वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 295, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri सप्तम अध्याय ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद् में राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता का अनुशीलन १. ब्राह्मण, आरण्यक एवम् उपनिषद् में निरूपित राष्ट्रीयएकता एवम् अखण्डता के आधारतत्त्व : राष्ट्र की महत्ता को किसी भी काल में अस्वीकार नहीं किया जा सकता है। मनुष्य के अस्तित्व और उसके पारिवारिक, सामाजिक और राजनीतिक जीवन को उससे पृथक् करके वर्णित नहीं किया जा सकता है। दैवशासन में भी इन्द्र के राजा होने का और उसके शासित इन्द्रलोक का जिस तरह वर्णन प्राप्त होता है, ठीक उसी प्रकार मानव समूहों में मानवश्रेष्ठ का राजा और शेष लोगों के शासित होने का उल्लेख सभी ग्रन्थों में प्राप्त होता है। आपस में हिल मिलकर रहने का सन्देश भी सभी युगों में गूँजता रहा है क्योंकि इसमें निहित प्रेम की भावना ही उस संसार का आधारतत्त्व है। राष्ट्र में व्याप्त यही भावना राष्ट्रीय एकता और अखण्डता को बल प्रदान करती है। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै।१ अर्थात् हम जीवन भर परस्पर स्नेह के सूत्र में बँधे रहें और कभी एक दूसरे से परस्पर द्वेष न करें। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और इस समाज में सहयोग, प्रेम और आपसी समझदारी के साथ ही जीवन व्यतीत करने का सन्देश प्रदान किया गया है जिससे कि एक राष्ट्र की जड़े और मजबूत होती हैं, जिन पर प्रहार करने का साहस कोई भी शत्रु नहीं कर सकता। राष्ट्र के निवासियों में भी सभी श्रेणी के लोग प्राप्त होते हैं जिनमें कुछ स्वार्थी होते हैं। उन्हें निजस्वार्थ हेतु ही विचार करना होता है और अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए प्रयास करते हैं। जो व्यक्ति प्रबुद्ध होते हैं वे सदैव ही परम कल्याण की कामना करते हैं। १. कठोपनिषद् CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar