वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 318, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 290 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता ५. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में गृह्यसूत्र एवं धर्मसूत्र के आचारदर्शन, शिक्षादर्शन एवं अर्थदर्शन का अनुशीलन- मानवजीवन में आचार और विचार, दोनों की ही महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। धर्म से ही आचार का प्रादुर्भाव होता है। इन आचारों के लिये कोई भी अन्य विकल्प नहीं है। वसिष्ठधर्मसूत्र में आचार पर बहुत अधिक बल दिया गया है— आचार: परमोधर्मः सर्वेषामिति निश्चयः। हीनाचार परीतात्मा प्रेत्य चेह च नश्यति॥१ अर्थात् आचार ही जीवन का सबके बड़ा धर्म है, इस बात को सर्वसम्मति से विद्वानों ने स्वीकार किया है। आचारहीन व्यक्ति उसी तरह नष्ट हो जाता है जिस तरह प्रेतात्मा आदि अपना कोई अस्तित्व नहीं रखती। वसिष्ठ ने अपने मतों का प्रतिपादन थोड़े में, परन्तु बड़ी ही स्पष्ट भाषा में किया है। मौलिक विचार और प्रौढ़ विवेचना की छाप सम्पूर्ण ग्रन्थ में स्पष्ट परिलक्षित है। अन्य स्मृतिकारों के समान वसिष्ठ का सम्पूर्ण आग्रह 'आचार' ही है। आचार ही व्यक्ति तथा समाज को मान्यता, दीर्घ जीवन और सत्कार प्राप्त कराता है। शास्त्र का अभ्यास, विद्या का अर्जन तथा विज्ञान का उपार्जन अवश्य ही उपादेय वस्तु है, परन्तु व्यवहार में लाये बिना, अर्थात् आचार के रूप में परिणत किये बिना, वह सब केवल भाव मात्र हैं— उपयोग से हीन होने के कारण केवल बोझ मात्र बन जाता है। आचार से हीन व्यक्ति के लिए यह लोक भी नष्ट है और परलोक भी असिद्ध ही है। आचाररहित व्यक्ति में समस्त यज्ञ तथा षडङ्गों से युक्त वेद भी उस प्रकार प्रीति उत्पन्न नहीं करते जिस प्रकार अन्धे के हृदय में सुन्दरी भार्या की उपस्थिति :- आचारहीनस्य तु ब्राह्मणस्य वेदाः षडङ्गास्त्वखिलाः सयज्ञाः। कां प्रीतिमुत्पादयितुं समर्था अन्धस्य दारा इव दर्शनीयाः॥२ इन आचार-विचारों की शुद्धि और उन पर आचरण का उपदेश ब्रह्मचर्य आश्रम के काल में गुरु द्वारा शिष्यों को प्रदान किया जाता था क्योंकि जीवन समर में उनकी प्रवृत्ति इसी के बाद ही होती थी। वे अपने पूर्ण दायित्वों से परिचित होकर, सम्पूर्ण शिक्षाओं को ग्रहण करके ही सही अर्थों में दायित्वों के क्षेत्र में तब आते थे जबकि वे गृहस्थाश्रम में प्रवेश करते थे। छात्रों को दीक्षान्त अवसर पर प्रदत्त उपदेश इस बात १. वसिष्ठ धर्मसूत्र ६/१ २. वसिष्ठ धर्मसूत्र ६/४ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar