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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 293

षष्ठ अध्याय                         265 मा॒ता भूमिः॑ पु॒त्रो अ॒हं पृ॑थि॒व्याः।$^१$ अर्थात् 'मेरी माता भूमि है और मैं मातृभूमि का पुत्र हूँ, बड़ी ही उदात्त भावना है और इस पुत्र होने की भावना से ही राष्ट्र में अपनी मातृभूमि के प्रति प्रेम का बीज स्फुरित होता है। राष्ट्र (मातृभूमि) के सभी पुत्र इसकी रक्षा के लिए, इसकी अखण्डता के लिए सदैव ही तत्पर रहते हैं। उनकी यह कामना रहती है कि इस पृथिवी पर सभी एक परिवार के सदस्यों की तरह रहें, उनमें आपस में विद्वेष आदि भावना को कोई स्थान नहीं होना चाहिये। जिस मातृभूमि के गर्भ से उत्पन्न वस्तुएँ हमें जीवन देती है, इसमें व्याप्त 'पंचतत्त्व' ही हमें निर्मित करते हैं। वह राष्ट्र जो हमें संरक्षण, सुरक्षा देता है, जिसके विद्वान् एवं योग्य राजा का हम संवरण करते हैं, उसके प्रति निष्ठा होनी चाहिये-   यस्ते॑ ग॒न्धः पु॒रु॑षे॒षु स्त्री॒षु पुंसु॒ भगो॑ रु॒चिः॑।   यो अश्वे॑षु वी॒रेषु॒ यो मृ॒गेषू॒त ह॒स्तिषु॑।   क॒न्यायां॒ वर्चो॒ यद् भूमे॒ तेना॒स्माँ अपि॒ सं सृ॑ज॒ मा नो॑ द्वि॒क्षत॒ कश्च॒न॥$^२$ अर्थात् हे मातृभूमि! हम सबकी उत्पत्ति-स्थली पृथिवी! तेरी जो गंध (अंश) स्त्री व पुरुषों में सौभाग्यमय कान्ति रूप से विद्यमान है, जो अश्वों में, वीर्यवान् पुरुषों में, जो मृगों में और जो हस्तियों में है, जो वर्चस (कान्तिमया भाग) कन्याकुमारी में विद्यमान है, उस गंध और कान्ति से हमें भी युक्त कर और हमें आपस में विद्वेष की भावना से मुक्त कर। राष्ट्र के लिए एक भयमुक्त समाज, आपस में वैर व वैमनस्य का अभाव, ज्येष्ठता और कनिष्ठता की भावना की अनुपस्थिति ही एक सबल आधार होता है और यह स्वतंत्र राष्ट्र के नागिरकों का प्रमुख कर्तव्य होता है कि वह सत्य का आश्रय लेकर ही जीवन-यापन करें तभी उन्हें वैभव की प्राप्ति होगी एवं सर्वोत्कृष्ट स्वतंत्र राष्ट्र का निर्माण होना संभव है। इस बारे में निम्न मंत्र में उल्लिखित है-   यार्णवेऽधि॑ स॒लिल॒मग्र॑ आसी॒द् यां मा॒याभि॒रन्वचर॑न् मनी॒षिण॑ः।   यस्या॒ हृद॑यं प॒र॒मे व्योम॒न्त्स॒त्येनावा॑त॒ममृ॑तं पृथि॒व्याः।   सा नो॒ भूमि॒स्त्विषिं॒ बलं॑ रा॒ष्ट्रे द॑धातूत्त॒मे॥$^३$

१. अथर्ववेद १२/१/१२ २. अथर्ववेद १२/१/२५ ३. अथर्ववेद १२/१/८