वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 324, कुल 353 में से
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296 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता यथार्थ-ज्ञान, समर्पण की भावना से युक्त नागरिक ही मातृभूमि, राष्ट्र अथवा देश को धारण अथवा पालन-पोषण करने में सक्षम होते हैं। वह मातृभूमि भी वर्तमान, भूत और भविष्य में सकल पदार्थों से अपने पुत्रों का पालन करने में सक्षम होती है, ऐसी मातृभूमि हमारी उन्नति के लिए अत्यन्त विस्तृत स्थान एवं अवसर प्रदान करती है। स॒त्यं बृ॒हदृ॒तमु॒ग्रं दी॒क्षा तपो॒ ब्रह्म॑ य॒ज्ञः पृ॑थि॒वीं धारयन्ति। सा नो॑ भू॒तस्य॒ भव्य॑स्य॒ पत्न्यु॒रुं लो॒कं पृ॑थि॒वी नः॑ कृणोतु॥१ इस मंत्र के द्वारा सरल स्वभाव, पराक्रमशीलता, दक्षता, तप, ब्रह्म या ज्ञान एवं यज्ञ रूप आत्मसमर्पण की भावना को मातृभूमि की उन्नति के लिए अनिवार्य बताया गया है। इन्हीं की सहायता से राष्ट्र में एक ऐसी सुव्यवस्था स्थापित हो सकती है जिसमें किसी भी प्रकार शत्रु द्वारा राष्ट्र की अखण्डता पर प्रहार करने का दुःसाहस करना सम्भव न हो। प्रत्येक राष्ट्रभक्त का कर्तव्य है कि इन नियमों का सम्यक् पालन करे। मंत्र के पूर्वार्द्ध में राष्ट्ररक्षा के अनिवार्य सिद्धान्तों का प्रतिपादन करके उत्तरार्द्ध में बतलाया गया है कि आदर्श नागरिक इन नियमों का पालन करता है। मातृभूमि से भी वह कुछ अपेक्षा रखता है कि उसे अपने भविष्य को संवारने का पूर्ण अवसर प्राप्त हो। वह जिस दिशा में जाना चाहेगा, उसे सम्यक् उन्नति करने के लिए द्वार खुले होंगे और इन इच्छाओं की पूर्ति होने पर नागरिक सभी दृष्टि से संतुष्ट हो जाता है और अपने राष्ट्र के प्रति पूर्णतया समर्पित रहता है। इस समर्पण की भावना का सन्देश वैदिक वाङ्ग्मय की ही देन है। यस्याः मानवानां मध्यतः बहु असम्बाधम्। जिस राष्ट्र या मातृभूमि के विभिन्न सम्प्रदायों में सहज भेद होते हुए निर्वैरभाव एवं सामूहिक उन्नति में परस्पर सौहार्द एवं सहयोग करने की भावना होती है, वही यथार्थ रूप से प्रगति कर सकता है। इस प्रकार का राष्ट्र वास्तव में यश और कीर्ति के साधनों का विस्तार कर सकता है। जनं॒ बिभ्र॑ती बहु॒धा विर्वाचसं॒ नाना॑धर्माणं पृथि॒वी यथौक॑सम्। स॒हस्रं॒ धारा॒ द्रवि॑णस्य मे दुहां ध्रु॒वेव॑ धे॒नुरन॑पस्फुरन्ती॥२ १. अथर्ववेद १२/१/१ २. अथर्ववेद १२/१/४५ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar