वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 305, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri सप्तम अध्याय 277 ऐतरेय ब्राह्मण में नैतिक मूल्यों और उदात्त आचार-व्यवहार के सिद्धान्तों पर विशेष बल दिया गया है। प्रथम अध्याय के षष्ठ खण्ड में वर्णित है कि दीक्षित यजमान को सत्य ही बोलना चाहिए- ऋतं वाव दीक्षा सत्यं दीक्षा तस्माद्दीक्षितेन सत्यमेव वदितव्यम्। शाङ्ख्यायनब्राह्मण में भी मानवीय आचार के नियामक और निर्देशक तत्त्व बाहुल्य में उपलब्ध होते हैं। व्यक्ति के लिए वाणी परम उपादेय सिद्ध होती है। इस बारे में शाङ्ख्यायन ब्राह्मणकार का कथन है- अथो वाग्वै सार्पराज्ञी। वाग्वि सर्प तो राज्ञी।१ शतपथ ब्राह्मण में श्रम एवं तप का महत्त्व पौनः पुन्येन प्रदर्शित है।२ अनृतभाषी को अमेध्य कहा गया है- अमेध्यों वै पुरुषो यदनृतं वदति।३ तैत्तिरीय ब्राह्मण के अनुसार मनुष्य का आचरण देवों के समान होना चाहिये- इति देवा अकुर्वत। इत्यु वै मनुष्याः कुर्वति।४ सत्यभाषण, वाणी की मधुरता, तपोमय जीवन, अतिथि सत्कार, संगठनशीलता, सम्पत्ति के परोपकार हेतु विनियोग, मांस-भक्षण से दूर रहने तथा ब्रह्मचर्य के पालन पर विशेष बल दिया गया है। 'अहिताग्नि-व्यक्ति' को असत्य कदापि नहीं बोलना चाहिए क्योंकि तेजोमयता सत्य से ही है- 'अहिताग्निः न अनृतं वदेत।' तपोमय-जीवन, 'तैत्तिरीय-ब्राह्मण' में प्रतिपादित, द्वितीय महनीय जीवन मूल्य है- तपस्या से देवों ने उच्च स्थिति प्राप्त की, ऋषियों ने स्वर्गिक सुख पाया और शत्रुओं का विनाश किया- तपसा देवा देवतामग्रआयन् तपसृषयः स्वर्गमन्वविन्दन्। तपसा सपत्नान् प्रणुदोमशतीः।५ गोपथ ब्राह्मण के अनुसार मन का बहुत महत्त्व है। आदमी मन से जो सोचता है, वही होता है- १. कौषीतकि ब्राह्मण २६/४ २. शतपथ ब्राह्मण १४/१/१/१ ३. शतपथ ब्राह्मण १/१/१ ४. तैत्तिरीय ब्राह्मण १/५/९/४ ५. तैत्तिरीय ब्राह्मण ३/१२/३/१ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar