वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 310, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 282 वैदिक वाङ्गमय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अर्थात् जो राष्ट्र अपने विकास की प्राथमिक अवस्था में जल के समान शीतल गुण वाले मननशील विद्वानों के संरक्षण रूप समुद्र के समान स्थिर था, जिस राष्ट्र के मध्य फेन रूप अमरस्थान या सार्वभौम ज्ञान की अनन्य राशि सत्य से व्याप्त है अर्थात् राष्ट्र का नियंत्रण केवल सत्य के आधार पर ही हो सकता है जो राष्ट्र आकाश में विद्यमान अर्थात् जिस प्रकार के समस्त तत्त्वों की गति समान होती है उसी प्रकार जिस राष्ट्र में समस्त जन समुदाय को सामान्य रूप से गति या उन्नति करने का अवसर प्राप्त होता है, ऐसे सर्वोत्तम राष्ट्र में हम तेज और पराक्रम को धारण करें। सार्वजनिक जीवन में तप भी एक महान् आवश्यक एवं अनिवार्य गुण है। व्यक्तिगत उत्तरदायित्व के कार्यों में प्रायः हानि-लाभ, शीत-उष्ण, सुख-दुःख आदि द्वन्द्वों को सहन करना पड़ता है। इसी प्रकार मातृभूमि, देश अथवा राष्ट्र की सेवा में हमको अनेक प्रकार के कष्टों का अनुभव हो सकता है। सभी कष्टों को यथावत् सहते हुये राष्ट्र की उन्नति में सतत् प्रयत्नशील रहना ही मातृभूमि में सच्चे सेवक के लिए परम तप है। तप के अनन्तर ब्रह्म या यथार्थ ज्ञान भी एक आवश्यक राष्ट्रीय गुण बताया गया है। 'ऋते ज्ञानान्न मोक्षः' अर्थात् ज्ञान के अभाव में मोक्ष संभव ही नहीं है। राष्ट्र एवं समाज का हित उसी दशा में संभव है जबकि प्रत्येक व्यक्ति व्यक्तिगत रूप में अथवा समाज या राष्ट्र के सामूहिक रूप में ज्ञान का अर्जन करें। प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य होना चाहिये कि वह अपने देश की परिस्थिति का अधिक से अधिक ज्ञान प्राप्त करे तथा जहाँ तक संभव हो नाना प्रकार के शिल्प एवं कला कौशल के संबंध में भी अपने आपको प्रवीण बनाने का प्रयास करे। धर्मयुक्त समाज एवं समाज के सदस्यों का धर्मयुक्त आचरण ही राष्ट्र की उन्नति में सहायक होता है। धर्म ही राजा के चयन से लेकर आचरण, कर्तव्यों एवं गुणों को निश्चित करता है। धर्म की कसौटी पर खरा उतरने वाला राजा ही राष्ट्र की एकता और अखण्डता की रक्षा के लिए सहायक होता है। इसीलिए अथर्ववेद में उल्लिखित है— त्वां विशो॑ वृणतां राज्याय॒ त्वामि॒माः प्र॒दिशः॒ पञ्च॑ दे॒वीः। वर्ष्मन्॑ राष्ट्रस्य॑ क॒कुदि॑ श्रयस्व॒ ततो॑ न उ॒ग्रो वि भ॑जा॒ वसू॑नि॥१ अर्थात् तुम्हें प्रजा द्वारा राज्य के लिये चयन किया जाये, ये पाँच दिव्य दिशायें भी तुम्हें स्वीकार करें। राष्ट्र के उच्च स्थान और उत्कृष्ट पद पर सदैव आसीन रहो। राजन्, सदैव राष्ट्र में रक्षा के प्रति उग्र रहो और हमें वहाँ से धन प्राप्त कराओं। १. अथर्ववेद ३/४/२ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar