वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 330, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri
302 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अतः उनमें समता का भाव रहना चाहिए। राष्ट्र के सभी नागरिक आपस में भाई-बहन हैं, चाहे जिस वर्ग या जाति के क्यों न हों। जीवन मूल्यों या नैतिक मूल्यों में काल के अनुसार परिवर्तन हो सकता है लेकिन राष्ट्रीय मूल्य और मानवीय मूल्य सभी कालों में समान ही रहते हैं और भविष्य में भी रहेंगे। नागरिकों में एक प्रकार की उदात्त भावना उसी दशा में संभव है जबकि प्रत्येक व्यक्ति आपस में एक दूसरे को एक ही पथ का पथगामी समझे क्योंकि सभी का एक उद्देश्य है राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता को कायम रखना और उसके लिए राष्ट्र को समृद्धशाली एवम् प्रगतिशील बनाना होगा। आत्मनिर्भर राष्ट्र जो अपने निवासियों का भरण-पोषण स्वयं कर सके, उससे अच्छी और क्या बात हो सकती है। ते अज्येष्ठा अकनिष्ठास उद्भिदोऽमध्यमासो महसा वि वावृधुः। सुजातासो जनुषा पृश्निमातरो दिवो मर्या आ नो अच्छा जिगातन॥१ अर्थात् राष्ट्रभक्तों में किसी भी प्रकार की परस्पर ज्येष्ठता या कनिष्ठता की भावना का अभ्युदय नहीं होना चाहिये। सामान्यतया प्रयत्नशील रहते हुए राष्ट्र की एकता और उन्नति की दिशा में अग्रसर होते रहना चाहिए। ऐसे विचारशील मानवों से ही राष्ट्र उत्तम फल की आशा कर सकता है। सामूहिक हित की भावना से युक्त राष्ट्र सदा ही स्थायी एवं दृढ़ दुर्ग के समान सुदृढ़ रहता है। ईश्वर से यही प्रार्थना की गई है कि जनमानस में यह भावना अधिक से अधिक पाई जाती हो तो देश का हित या कल्याण शीघ्र हो सकता है। इसे यदि आधुनिक दृष्टिकोण से देखा जाय तो इसमें कहीं भी परिवर्तन नहीं हुआ है। राष्ट्र का हित सदैव नागरिकों के द्वारा ही संभव होता है। समाज में सद्भावना को बनाये रखना, ऊँच और नीच का भाव मन में न आने देने से ही व्यक्ति व राष्ट्र का समुचित विकास होता है। इन परिस्थितियों या आवश्यकताओं में कभी भी परिवर्तन नहीं होता है। राष्ट्रीय एकता और अखण्डता को कायम करने वाले तत्त्व हैं जिनका मूल्य सभी कालों में समान रहा है। मातृभूमि हर वर्ग के व्यक्ति के लिए अनाज, फल, फूल, जल और विद्युत समान रूप से उपजाती है। उसकी दृष्टि में कोई भी भेदभाव नहीं होता है। समभाव और समान स्तर का जीवन सभी जियें, तभी उनमें ऊँच और नीच की भावना का समावेश नहीं रहेगा। यह सब गुण उतने ही आवश्यक हैं जितने की रात्रि और दिन का अस्तित्व। १. अथर्ववेद ५/५९/६ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar