भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 290, कुल 353 में से

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पृष्ठ 290

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 262 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता मैन॑मग्ने॒ वि द॑हो॒ माभि शू॑शुचो॒ मास्य॒ त्वचं॑ चिक्षिपो॒ मा शरी॑रम्। शृ॒तं य॒दा कर॑सि जातवे॒दोऽथे॑मेनं॒ प्र हि॑णुतात् पि॒तृभ्यः॑॥ १ अर्थात् हे अग्ने ! आचार्य ! इस शिष्य को जलाइये मत। संतप्त मत कीजिये, उसकी त्वचा को काटकर विकृत न करें और न ही उसके शरीर का विनाश करें। हे जातप्रज्ञ ! विद्वान् ! जब इसको परिपक्वपूर्ण ज्ञानवान् कर दें, तब ही सम्पूर्ण विद्याओं से युक्त हो जाने पर इसे वापस माता-पिता के पास भेजें। आचार्य के पास आने वाला हर शिष्य ज्ञान शून्य होता है और उसकी इस ज्ञान शून्यता के कारण ही शिष्य दण्डित भी किया जाता है, लेकिन उसको पूर्ण ज्ञानी बनाकर ही माता पिता के पास वापस भेजा जाता है। इससे वह इतना परिपक्व और ज्ञानी हो जाता है कि जीवन में उसे कभी कठिनाईयों का सामना नहीं करना पड़ता है। गुरु मार्गदर्शक, असत् से सत् की दिशा दिखाने वाला, अज्ञान के गहरे अंधकार से मुक्त कराके प्रकाश की ओर ले जाने वाला होता था। उक्त मंत्र में आचार्य के लिए ही आदेश दिया गया है- अ॒जो भा॒गस्तप॑सा॒तं त॑पस्व॒ तं तै॑ शो॒चिस्त॑पतु॒ तं तै॑ अ॒र्चिः। यास्ते॑ शि॒वास्त॒न्वो॑ जातवेद॒स्ताभि॑र्वहैनं सु॒कृता॑मु लो॒कम्॥ २ अर्थात् हे जातप्रज्ञ परमात्मन् आचार्य ! अज अजन्मा जीवात्मा ही शरीर में दुःख-सुख का सेवन करता है। अतः तू उसे ही तप, ज्ञान, स्वाध्याय और प्रवचन एवम् तपस्या द्वारा सन्तप्त कर, उसे तपोमय आचरण करा। उस आत्मा को ही तेरी इस स्वरूप ज्वाला या प्रकाश तप्त करें। उसको तेरी दीप्ति प्रकाशित करें। हे ईश्वर ! तेरी जो कल्याणकारी रचित पदार्थ ये देह हैं उनसे इस जीव को पुण्यकर्ताओं के लोक को प्राप्त करा। आचार्य से जिन बातों की अपेक्षा की जाती है वह सब अथर्ववेद में वर्णित है। गुरु के बिना तो ज्ञान प्राप्त हो ही नहीं सकता है और इसीलिए गुरु को ईश्वर से भी श्रेष्ठ बताया गया है। ईश्वर से परिचय गुरु के माध्यम से ही होता है। उस पथ का, उस आचरण का जो ईश्वर तक जाता है, गुरु ही मार्ग दिखा सकता है। अव॑ सृज॒ पुन॑रग्ने पि॒तृभ्यो॒ यस्त॒ आहु॑तश्चर॑ति स्व॒धावा॑न्। आयु॒र्वसा॑न॒ उप॑ यातु॒ शेषः॒ सं ग॑च्छतां त॒न्वा॑ सु॒वर्चाः॑॥ ३ १. अथर्ववेद १८/२/४ एवं ऋग्वेद १०/१६/१ २. अथर्ववेद १८/२/८ एवं ऋग्वेद १०/१६/३ ३. अथर्ववेद १८/२/१० एवं ऋग्वेद १०/१६/५ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar