वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 319, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri अष्टम अध्याय 291 को प्रदर्शित करता है कि जिन बातों का ज्ञान उसे अपने शिक्षाकाल में कराया गया है, उनका परिपालन अब गृहस्थ जीवन में अवश्य ही करना है और इसी के परिप्रेक्ष्य में वह इस प्रकार अपने शिष्य को उपदेश देता है :- सत्य बोलो, धर्माचरण करो, स्वाध्याय में प्रमाद मत करो। गृहस्थाश्रम में प्रवेश कर वंश परम्परा को आगे बढ़ाओ। सत्य, धर्म, कुलक्षेत्र, समृद्धि, देव-पितृकार्यों में कभी प्रमाद न करो। माता, पिता, आचार्य और अतिथि को देवता के समान समझो। गुरुजनों के निर्दोष आचरण का ही अनुकरण करो, अन्यों का नहीं। जो कल्याणकारी ब्राह्मण हैं, उनके निकट बैठकर उनमें विश्वास करो। दान श्रद्धा, भक्ति, लज्जा, भय और अनुबन्ध, सभी प्रकार से देना चाहिये। अपने कर्म और आचरण के विषय में किसी प्रकार का सन्देह होने पर विचारशील, संतुलित, धर्मात्मा व्यक्तियों के व्यवहार से मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहिये। यही वेदों का रहस्य है। यही अनुशासन है। इसी की उपासना करनी चाहिये।१ गृह्यसूत्रों एवं धर्मसूत्रों के आचार दर्शन से प्राप्त होता है- आदर्श समाज और उसके अनुशासित नागरिक। उनसे ही बनता है- सम्पूर्ण राष्ट्र। जिनके लिये संस्कृति से एक आदर्श परिकल्पना उत्पन्न हो, वहाँ पर राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता को सदैव बल ही प्राप्त होगा। वैदिकवाङ्मय में प्राप्त शिक्षाव्यवस्था भी आदर्श शिक्षादर्शन पर आधारित थी। शिक्षा प्रणाली का आधार स्मृति, ज्ञान और बोध तीनों ही थे। शिक्षा प्रयोगों के द्वारा प्रमाणित करके ही दी जाती थी और यही आज्ञा दी जाती थी कि वह जीवन में इन शिक्षाओं को पूरी तरह ग्रहण करके समाहित कर लेगा। गुरु योग्य शिष्य को ही शिक्षा देना स्वीकारता था ताकि उसकी दी हुई शिक्षा सार्थक हो सके। शिक्षा के बारे में इस प्रकार उल्लिखित है- यमेव विद्याः शुचि म प्रमत्तः मेधाविनं ब्रह्मचर्योपपन्न। गुरु उसी शिष्य को अपना ज्ञान प्रदान करें जो पवित्र मेधा, अप्रमादी, ब्रह्मचारी और ज्ञान का संरक्षक हो। गुरु द्वारा शिष्य से सदैव यही अपेक्षा की जाती थी कि वह अपने भावी जीवन के सभी कर्तव्यों एवं दायित्वों को धर्मपूर्वक निर्वाह करेगा और सत्य के मार्ग पर चलते हुए ही मोक्ष की प्राप्ति करेगा। गृह्यसूत्रों एवं धर्मसूत्रों में प्राप्त अर्थदर्शन भी उतना ही महत्त्वपूर्ण स्थान रखता था। वैसे तो इन सूत्रों में जीवन के संस्कारों, क्रियाओं और कर्तव्यों के बारे में वर्णन १. तैत्तिरीय उपनिषद् ७/११ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar