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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 307

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सप्तम अध्याय 279 अर्थात् 'यमराज कहते हैं- हे नचिकेता! तुम्हारी परीक्षा करके मैंने अच्छी तरह देख लिया कि तुम बड़े बुद्धिमान्, विवेकी और वैराग्यसम्पन्न हो। अपने को बहुत बड़े चतुर, विवेकी और तार्किक मानने वाले लोग भी जिस चमक-दमक वाली सम्पत्ति के मोहजाल में फँस जाया करते हैं, उसे भी तुमने स्वीकार नहीं किया। मैंने बड़ी ही लुभावनी भाषा में तुम्हें बार-बार पुत्र, पौत्र, हाथी, घोड़े, गौयें, धन, सम्पत्ति, भूमि आदि अनेकों दुष्प्राप्य और लोभनीय भोगों का प्रलोभन दिया। इतना ही नहीं स्वर्ग के दिव्य भोगों और अप्रतिम सुन्दरी स्वर्गीय रमणियों के चिर-भोग सुख का लालच दिया, किन्तु तुमने सहज ही उन सबकी उपेक्षा कर दी। अतः तुम अवश्य ही परमात्मतत्त्व का श्रवण करने के सर्वोत्तम अधिकारी हो।' इस प्रकार की शिक्षा व्यक्ति को एक आदर्श नागरिक बना सकती है। सत्याचरण, धर्माचरण का पाठ सदैव ही पढाया गया है। ऐसे ही नागरिक राष्ट्रीयएकता और अखण्डता के लिए प्रतीक बन जाते हैं। ६. राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता को ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषदों का प्रदेय : राष्ट्र की भूमिका मानव जीवन में सर्वोपरि रही है। एक स्वतंत्र राष्ट्र, सुयोग्य शासक, धन-धान्य से परिपूर्ण भूमि और सुरक्षित देश की सीमाओं में ही नागरिक सुख-चैन की साँस लेकर, अपने समाज तथा राष्ट्र की प्रगति के बारे में विचार कर सकता है। एक व्यक्ति के लिए कर्मनिष्ठ जीवन और पुरुषार्थ साधन का महत्त्व सर्वाधिक होता है। उसके इन्हीं गुणों एवं कार्यों से राष्ट्र के प्रति योगदान की गणना होती है जिसके कारण राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता को किसी प्रत्यक्ष सम्बल की आवश्यकता अनुभव नहीं होती है, अपितु प्रत्येक मानव के जन्म से लेकर दी जाने वाली शिक्षा, वातावरण और सामाजिक तथा नैतिक मूल्यों से ही उसकी आधारशिला सुदृढ़ होती है। ऐतरेय ब्राह्मण में 'शुनःशेप' से सम्बद्ध आख्यान में दिया गया उपदेश व्यक्ति को कर्मण्यता की ओर ले जाता है। कहा गया है कि "बिना थके हुए 'श्री' नहीं मिलती।" जो विचरता है, उसके पैर पुष्पयुक्त होते हैं, उसकी आत्मा फल को उगाती और काटती है। भ्रमण के श्रम से उसकी समस्त पापराशि नष्ट हो जाती है। बैठे हुए व्यक्ति का भाग्य भी बैठ जाता है और सोते हुए व्यक्ति का सो जाता है और चलते हुए का चलता रहता है। चलते हुए ही मनुष्य स्वादिष्ट फल प्राप्त करता है। सूर्य के श्रम को देखो, जो चलते हुए कभी आलस्य नहीं करता-

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar