वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 321, कुल 353 में से
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अष्टम अध्याय 293 धन के आधार पर ऊँच-नीच की भावना आ सकती है जो कि राष्ट्र के हित में नहीं होगी। मातृभूमि के प्रति त्याग, उत्सर्ग और समग्र का हित चाहने की भावना रखने वाला ही सच्चे अर्थों में मातृभूमि का भक्त कहा जा सकता है। ऐसे व्यक्ति ही मातृभूमि के लिए गौरव का विषय होते हैं- यां रक्षन्त्यस्वप्ना विश्वदानीं देवा भूमिं पृथिवीमप्रमादम्। सा नो मधु प्रियं दुधमथो उक्षतु वर्चस्व॥ अर्थात् वे राष्ट्रभक्त या राष्ट्रपुत्र जिनमें आलस्य, निद्रा और तन्द्रा का अभाव होता है और वे कुशल, वीर एवं संयमी व्यक्ति अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए सदैव ही सजग रहते हैं जो अपने राष्ट्र की सुख एवं समृद्धि के लिए सदैव तत्पर रहते हैं तथा राष्ट्र की रक्षा के प्रति सदैव सावधान रहते हैं। वे राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता की रक्षा में सदैव सहायक होते हैं। अ॒सं॒बा॒धं ब॑ध्य॒तो मानु॑वानां॒ यस्या॑ उ॒द्वतः॑ प्र॒वत॑: स॒मं बहु॑। नाना॑वी॒र्या ओष॑धी॒र्या बिभ॑र्ति पृथि॒वी न॑: प्रथ॒तां राध्य॑तां नः॥१ अर्थात् जिस विशाल राष्ट्र में, मातृभूमि की गोद में, मननशील विद्वानों के मध्य भी उच्चता एवं भिन्नता का भाव पाये जाने पर भी उसमें समता और मतैक्य पाया जाता है और जो अपनी मातृभूमि या कर्मभूमि के लिए, जिसने हमारे विकास एवं निरोग शरीर हेतु रोगनाशक, बलदायक वनस्पतियों को अपने गर्भ से प्रकट करके हमें बल प्रदान किया है वह मातृभूमि हमारे यश एवं कीर्ति के साधनों का विस्तार करें। जहाँ नागरिकों में ऐसे सुन्दर विचार एवं भावनाओं का समावेश वैदिक साहित्य से प्राप्त हो रहा है जो कि इस राष्ट्र की संस्कृति और जीवन का आधार है, वहाँ पर राष्ट्र के प्रति सुन्दर विचार एवं भावों का समाहित होना स्वाभाविक ही है। जहाँ प्रत्येक धर्म के प्रति सम्मान और श्रद्धा व्याप्त हो, जहाँ हर मस्तक, चाहे वह मस्जिद हो, गुरुद्वारा, चर्च या मन्दिर हो, झुकता हो, वहाँ की एकता पर प्रश्नचिह्न लगने का प्रश्न ही नहीं होता है। सभी धर्मों और संस्कृतियों को अपने में समाहित करके एक नया स्वरूप प्रदान करना ही भारतीय संस्कृति की सदियों से विशेषता रही है। यही नहीं बल्कि दूसरे देशों तक अपनी संस्कृति का सम्मान दिलाने वाले राष्ट्रजनों पर यह राष्ट्र गर्व करता है। अपने राष्ट्रीयगौरव को सम्पूर्ण विश्व में बढ़ाने वाले राष्ट्रपुत्रों का अभाव नहीं है।
१. अथर्ववेद १२/१/२
CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar