भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 309, कुल 353 में से

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पृष्ठ 309

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri अष्टम अध्याय गृह्यसूत्र एवं धर्मसूत्र में राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता का अनुशीलन १. गृह्यसूत्र एवं धर्मसूत्र में निरूपित राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के आधार तत्त्व- वैदिकवाङ्मय की शाखाओं और प्रशाखाओं का अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि सम्पूर्ण साहित्य वेदों की सामग्री से निकली हुई ज्ञानसरिता की विभिन्न धाराएँ हैं। राष्ट्र व्यक्ति के जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण आधार है। यह सम्बन्ध भावात्मक है और पृथिवी से जुड़े हुए सम्बन्ध की आधारशिला है, जो उसके शारीरिक अस्तित्व से जुड़ा ही रहता है। राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में उस काल के आधारतत्त्व में सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति की धार्मिक मानसिकता है। राजनीति धर्म से कभी पृथक् हुई ही नहीं है। धर्म से पूर्ण राजनीति ही सर्वमान्य मानी जाती थी और जहाँ व्यक्ति धार्मिकता, नैतिकता से जुड़ा हुआ होता है, वहाँ इनकी मर्यादाओं का सम्मान करना उसका परम कर्तव्य होता है। ऐसे राष्ट्र में व्यक्ति की अपनी मातृभूमि के प्रति पूर्ण श्रद्धा और विश्वास होता है। इस वर्णन से हमें अपने गृह्यसूत्रों एवं धर्मसूत्रों का आधार वेद ग्रन्थों से ही प्राप्त होता है। सर्वोत्तम राष्ट्र के रूप में हम अपनी मातृभूमि को सर्वोत्तम उत्कर्ष के धारक के रूप में अवश्य ही देखना चाहते हैं। इस प्रकार मातृभूमि और राष्ट्र को पर्यायवाची माना गया है। तुलनात्मक योग्यता बताने के लिए संस्कृत में तरप् और तमप् प्रत्ययों का प्रयोग किया गया है और इस प्रकार 'उत्' से उत्तर, उत्तम-उच्चता की ये तीन श्रेणियाँ मानी गई हैं। हमारा राष्ट्र उत्तम हो अर्थात् संसार में विद्यमान समस्त राष्ट्रों में सर्वोत्तम एवं सर्वोत्कृष्ट हो, यह कामना की जाती है। इस भाव को निम्न मंत्र द्वारा स्पष्टतया देखा जा सकता है। यार्ण॒वेऽधि॑ स॒लिल॒मग्र॒ आसी॒द् यां मा॒याभि॑र॒न्वच॑रन् मनी॒षिण॑:। यस्या॒ हृद॑यं प॒र॒मे व्योम॒न्त्सत्ये॒नावृ॑त॒ममृ॑तं पृथि॒व्याः। सा नो॒ भूमि॒स्त्विषिं॒ बलं॑ रा॒ष्ट्रे द॑धातूत्त॒मे॥१ १. अथर्ववेद १२/१/८ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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