वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 306, कुल 353 में से
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278 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता स मनसा ध्यायेद् यद् वा अहं किञ्च मनसा ध्यास्यामि तदैव या तद् भविष्यति। यद्धस्म तथैव भवति।१ ब्राह्मणकार ने आधे-अधूरेपन से कार्य करने से मना किया है। द्वितीय पाठक में ब्रह्मचारी के कर्तव्यों का विस्तार से निरूपण किया गया है। ऐन्द्रिय रागों एवं आकर्षणों से बचने की सलाह दी गई है। स्त्री सम्पर्क, दूसरों को कष्ट पहुँचाना, ऊँचे आसन पर बैठना उसके लिए वर्जित बताया गया है। संरक्षित धर्म ही उसकी रक्षा करता है— 'धर्मो हैनं गुप्तो गोपायति' ।२ संभवतः यही गोपथ ब्राह्मणोक्ति सूक्ति लौकिक संस्कृत में 'धर्मो रक्षितः' में परिणत हो गई। आचार की दृष्टि से गोपथ ब्राह्मण का स्तर अत्यन्त उच्च और उदात्त है। आरण्यक-साहित्य भी नैतिकता और आचार-दर्शन की दृष्टि से मानवीय मानस के ऊर्ध्वारोहण में परम सहायक है। वैदिकवाङ्ग्मय से प्राप्त शिक्षादर्शन बहुत ही महत्त्वपूर्ण था। उस काल की शिक्षा का उद्देश्य मात्र ज्ञान प्राप्त करना नहीं था अपितु उसे जीवन में आत्मसात कर लेना ही ब्रह्मचारी की शिक्षा परीक्षा और सफलता मानी जाती थी। शिक्षा काल के दौरान ब्रह्मचर्य का पालन इस बात का द्योतक है कि सम्पूर्ण इन्द्रियों एवं मस्तिष्क को शिक्षा ग्रहण करने के लिए केन्द्रित करके अध्ययन कार्य सम्पन्न करना। इसी तरह से गुरु भी अपने शिष्यों की सफलता को अपने शिक्षा दान की सफलता मानता था। शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य मानव की प्राकृतिक शक्तियों को सुविकसित कर उसे जीवन की समस्याओं को सुलझाने में समर्थ बनाना था। तपस्या के अनुष्ठानपूर्वक वेद और सत्य का ज्ञान प्राप्त करना ही विद्यार्थी की चर्चा थी जिससे वह मृत्यु तक पर विजय प्राप्त कर सके। तत्कालीन शिक्षादर्शन स्मृति, धारणा और बोध तीनों पर आश्रित थी। ज्ञान प्राप्त करने की अदम्य जिज्ञासा से ओतप्रोत उदाहरण नचिकेता है, जिन्होंने यम सरीखे गुरु के पास जाकर मृत्यु का रहस्य सीखना चाहा था और यमराज द्वारा विविध प्रलोभनों से डिगाये जाने पर भी वह सर्वथा अविचलित रहा। तब यम ने स्वयं नचिकेता की पात्रता को स्वीकार करते हुये कहा— स त्वं प्रियान्प्रियरूपांश्च कामानभिध्यायन्नचिकेतोऽत्यस्त्राक्षीः। नैतां सृङ्कां वित्तमयीमवाप्तो यस्यां मज्जन्ति बहवो मनुष्याः॥३ १. गोपथ ब्राह्मण १/१/९ २. गोपथ ब्राह्मण १/२/४ ३. कठोपनिषद् १/२/३
CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar