधुनिक विचारधारा : राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता का जो स्वरूप भारत में प्राप्त होता है अन्यत्र कहीं प्राप्त नहीं होता है। राष्ट्रीयएकता मानव हृदयों में व्याप्त वह भावना है जो यदि राष्ट्रवासियों के मनमानस में एक बार निर्मित हो जाती है तो फिर कभी खण्डित नहीं होती है। यह भावना आज ही जागृत हुई हो ऐसा नहीं है, अपितु ऐतिहासिक क्रम में इसका पृथक् अस्तित्व उस चेतना का प्रतीक है जो सामान्य प्रवृत्तियों, परम्परागत रीति-रिवाजों, स्मृतियों, आकांक्षाओं, अवर्णनीय सांस्कृतिक धरोहरों एवं हितों पर आधारित होती है। राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के बारे में विभिन्न विद्वानों के विभिन्न विचार हैं। इस भावना पर प्रश्न चिह्न भी लगाये जाते हैं। कुछ लोगों का मत है कि भारत में अनेक भाषाएँ, अनेक धर्म, अनेक प्रकार के रीति-रिवाज पाये जाते हैं। भौगोलिक एकता भी नहीं है। एक ओर थार का मरुस्थल है तो दूसरी ओर कश्मीर की घाटी है। जातीय- एकता का भी कहीं नामोनिशान नहीं है। विभिन्न जातियाँ यहाँ पर रहती हैं। कतिपय CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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298 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता विद्वानों का, इन्हीं कारणों से दृष्टिपात करते हुए अभिमत है कि भारत एक राष्ट्र है। भारत के समस्त निवासी सदा से इस देश के प्रति एक आन्तरिक प्रेम और प्रगाढ़ एकता का अनुभव करते रहे हैं। यह भावना चिर स्थायी है। इस का प्रतीक है हमारी तीनों सेनाएँ, जिनमें राष्ट्र के सभी प्रदेशों, सभी जातियों के लोग देश की सुरक्षा के लिए दिन-रात सीमाओं पर चौकन्ने रहते हैं। वे सिर्फ अपने राष्ट्र के लिए चौकन्ने रहते हैं, देश के सजग प्रहरी होते हैं और उनमें सिर्फ भारतीय होने की भावना ही समाहित होती है। जन सामान्य में भी यह भावना राष्ट्र के ऊपर संकट के समय देखी जा सकती है। सामान्य दिनों में राष्ट्रीयएकता और अखण्डता का प्रमाण देने की कोई आवश्यकता नहीं होती है। यह भावना तभी प्रदर्शित करने की आवश्यकता पड़ती है जबकि राष्ट्र संकट की घड़ी से गुजर रहा हो। इसके ज्वलंत उदाहरण है १९६२ में हुई भारत और चीन की लड़ाई, जहाँ भारतीय जवानों ने अपनी जान की बाजी लगाई, वहीं साधारण लोगों ने अपने जेवर, कपड़े, धन, जिसके पास जो था जवानों के लिए, देश की रक्षा के लिए राष्ट्रीय रक्षाकोष में दान कर दिया। १९६५ की भारत- पाक लड़ाई भी ऐसी ही सिद्ध हुई। १९७१ में बांग्लादेश के सहायतार्थ लड़ी गई लड़ाई भी हमारे परीक्षा के क्षणों में से एक थी। वह राष्ट्रीयएकता और अखण्डता का प्रमाण था कि हम हमेशा विजयी होते रहे हैं। दुश्मन को हमारी पवित्र भावनाओं ने तोड़ कर रख दिया। राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के बारे में हमारे स्व० डॉ० सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने अपने भावों को इस तरह व्यक्त किया है— 'राष्ट्रीयएकता' विविधताओं के बीच ऐसी स्थिति का नाम है जिसमें व्यक्ति अपने सभी देशवासियों के साथ एकजुटता का भाव अपनाते हुए राष्ट्र की रक्षा और विकास हेतु राष्ट्र के प्रति अपना सब कुछ बलिदान करने के लिए तत्पर हो जाता है। हमारी राष्ट्रीयएकता और अखण्डता की नींव खोखली नहीं है बल्कि वट वृक्ष की तरह अन्दर मीलों गहराई में फैली हुई है, जिन्हें सेंध लगाकर काटा नहीं जा सकता है। वह वैदिककाल से इस जमीन की तह में समाई हुई है। इस बारे में डॉ० वासुदेव शरण अग्रवाल ने कहा है— 'अंग्रेजी शासन काल में हमारी राष्ट्रीयएकता को गहरा आघात पहुँचा। 'फूट डालो और राज करो' की नीति के कारण हमारी एकता भंग हुई। अंग्रेज अधिकारियों के प्रयास और प्रोत्साहन से देश का विभाजन हुआ, भारत का अंग विच्छेदन करके एक पृथक् और स्वतंत्र राष्ट्र पाकिस्तान की स्थापना हुई। विभाजन के बाद भी भारत

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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri नवम अध्याय 299 एक विशाल देश है। यहाँ अब भी लोग विभिन्न भाषाएँ बोलते हैं। भिन्न-भिन्न धर्मों को मानते हैं और उनके रीति-रिवाज भी अलग-अलग हैं। ऐसी विभिन्नता वाले देश को एकता के सूत्र में मजबूती से बाँधना एक महत्त्वपूर्ण समस्या है। जहाँ विभिन्नता पाई जाती है वहाँ पर मत-वैभिन्न की सम्भावना हमेशा बनी रहती है। यथार्थ स्थिति से अवगत व्यक्ति इसको सूक्ष्म दृष्टि से देखने के बाद ही विवेचन करता है। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ० राजेन्द्र प्रसाद का मत इस प्रकार है— "सांस्कृतिक अथवा सामूहिक चेतना ही हमारे देश का प्राण है। इसी नैतिक चेतना के सूत्र में हमारे नगर और ग्राम, हमारे प्रदेश और सम्प्रदाय, हमारे विभिन्न वर्ग और जातियाँ आपस में बँधी हुई हैं। जहाँ उनमें और सब तरह की विभिन्नतायें हैं, वहीं उन सबमें एक एकता भी विद्यमान है।" यह एकता एक स्थायी भावना है जो कि इस पावन भूमि पर जन्म लेते ही मानव के मन में समाहित हो जाती है। बचपन से माँ की गोद में बैठकर सुनी गई भगत सिंह और चन्द्रशेखर आजाद की बलिदान-गाथाओं से बच्चों के मन-मानस को एक नया स्वरूप देश के प्रति मिलता है, जो अमिट होता है। यही चिर स्थायी रूप उनके लिए आदर्श बन जाता है। इस बारे में प्रसिद्ध राजनीतिशास्त्रज्ञ रजनी कोठारी का मत इस प्रकार है— "भारत जैसे विशाल देश में जहाँ इतने विविध प्रकार के लोग रहते हैं, एकता की स्थापना इसी से हो सकती है कि सब तत्त्वों को राजनीतिक सत्ता व अधिकार में बाँट दिया जाये और सबको साथ लेकर चला जाये। इसके लिए आवश्यक है कि समाज के सब वर्गों का राजनीतिक व्यवस्था में प्रवेश हो। राजनीति की इस रचनात्मक भूमिका से ही एकीकरण की प्रवृत्तियों को बल मिलता है।"¹ यदि वैदिक काल में राष्ट्र और राष्ट्रीयता की भावना प्रबल थी, जिससे विविधताओं के होते हुए भी प्राचीन भारतीय संस्कृति ने भौगोलिक एकीकरण और समुच्चय की भावना को बचाये रखा। इसी बात को डॉ० वासुदेवशरण अग्रवाल ने निम्न शब्दों में व्यक्त किया है— "यहाँ की कोटि-कोटि जनता के मन में भारत की भौगोलिक एकता का गहरा संस्कार था। हमारी संस्कृति विविधताओं को स्वीकार करती है, किन्तु एकत्व की प्राप्ति उसकी निजी विशेषता है।" १. कोठारी- भारत में राजनीति, पृ० ३४७ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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300 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता आज विश्व के पटल पर जो भारत का नाम उभरता ही जा रहा है, उसके पीछे कोई राजनीतिक उपलब्धियों का इतिहास नहीं है बल्कि वह राष्ट्रवासियों में रहने वाला राष्ट्र के प्रति प्रेम है जो उन्हें हर क्षेत्र में, चाहे वह विज्ञान हो, प्रौद्योगिकी, कला या शिक्षा कोई भी क्षेत्र क्यों न हो, सभी अपने देश के नाम को उसमें ऊँचा देखने की इच्छा रखते हैं। इसके लिए सतत् प्रयत्नशील रहेंगे कि देश का नाम ऊँचाइयों तक पहुँचे। यही राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता का एक नया स्वरूप है। देश की राष्ट्रीयएकता को हम अपने देश के सन्दर्भ में इन शब्दों में भी व्यक्त कर सकते हैं- " राष्ट्रीय एकता का अर्थ है भारत के विभिन्न प्रदेशों, जातियों, वर्गों, भाषाओं, धर्मों आदि की बहुरंगी विविधता के बीच एकता की व्यापक धारणा, जो क्षुद्र सीमित स्वार्थों की उपेक्षा कर देश के विभिन्न प्रदेशों पर अखिल राष्ट्रीय दृष्टिकोण से विचार और व्यवहार की प्रेरणा दे।" इसी राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता पर सम्पूर्ण राष्ट्र को गर्व है कि हमारा एक संविधान, एक राष्ट्रीय ध्वज और एक ही राष्ट्रीय सम्मान सदैव अक्षुण्ण रहेंगे। ३. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के सम्बन्ध में प्राचीन एवम् आधुनिक विचारधारा की तुलना- राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता का हर युग में उतना ही महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है जितना कि यह आज है। एकता से तात्पर्य वैचारिक एकता, मतैक्यता और उनके कार्यों में भी एकता का पाया जाना, माना जा सकता है। इस बारे में ऋग्वेद में वर्णित है- सं ग॑च्छध्वं॒ सं व॑दध्वं॒ सं वो॒ मना॑ंसि जानताम्। दे॒वा भा॒गं यथा॒ पूर्वे॑ सञ्जाना॒ना उ॒पास॑ते॥१ अर्थात् सभी लोग साथ-साथ चलें, साथ बोलें, तुम सभी का मन ऐकमत्ययुक्त हो जाय, जिस प्रकार पुरातन देवता ऐकमत्य के साथ अपना भाग लेने के लिए बैठते हैं। स॒मा॒नी व॒ आकू॑तिः समा॒ना हृदया॑नि वः। स॒मा॒नम॑स्तु वो॒ मनो॒ यथा॑ वः॒ सुस॒हास॑ति॥२ १. ऋग्वेद १०/१९१/२ २. अथर्ववेद ६/६४/४

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नवम अध्याय 301 अर्थात् प्रतिज्ञा तुम लोगों की समान हो, तुम लोगों का हृदय एक हो, तुम लोगों का मन एक हो जिससे तुम लोगों में आनन्दपूर्वक ऐकमत्य रहे। इस एकता के बारे में ऋग्वेद में भी अनुभव किया गया था। इस एकता में एक अपूर्व शक्ति होती है जिससे कि शेष शक्तियों को पराजित किया जा सकता है। 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की अवधारणा का भाव यहाँ पर अनुभव किया जा सकता है। आज भी राजनैतिकज्ञों, विचारकों, देशभक्तों का यही विचार है कि सम्पूर्ण राष्ट्र में मतभेद न हो। राष्ट्र के प्रत्येक विषय पर वे ऐकमत्य हों, उनमें आत्मिक समानता हो, एक दूसरे की भावनाओं के प्रति सम्मान हो। चाहे सामाजिक अवसर हो या कि राजनैतिक अवसर, सभी लोग साथ बैठें और फिर विचार करें। उनमें एक सुदृढ़ संगठन की भावना विद्यमान हो। प्राचीन काल में जिस ऐकमत्य का विवेचन होता आ रहा है उसे आधुनिक काल में डॉ० वासुदेव शरण अग्रवाल ने इन शब्दों में व्यक्त किया है— "यहाँ की कोटि-कोटि जनता के मन में भारत की भौगोलिक एकता का संस्कार था। हमारी संस्कृति विविधताओं को स्वीकार करती है, किन्तु एकत्व की प्राप्ति उसकी निजी विशेषता है।" राष्ट्र में अनेक श्रेणियों के लोग रहते हैं जिनमें स्वार्थ या अज्ञान के कारण द्वेष उत्पन्न हो सकता है और उनकी यह भावना राष्ट्र के लिए शुभ और कल्याणकारी बिल्कुल भी नहीं मानी जा सकती है। व्यक्तियों में सामूहिक उन्नति की भावना होनी चाहिए ताकि वे राष्ट्र के लिए योगदान दे सकें। अ॒सं॒बा॒धं ब॑ध्य॒तो मान॑वानां॒ यस्या॑ उ॒द्वतः॑ प्र॒वत॑: स॒मं ब॒हु। नाना॑वी॒र्या॒ ओष॑धी॒र्या बिभ॑र्ति पृथि॒वी न॑: प्रथ॒तां राध्य॑तां नः॥१ अर्थात् जिस राष्ट्र में मननशील विद्वानों के मध्य उच्चता या निम्नता के भाव रहने पर भी आपस में समता, एकता एवं मैत्री भाव विद्यमान रहता है, उस मातृभूमि या राष्ट्र में पृथिवी अपने पर्यावरण में बलदायक, रोगानाशक वनस्पतियों की उत्पत्ति करके हमें स्वस्थ रहने में सहायता करती है। हमारे यश व कीर्ति के साधनों में विस्तार करती है। प्राचीन काल की तरह आज भी राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के सन्दर्भ में मानव में मानव के प्रति भ्रातृत्व की भावना होनी चाहिए। समाज में वर्ग विभेद सदियों से चला आ रहा है लेकिन उस वर्ग भेद को मानवीय सम्बन्धों में कहीं भी नहीं आना चाहिए। सभी मानव है और पंचतत्वों के समावेश से ही सभी का निर्माण हुआ है। १. अथर्ववेद १२/१/२

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302 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अतः उनमें समता का भाव रहना चाहिए। राष्ट्र के सभी नागरिक आपस में भाई-बहन हैं, चाहे जिस वर्ग या जाति के क्यों न हों। जीवन मूल्यों या नैतिक मूल्यों में काल के अनुसार परिवर्तन हो सकता है लेकिन राष्ट्रीय मूल्य और मानवीय मूल्य सभी कालों में समान ही रहते हैं और भविष्य में भी रहेंगे। नागरिकों में एक प्रकार की उदात्त भावना उसी दशा में संभव है जबकि प्रत्येक व्यक्ति आपस में एक दूसरे को एक ही पथ का पथगामी समझे क्योंकि सभी का एक उद्देश्य है राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता को कायम रखना और उसके लिए राष्ट्र को समृद्धशाली एवम् प्रगतिशील बनाना होगा। आत्मनिर्भर राष्ट्र जो अपने निवासियों का भरण-पोषण स्वयं कर सके, उससे अच्छी और क्या बात हो सकती है। ते अज्येष्ठा अकनिष्ठास उद्भिदोऽमध्यमासो महसा वि वावृधुः। सुजातासो जनुषा पृश्निमातरो दिवो मर्या आ नो अच्छा जिगातन॥१ अर्थात् राष्ट्रभक्तों में किसी भी प्रकार की परस्पर ज्येष्ठता या कनिष्ठता की भावना का अभ्युदय नहीं होना चाहिये। सामान्यतया प्रयत्नशील रहते हुए राष्ट्र की एकता और उन्नति की दिशा में अग्रसर होते रहना चाहिए। ऐसे विचारशील मानवों से ही राष्ट्र उत्तम फल की आशा कर सकता है। सामूहिक हित की भावना से युक्त राष्ट्र सदा ही स्थायी एवं दृढ़ दुर्ग के समान सुदृढ़ रहता है। ईश्वर से यही प्रार्थना की गई है कि जनमानस में यह भावना अधिक से अधिक पाई जाती हो तो देश का हित या कल्याण शीघ्र हो सकता है। इसे यदि आधुनिक दृष्टिकोण से देखा जाय तो इसमें कहीं भी परिवर्तन नहीं हुआ है। राष्ट्र का हित सदैव नागरिकों के द्वारा ही संभव होता है। समाज में सद्भावना को बनाये रखना, ऊँच और नीच का भाव मन में न आने देने से ही व्यक्ति व राष्ट्र का समुचित विकास होता है। इन परिस्थितियों या आवश्यकताओं में कभी भी परिवर्तन नहीं होता है। राष्ट्रीय एकता और अखण्डता को कायम करने वाले तत्त्व हैं जिनका मूल्य सभी कालों में समान रहा है। मातृभूमि हर वर्ग के व्यक्ति के लिए अनाज, फल, फूल, जल और विद्युत समान रूप से उपजाती है। उसकी दृष्टि में कोई भी भेदभाव नहीं होता है। समभाव और समान स्तर का जीवन सभी जियें, तभी उनमें ऊँच और नीच की भावना का समावेश नहीं रहेगा। यह सब गुण उतने ही आवश्यक हैं जितने की रात्रि और दिन का अस्तित्व। १. अथर्ववेद ५/५९/६ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri नवम अध्याय 303 ४. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के साधक एवं बाधक तत्त्व : किसी भी राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता उसके दृढ़ अस्तित्व के लिए आवश्यक तत्त्व हैं। राष्ट्रीय एकता, एक राष्ट्र में निवास कर रहे लोगों के हृदय की वह एकता है जो एक बार बनने के बाद कभी खण्डित नहीं होती। यह भावना ऐतिहासिक क्रम में पृथक् अस्तित्व की उस चेतना का प्रतीक है जो सामान्य आदतों, परम्परागत रीति- रिवाजों, स्मृतियों, आकांक्षाओं, अवर्णनीय सांस्कृतिक समस्याओं तथा हितों पर आधारित है। भारत एक राष्ट्र है जबकि उसमें अनेक भाषाएँ, अनेक धर्म, अनेक प्रकार के रीति-रिवाज पाये जाते हैं और उसमें भौगोलिक एकता भी नहीं है। एक ओर थार का मरुस्थल है तो दूसरी ओर कश्मीर की घाटी है। जातीय विभिन्नता भी यहाँ विद्यमान है। इन्हीं कारणों से कतिपय विद्वानों का मत है कि भारत एक राष्ट्र है ही नहीं, यह तो अनेक राज्यों का एक संघ है। भारत की इस विभिन्नता में भी एकता पाई जाती है। हम सांस्कृतिक दृष्टि से एक हैं, धार्मिक सहिष्णुता ही हमारी एकता और अखण्डता का आधार है। समस्त निवासी सदा से उस देश के प्रति ऐसी अनन्य भक्ति, विशेष प्रकार के प्रेम और परस्पर विशिष्ट प्रकार की प्रगाढ़ एकता का अनुभव करते रहे हैं और यही अनुभव सम्पूर्ण विश्व के समक्ष राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करता है। इस राष्ट्रीयएकता और अखण्डता को स्थायी बनाये रखने में कुछ घटक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं- १. संस्कृति :- भारतीय संस्कृति में ऐसा गुण है कि उसने मानव में सदैव मानवता का गुण समाहित किया है। हमारे वैदिक साहित्य, काव्य, रामायण और श्रीमद्भगवद्गीता, सभी ने भारतीयों के मन-मस्तिष्क में नैतिक, आध्यात्मिक और सदाचार का ऐसा समावेश किया है कि उसको वसुधैव कुटुम्बकम् की अवधारणा सदैव साकार होती दृष्टिगोचर होती है। सम्पूर्ण भारत में हम कहीं भी रहें- वेद, पुराण, उपनिषद्, रामायण और गीता, सभी भाषाओं में उपलब्ध हैं। उनके आदर्शों के अनुयायी देश भर में निवास करते हैं। यह संस्कृति हमें एकता के सूत्र में बाँधे रखती है। २. संविधान में निष्ठा :- स्वतंत्रता के बाद हमारे संविधान का निर्माण किया गया जिसमें भारत के सभी वर्गों के लोगों का प्रतिनिधित्व था। देश ने सभी लोगों को आत्मसात कर लिया था। जो अल्पसंख्यक थे, शरणार्थी थे या विदेशी थे, उनके वर्ग के अनुसार ही उन्हें प्रतिनिधित्व प्रदान किया गया। सबको धर्म की स्वतंत्रता CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 304 वैदिक वाङ्गमय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता प्रदान की गई। अपने लिए व्यवसाय के चुनाव की पूर्ण स्वतंत्रता दी गई। सभी धर्मों को सम्मान की दृष्टि से देखा गया। राष्ट्र में कहीं भी निवास करने की एवं सम्पत्ति अर्जित करने की स्वतंत्रता प्रदान की गई। ऐसे संविधान की छाया में जीवन व्यतीत करने वालों में वैमनस्यता जैसी भावना आने का प्रश्न ही कहाँ उठता है? ३. धर्मनिरपेक्षता :- हमारा राष्ट्र एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है और ऐसे राष्ट्र में धर्म के आधार पर कोई भी भेदभाव नहीं किया जा सकता। हम जब सभी धर्म वालों को सम्मान की दृष्टि से देखेंगे तो आपस में प्रेम और सद्भाव में वृद्धि अवश्य ही होगी। सभी धर्मों के लोग अपने पूजा स्थलों के निर्माण, पूजा पद्धति अपनाने और अपने धार्मिक उत्सवों को पूर्ण करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं। एक हिन्दू मुसलमान को ईद पर बधाई देता है तो मुसलमान दीपावली और होली पर प्रेम से सम्मिलित होते हैं। जहाँ इतने विशाल हृदय के लोग हों, वहाँ एकता पर प्रश्नचिह्न कहाँ लगाया जाये? ४. लोकतांत्रिक व्यवस्था :- स्वतंत्रता के बाद देश में संघात्मक लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनाया गया। इसमें देश में व्याप्त विविधता का पूर्ण रूप से सम्मान किया गया है। सभी वर्गों को अपनी सरकार चयन का अधिकार प्रदान किया गया। शासन में उनकी अपनी भागीदारी से उनमें देश के प्रति निष्ठा में वृद्धि होती है। अपनी बात कहने का अधिकार उन्हें संविधान से प्राप्त है। सभी राज्य अपने-अपने कार्यों के लिए स्वतंत्र है। इससे देशवासियों का अपने राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता के प्रति विश्वास और निष्ठा में वृद्धि ही होती है। ५. अनेकता में एकता :- भारत एक विशाल देश है, उसमें अनेकता होना स्वाभाविक है। इसके बाद भी समग्र रूप से दृष्टिपात किया जाय तो इस अनेकता में ही एकता का सूत्र बँधा हुआ है। सदियों से यहाँ विभिन्न धर्म हैं लेकिन सबमें एक दूसरे के प्रति सम्मान है। सामाजिक व्यवस्थाओं में खान-पान में प्रादेशिक रूप में विभिन्नता है लेकिन दक्षिणवर्ती भारतीय व्यवस्थाएँ उत्तर भारत में लोकप्रिय हैं। सम्पूर्ण राष्ट्र की भौगोलिक स्थितियाँ भिन्न-भिन्न हैं, फिर भी प्राचीन काल से ही यह राष्ट्र एकता के सूत्र में बँधा हुआ है। उन एकता और अखण्डता की गहरी जड़ों को खोदने का प्रयास व्यर्थ ही कहा जायेगा। ६. स्वतंत्रता संग्राम :- भारत की आजादी के लिए जो महासंग्राम लड़ा गया, तब इस पर शहीद होने वाले वीर हिन्दू, मुस्लिम, सिख, पारसी, जैन और बौद्ध सभी लोग थे। उस महायज्ञ में सबने अपने-अपने प्राणों की आहुति दी थी। अब स्वतंत्र भारत की खुली हवा में हमने सांस ली हैं। कोई नहीं भूलता हैं उन बलिदानों CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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नवम अध्याय 305 को। भगत सिंह और चन्द्रशेखर आजाद की बलिदान-गाथा आज भी नवजवानों को एक स्वर में 'जय हिन्द' और 'भारत माता की जयकार' लगाने के लिए पर्याप्त है। उनके पावन बलिदान की कहानी और त्याग की गाथा का सम्मान हम अपने राष्ट्र की एकता और अखण्डता की पावन भावना से ही कर सकते हैं। यह सभी तत्त्व है जिससे लाखों विभिन्नताओं के बाद भी यदि देश पर संकट आता है, तो पूरा राष्ट्र एक स्वर में उस संकट का जवाब देने के लिए तैयार रहता है। पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक सिर्फ एक भारत अखण्ड राष्ट्र के रूप में स्थायी राष्ट्र है। राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के बाधक तत्त्व- भारत एक ऐसा राष्ट्र है जहाँ विभिन्नता में एकता पाई जाती है, फिर भी यह विभिन्नता कहीं-कहीं अपना संकुचित दृष्टिकोण इस तरह से अपनाने लगती है कि देश में विभिन्न दृष्टिकोण आपस में ही संघर्ष करने लगते हैं और जब ये विघटनकारी तत्त्व पनपने लगते हैं तो देश की राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के लिए खतरा पैदा हो जाता है। ये कारण निम्नलिखित हैं :- १. जाति :- हमारे देश में विभिन्न धर्मों के साथ विभिन्न जातियाँ निवास करती हैं जिनमें कुछ उच्च और कुछ निम्न कहलाती हैं। सदियों से उच्च जातियों ने निम्न जातियों का शोषण किया है। सिर्फ हिन्दू ही नहीं, अपितु मुसलमान, सिख और ईसाई भी अनेक जातियों में बँटे हुए हैं। स्वतंत्रता के बाद संविधान द्वारा सबको समान अधिकार देने के बाद भी उच्च जातियों ने अपना श्रेष्ठत्व नहीं छोड़ा। दलितों और निम्न जातियों में भी चेतना अब पहले से बढ़ गई है। परिणामस्वरूप जातिगत राजनीतिक दलों का भी निर्माण होने लगा। इससे जातीय तनावों में वृद्धि हो गई। जातिभेद संकीर्णता के द्योतक है और जातियों के मध्य द्वेष और वैमनस्य बढ़ाते हैं। यह स्थितियाँ राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता में बाधक सिद्ध होती हैं। २. साम्प्रदायिकता - हमारे विद्वानों, धर्मगुरुओं और दार्शनिकों ने एक ही ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार किया है, चाहे वे ईश्वर कहें, खुदा या ईशु कहें। किसी ने भी कहीं भी दूसरे धर्म के प्रति विद्वेष रखने की बात स्वीकार नहीं की है। साम्प्रदायिकता धर्म का संकुचित दृष्टिकोण है। संसार में विविध धर्म के मूलभूत सिद्धान्तों को सभी ने स्वीकार किया है, यथा- प्रेम, सेवा, परोपकार, सच्चाई, समता, नैतिकता, अहिंसा और पवित्रता आदि सभी धर्मों में मान्य है। सच्चा धर्म कभी एक दूसरे से घृणा करना या वैर करना नहीं सिखाता, लेकिन धर्म के नाम

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