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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 291

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri षष्ठ अध्याय 263 अर्थात् हे ज्ञानवान् आचार्य! जो स्व अर्थात् आत्मा या शरीर को धारण-पोषण करने वाले वीर्य से युक्त होकर आपके समीप अपने को सर्वार्पण करके ब्रह्मचर्य व्रत का आचरण करें, आप उसको फिर माता-पिता एवं वृद्धों की सेवा के लिए या पिता के योग्य गृहस्थ कार्यों के लिए तैयार करके, उसके लिए आज्ञा देते हैं और वह आपके द्वारा शिक्षित व आज्ञा पाया हुआ शिष्य या पुत्र अपने जीवन में आपके समीप और आपकी आज्ञा में रहकर अपने गृहों को वापस जायें और वहाँ अपने जीवन में उत्तम तेजस्वी होकर सद्संगों में लाभ करें। इस प्रकार अथर्ववेद में प्राप्त शिक्षादर्शन से व्यक्ति को एक सदाचारी जीवन प्राप्त होता है। उसकी शिक्षा उसे पूर्ण मानव बनाकर सूर्य, पृथिवी, माता-पिता, बाल एवं वृद्ध के परिपालन की शिक्षा देती है। ऐसे आचरण की शिक्षा से देश और राष्ट्र सदैव ही सुदृढ़ होता है। 'अर्थ' जीवन के लिए उतना ही आवश्यक है जितना की अन्य सभी वस्तुयें। बिना अर्थोपार्जन के जीवनयापन संभव ही नहीं है। वैदिक आर्य उस अवस्था को पूर्ण कर चुके थे जब मनुष्य अपनी क्षुधाशान्ति के लिए फल-मूल पर ही निर्भर रहता था। इस काल में कृषि को आजीविका के लिए प्रमुख साधन माना जाने लगा था और कृषि कार्य भी उस समय अत्यन्त महत्त्वपूर्ण था। अथर्ववेद के एक मंत्र में कहा गया है कि पृथी (अथवा पृथु) वैन्य ने सर्वप्रथम मनुष्यों के लिए कृषिकर्म के द्वारा फसल उत्पन्न की। उन्होंने ही मानव समुदाय के लिए कृषि की पद्धति प्रशस्त की— तां पृ॒थीं वै॒न्योऽधो॒क् तां कृ॒षिं च॑ स॒स्यं चा॑धोक्॥११॥ ते कृ॒षिं च॑ स॒स्यं च॑ मनु॒ष्या॑३ उप॑ जीवन्ति कृ॒ष्टरा॑धिरुपजीव॒नीयो॑ भव॒ति॒ य एवं वेद॑॥१ चारों वेदों के काल में अथर्ववेद का काल सबसे बाद का रहा और यह काल प्रगतिशील भी था। ईश्वर एवं आराधना के अतिरिक्त भी इस वेद में कई विषयों पर उल्लेख किया गया है जो शेष वेदों में अनुपलब्ध था। अथर्ववेद से ही यह बात स्पष्ट होती है कि वैदिक युग में पशु पुरीषजन्य खाद के महत्त्व की जानकारी थी। फसल कटाई के लिए उपकरण 'दात्र' तथा 'शृणी' (हंसिया) था। सिंचाई के लिए कुओं तथा नहरों पर निर्भर रहते थे।२ कृषि कार्य के लिए पशुपालन का भी महत्त्व बहुत अधिक था। १. अथर्ववेद ८/१३/१२-१२ २. अथर्ववेद ३/१४/३-४ एवं १९/३१/३ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar