भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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नवम अध्याय 305 को। भगत सिंह और चन्द्रशेखर आजाद की बलिदान-गाथा आज भी नवजवानों को एक स्वर में 'जय हिन्द' और 'भारत माता की जयकार' लगाने के लिए पर्याप्त है। उनके पावन बलिदान की कहानी और त्याग की गाथा का सम्मान हम अपने राष्ट्र की एकता और अखण्डता की पावन भावना से ही कर सकते हैं। यह सभी तत्त्व है जिससे लाखों विभिन्नताओं के बाद भी यदि देश पर संकट आता है, तो पूरा राष्ट्र एक स्वर में उस संकट का जवाब देने के लिए तैयार रहता है। पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक सिर्फ एक भारत अखण्ड राष्ट्र के रूप में स्थायी राष्ट्र है। राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के बाधक तत्त्व- भारत एक ऐसा राष्ट्र है जहाँ विभिन्नता में एकता पाई जाती है, फिर भी यह विभिन्नता कहीं-कहीं अपना संकुचित दृष्टिकोण इस तरह से अपनाने लगती है कि देश में विभिन्न दृष्टिकोण आपस में ही संघर्ष करने लगते हैं और जब ये विघटनकारी तत्त्व पनपने लगते हैं तो देश की राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के लिए खतरा पैदा हो जाता है। ये कारण निम्नलिखित हैं :- १. जाति :- हमारे देश में विभिन्न धर्मों के साथ विभिन्न जातियाँ निवास करती हैं जिनमें कुछ उच्च और कुछ निम्न कहलाती हैं। सदियों से उच्च जातियों ने निम्न जातियों का शोषण किया है। सिर्फ हिन्दू ही नहीं, अपितु मुसलमान, सिख और ईसाई भी अनेक जातियों में बँटे हुए हैं। स्वतंत्रता के बाद संविधान द्वारा सबको समान अधिकार देने के बाद भी उच्च जातियों ने अपना श्रेष्ठत्व नहीं छोड़ा। दलितों और निम्न जातियों में भी चेतना अब पहले से बढ़ गई है। परिणामस्वरूप जातिगत राजनीतिक दलों का भी निर्माण होने लगा। इससे जातीय तनावों में वृद्धि हो गई। जातिभेद संकीर्णता के द्योतक है और जातियों के मध्य द्वेष और वैमनस्य बढ़ाते हैं। यह स्थितियाँ राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता में बाधक सिद्ध होती हैं। २. साम्प्रदायिकता - हमारे विद्वानों, धर्मगुरुओं और दार्शनिकों ने एक ही ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार किया है, चाहे वे ईश्वर कहें, खुदा या ईशु कहें। किसी ने भी कहीं भी दूसरे धर्म के प्रति विद्वेष रखने की बात स्वीकार नहीं की है। साम्प्रदायिकता धर्म का संकुचित दृष्टिकोण है। संसार में विविध धर्म के मूलभूत सिद्धान्तों को सभी ने स्वीकार किया है, यथा- प्रेम, सेवा, परोपकार, सच्चाई, समता, नैतिकता, अहिंसा और पवित्रता आदि सभी धर्मों में मान्य है। सच्चा धर्म कभी एक दूसरे से घृणा करना या वैर करना नहीं सिखाता, लेकिन धर्म के नाम

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar