वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 329, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri
नवम अध्याय 301 अर्थात् प्रतिज्ञा तुम लोगों की समान हो, तुम लोगों का हृदय एक हो, तुम लोगों का मन एक हो जिससे तुम लोगों में आनन्दपूर्वक ऐकमत्य रहे। इस एकता के बारे में ऋग्वेद में भी अनुभव किया गया था। इस एकता में एक अपूर्व शक्ति होती है जिससे कि शेष शक्तियों को पराजित किया जा सकता है। 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की अवधारणा का भाव यहाँ पर अनुभव किया जा सकता है। आज भी राजनैतिकज्ञों, विचारकों, देशभक्तों का यही विचार है कि सम्पूर्ण राष्ट्र में मतभेद न हो। राष्ट्र के प्रत्येक विषय पर वे ऐकमत्य हों, उनमें आत्मिक समानता हो, एक दूसरे की भावनाओं के प्रति सम्मान हो। चाहे सामाजिक अवसर हो या कि राजनैतिक अवसर, सभी लोग साथ बैठें और फिर विचार करें। उनमें एक सुदृढ़ संगठन की भावना विद्यमान हो। प्राचीन काल में जिस ऐकमत्य का विवेचन होता आ रहा है उसे आधुनिक काल में डॉ० वासुदेव शरण अग्रवाल ने इन शब्दों में व्यक्त किया है— "यहाँ की कोटि-कोटि जनता के मन में भारत की भौगोलिक एकता का संस्कार था। हमारी संस्कृति विविधताओं को स्वीकार करती है, किन्तु एकत्व की प्राप्ति उसकी निजी विशेषता है।" राष्ट्र में अनेक श्रेणियों के लोग रहते हैं जिनमें स्वार्थ या अज्ञान के कारण द्वेष उत्पन्न हो सकता है और उनकी यह भावना राष्ट्र के लिए शुभ और कल्याणकारी बिल्कुल भी नहीं मानी जा सकती है। व्यक्तियों में सामूहिक उन्नति की भावना होनी चाहिए ताकि वे राष्ट्र के लिए योगदान दे सकें। अ॒सं॒बा॒धं ब॑ध्य॒तो मान॑वानां॒ यस्या॑ उ॒द्वतः॑ प्र॒वत॑: स॒मं ब॒हु। नाना॑वी॒र्या॒ ओष॑धी॒र्या बिभ॑र्ति पृथि॒वी न॑: प्रथ॒तां राध्य॑तां नः॥१ अर्थात् जिस राष्ट्र में मननशील विद्वानों के मध्य उच्चता या निम्नता के भाव रहने पर भी आपस में समता, एकता एवं मैत्री भाव विद्यमान रहता है, उस मातृभूमि या राष्ट्र में पृथिवी अपने पर्यावरण में बलदायक, रोगानाशक वनस्पतियों की उत्पत्ति करके हमें स्वस्थ रहने में सहायता करती है। हमारे यश व कीर्ति के साधनों में विस्तार करती है। प्राचीन काल की तरह आज भी राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के सन्दर्भ में मानव में मानव के प्रति भ्रातृत्व की भावना होनी चाहिए। समाज में वर्ग विभेद सदियों से चला आ रहा है लेकिन उस वर्ग भेद को मानवीय सम्बन्धों में कहीं भी नहीं आना चाहिए। सभी मानव है और पंचतत्वों के समावेश से ही सभी का निर्माण हुआ है। १. अथर्ववेद १२/१/२
CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar