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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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264 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता

उस समय खेती के अतिरिक्त अन्य प्रकार के उद्यम भी किये जाते थे, जिनमें हाथ के कौशल और कारीगरी की विशेष आवश्यकता पड़ती थी। बढ़ई (तक्षन्), लोहार (कर्मार), वैद्य (भिषक्) स्तोत्र बनाने वाले (थारु), कुम्हार (कुलाल), रथ बनाने वाले (रथकार), मल्लाह (कैवर्त, निषाद) तथा बुनकर (वाय) आदि का उल्लेख कई स्थानों पर है। कृषि से उत्पन्न अनाजों, औद्योगिक-शिल्पों से उत्पन्न वस्तुओं का क्रय-विक्रय हुआ करता था। वस्तु-विनियम का उस समय प्रचलन था। वस्तु के बदले वस्तु ही प्राप्त की जाती थी। अथर्ववेद में दूर्श (वस्त्र), पवस्त (चादर) तथा अजिन (चर्म खरीदने) का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।¹ समुद्र पार करके दूसरे स्थानों पर भी व्यापार करने का उल्लेख प्राप्त होता है। व्यापारियों की स्थिति उस समय सुदृढ़ होती थी और उसी के अनुरूप उन्हें 'शतिन्' और सहसितु कहा गया है। फिर भी अर्थ के प्रति मोह रखने की शिक्षा नहीं दी जाती थी। वैदिक काल में अत्यन्त समृद्ध एवं सम्पन्न अर्थव्यवस्था विद्यमान थी। आर्थिक आधार पर समाज में श्रेणियाँ नहीं थी। समतामूलक, श्रम की प्रतिष्ठाकारक और सांस्कृतिक जीवन के लिए उपादेय वह अर्थव्यवस्था हमें आज भी स्पृहणीय प्रतीत होती है, जिसमें धनोपार्जन को केवल शुद्ध, विधिसम्मत और समाज के द्वारा अनुमोदित प्रणाली ही प्रशस्त समझी जाती थी। अग्नि से प्रार्थना करते हुये ऋषि-कवि यही कामना करते थे— तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः मागृधः कस्यस्विद्धनम्। अर्थात् हम किसी अन्य के धन की कामना न करें, यह भाव भी इसमें मुखरित है। ६. राष्ट्रीयएकता एवम् अखण्डता को अथर्ववेद का प्रदेय : वैदिक काल के सभी ग्रन्थों में राष्ट्र की कभी भी अवहेलना नहीं की गई है। पृथिवी और मातृभूमि को जितना सम्माननीय स्थान प्रदान किया गया है, देशभक्ति और देशरक्षा के लिए भी पूर्ण वर्णन उपलब्ध है। 'पृथिवी-सूक्त' में ऋषि आर्थवण ने ६३ मंत्रों में 'मातृस्वरूपिणी-भूमि' को समग्र पार्थिव-पदार्थों की जननी और जीवों की पोषिका के रूप में उद्घोषित किया है तथा प्रजा को समस्त बुराईयों, क्लेशों तथा अनर्थों से बचाने तथा सुख-सम्पत्ति की वृष्टि करने की कामना की गई है।


१. अथर्ववेद ४/७/६

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar