वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 320, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 292 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता किया गया है, लेकिन यह विचार किया जा सकता है कि इस क्षेत्र में किया गया वर्णन या तो इस विषय के लुप्त साहित्य में वर्णित होगा अथवा उसको सभी कर्मों के साथ समाहित करके प्रस्तुत किया गया होगा। इस प्रकार से यदि देखा जाय तो इन ग्रन्थों का राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में महत्त्वपूर्ण योगदान है। ६. राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता को गृह्यसूत्र एवं धर्मसूत्र का प्रदेय- राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता को गृह्यादि एवम् धर्मसूत्र के योगदान को भी इतना ही महत्त्व प्रदान किया जा सकता है, जितना कि शेष ग्रन्थों को। इन सूत्र ग्रन्थों के प्रादुर्भाव का आधार हमारे चारों वेद ही हैं। इन ग्रन्थों में वर्णित राजा के कर्तव्यों एवं गुणों से यह प्रदर्शित होता है कि सदा सत्य का पालन करने वाला, न्यायप्रिय, विधि का सम्मान'रखने वाला तथा वेद संहिता का पालन करने वाला राजा सबसे अधिक योग्य एवं कुशल राष्ट्र संचालक कहा जा सकता है। ऐसे राजा के लिए समाज में, राष्ट्र की प्रजा में, सदैव श्रद्धा और निष्ठा का भाव बना रहता है। जहाँ निष्ठावान प्रजा हो, धर्माचरण करने वाली प्रजा हो, राष्ट्र की आचार संहिता का पालन करने वाली प्रजा हो, तो उस राष्ट्र की एकता और अखण्डता पर सन्देह किया ही नहीं जा सकता है। राष्ट्र के लिए राजा और पुरोहित सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति होते हैं। राजा को सही दिशा-निर्देश देने का कार्य पुरोहित का ही होता है। राजा एवं पुरोहित के मध्य मतैक्य तथा वैचारिक अनुकूलता ही राष्ट्र की समृद्धि में पूर्ण सहायक सिद्ध होती है। एक व्यक्ति सम्पूर्ण राष्ट्र के बारे में सही विचार कर सकता है, यह पूरी तरह संभव नहीं है। और यदि यही कार्य सभा और समिति के परामर्श के अनुसार राजा और पुरोहित करते हैं तो वह राष्ट्रहित में और धर्म के अनुसार होता है। इसमें राजा के निरंकुश होने के अवसर समाप्त हो जाते हैं। राष्ट्र के प्रति सजग राजा ही सही अर्थों में पिता की भूमिका का निर्वाह करता है। यह गुण इस राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के लिए सार्थक सिद्ध होता है। राजा की तरह ही प्रजा का भी राजा एवं राष्ट्र के प्रति कुछ दायित्व होते हैं, जिनको पालन करकें ही वह राष्ट्र की सुख एवम् समृद्धि में अपना पूर्ण योगदान दे सकती है। राष्ट्र में अनेक श्रेणियों के लोग होते हैं। सभी ज्ञानपूर्ण एवं दुर्गुणों से रहित हों ऐसा तो संभव नहीं होता है। सम्पूर्ण राष्ट्र में विभिन्न श्रेणियों के व्यक्ति होंगे, उनमें स्वार्थ या अज्ञानवश विद्वेष की भावना का भी विकास हो सकता है। उनमें विद्या या CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar