भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 317

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri अष्टम अध्याय 289 वसिष्ठ धर्मसूत्र का अन्तिम अध्याय समग्र धर्मशास्त्र की कुञ्जी है— धर्म महिमा की प्रशस्ति है। भारतीय स्मृतिकारों ने स्वर में स्वर मिलाकर वसिष्ठ द्वारा यह घोषणा की है— धर्मं चरत माऽधर्मं सत्यं वदत माऽनृतम्। दीर्घं पश्यत मा ह्रस्वं परं पश्यत माऽपरम्॥१ अर्थात् 'धर्म का आचरण करो, अधर्म का आचरण मत करो, सत्य बोलो, झूठ मत बोलो, दीर्घ देखो, ह्रस्व मत देखो— अर्थात् किसी वस्तु के विषय में दूरदर्शी बनो। छोटी वस्तु को देखकर अपने विचारों को क्षुद्र, हीन और छोटा मत बनाओ। सदा श्रेष्ठ वस्तु को देखो। जीवन का लक्ष्य सदा ऊँचा बनाये रखो। वसिष्ठ की यह शिक्षा स्वर्णाक्षरों में लिखने योग्य है। इस तरह धर्म के आचरण द्वारा ही जीवन का ध्येय निश्चित कर दिया जाता है। जहाँ इस प्रकार का समाजदर्शन और धर्मदर्शन होगा वहाँ पर राष्ट्र के स्वरूप को निश्चित करने में अधिक समय नहीं लगता है। वसिष्ठ का जीवनदर्शन नितान्त उदात्त एवं कर्मनिष्ठ तथा पूर्णतया आध्यात्मिक है। वे हमें स्वस्थ, शिष्ट तथा संस्कृत भारतीय बनकर जीवन-यापन का उपदेश देते हैं तथा उस तृष्णा के परिहार की शिक्षा देते हैं जिसे दुर्बुद्धि कठिनता से छोड़ सकता है, जो व्यक्ति के जीर्ण होने पर भी स्वयं जीर्ण नहीं होता और जो प्राणान्तिक व्याधि है— या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः। याऽसौ प्राणान्तिको व्याधिस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम्॥२ धर्म के द्वारा ही व्यक्ति अपने जीवन के अन्तिम लक्ष्य तक पहुँच सकता है। जहाँ ब्रह्मचर्य आश्रम काल में ही मानव को धर्म के चारों ओर परिक्रमा का व्रत दिया जाता है, वहाँ अधर्म के बारे में व्यक्ति सोच ही नहीं सकता है। जहाँ राष्ट्रधर्म, पितृधर्म, पुत्रधर्म और पतिधर्म का पालन ही जीवन का अन्तिम लक्ष्य हो, तो वह इस धर्म से विलग वह कहाँ हो सकता है। यदि राष्ट्रीय एकता और अखण्डता के सन्दर्भ में इस पर विचार किया जाये तो जीवन के सभी धर्म का सबल पालन करने वाला मानव राष्ट्रधर्म से विमुख हो ही नहीं सकता है। जब वह प्रजाधर्म का पालन करके राष्ट्रधर्म की पूर्ति करता है, तो ऐसे नागरिकों पर राष्ट्र सदैव ही गर्व कर सकता है। १. वसिष्ठ धर्मसूत्र ३०/१ २. योगवासिष्ठ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar