भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 266 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अर्थात् सर्वोत्तम राष्ट्र के रूप में हमारी मातृभूमि हमारे व्यक्तिगत एवं सामूहिक पराक्रम एवं उत्कर्ष का धारक हो। इस प्रकार 'भूमि' या 'उत्तम राष्ट्र' पर्यायवाची शब्द माने गये हैं। इस प्रकार से राष्ट्र की सर्वोच्चता की कामना की गई है। इस भावना से ही राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता को बल मिलता है। यस्यां गायन्ति नृत्यन्ति भूम्यां मर्त्या व्यैलबाः। युध्यन्ते यस्यामाक्रन्दो यस्यां वदति दुन्दुभिः। सा नो भूमिः प्र णुदतां सपत्नानसपत्नं मां पृथिवी कृणोतु॥१ अर्थात् कर्तव्यपालन करने से व्यक्ति एक अनुपम आनन्द की अनुभूति करता है। जो राष्ट्रभक्त समझकर मातृभूमि की रक्षा करते हैं, उन्हें अनुपम आत्मतुष्टि की अनुभूति होती है। इसीलिए वीरों से वह अपेक्षा की जाती है कि जब कभी शत्रु मातृभूमि पर आक्रमण कर उन पर विपत्ति लाने का प्रयास करेगा तो वे अपनी पूर्ण शक्ति एवं सामर्थ्य से विरोध करेंगे और अपने देश को संकट से मुक्त रखेंगे। अथर्ववेद में राष्ट्रीय एकता और अखण्डता के प्रति राष्ट्रवासियों के कर्तव्यों एवं उनके प्रति श्रद्धा रखने के बारे में वर्णन किया गया है। इसके लिए बारहवें काण्ड में पृथिवी सूक्त में विशेष रूप से वर्णन किया गया है। यदि राष्ट्र में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के शत्रु उत्पन्न हो जायें तो उन्हें विनष्ट करने के लिए सेना को कुशल संचालन से उनके नाश के लिए प्रयास करना चाहिये, ताकि भविष्य में इस राष्ट्र के अहित के लिए कोई मन में विचार भी न ला सकें। व्याकूतय एषामितार्थो चित्तानि मुह्यत। अथो यदद्यैषां हृदि तदैषां परि निर्जहि॥२ देश में व्याप्त शत्रुता का भाव प्रतिकूल दिशा में गमन करें अर्थात् उनकी भावनाएँ परिवर्तित हो जायें। वे राष्ट्र हित में सोचने लगे और अपने कर्तव्यों का अहसास करें। राष्ट्रवासियों के लिए शुभ एवं अनुकूल मार्ग प्रशस्त किया गया है। १. अथर्ववेद १२/१/४१ २. अथर्ववेद ३/२/४ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar