वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 308, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 280 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता सूर्यस्य पस्य शृङ्गार यो न तन्द्रयते चरंश्चरैवेति।१ इस प्रकार के कर्मठ नागरिकों के जीवन सन्देश से राष्ट्र स्वयं सुदृढ़ होता है। राष्ट्र की शक्ति वैचारिक एकता एवं आपसी सद्भाव से ही बढ़ती है, शस्त्रों की होड़ और युद्ध के लिए तैयार सैनिकों से नहीं। हमारे ब्राह्मण ग्रन्थ, आरण्यक और उपनिषद् वास्तविक अर्थों में मनुष्य को मानवता से परिचित कराते हैं। राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता के लिए आवश्यक है कि सभी राष्ट्रवासी आपस में हिल-मिलकर रहें क्योंकि उसमें निहित प्रेम की भावना उन्हें एकता के सूत्र में बाँधती है। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै।।२ इस मंत्र का आशय आपस में स्नेहसूत्र में बँधे रहने तथा एक दूसरे कें प्रति कभी विद्वेष न रखने से है। यही भावना उन्हें एक दूसरे के सुख-दुःख में सहयोग देने के लिए प्रेरित करती है। 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की अवधारणा हमारे ऋषि और मुनियों द्वारा ही प्रदान की गई है। इस दिशा में ईशोपनिषद् के निम्न मंत्र से स्वयं की सर्वत्र व्यापकता मनुष्य को एक उच्च विचारधारा प्रदान करती है। जब व्यक्ति स्वयं को ही देखेगा तो उसके लिए घृणा और विद्वेष के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता है। यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति। सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते॥ सबसे अधिक समाज में व्यक्ति के भावों और कर्मों का महत्त्व होता है। चरित्रवान् नागरिकों से ही राष्ट्र की एकता और अखण्डता को बल प्राप्त होता है। यह ग्रन्थ ही हिन्दू संस्कृति के लिए बहुत ही आदरणीय है। उनका महत्त्व हर युग में समान ही रहा है। वे कारक, जो पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति के प्रभाव से पनपने लगे हैं, उनके प्रभाव को मुक्त कराने के लिए ही हमारी वैदिकग्रन्थों की उपादेयता बहुत अधिक बढ़ जाती है। हमारे ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् ग्रन्थों से प्राप्त शिक्षा ही आज भी देश को विश्व में एक महत्त्वपूर्ण स्थान दिलाये हुए है और पाश्चात्य विद्वान् भी इन ग्रन्थों के अध्ययन हेतु उत्सुक रहते हैं। हमारे राष्ट्र की अनेकता में एकता का आधार यही वैदिक साहित्य है। सभी के चारित्रिक बल का आधार यही है। विभिन्न भाषाओं की उपस्थिति के बाद भी वेदों, उपनिषदों, सभी का ज्ञान सभी विद्वानों को है और वे उन तथ्यों को स्वीकार करते हैं। १. ऐतरेय ब्राह्मण ३३/१ २. कठोपनिषद् CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar