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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 262 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता मैन॑मग्ने॒ वि द॑हो॒ माभि शू॑शुचो॒ मास्य॒ त्वचं॑ चिक्षिपो॒ मा शरी॑रम्। शृ॒तं य॒दा कर॑सि जातवे॒दोऽथे॑मेनं॒ प्र हि॑णुतात् पि॒तृभ्यः॑॥ १ अर्थात् हे अग्ने ! आचार्य ! इस शिष्य को जलाइये मत। संतप्त मत कीजिये, उसकी त्वचा को काटकर विकृत न करें और न ही उसके शरीर का विनाश करें। हे जातप्रज्ञ ! विद्वान् ! जब इसको परिपक्वपूर्ण ज्ञानवान् कर दें, तब ही सम्पूर्ण विद्याओं से युक्त हो जाने पर इसे वापस माता-पिता के पास भेजें। आचार्य के पास आने वाला हर शिष्य ज्ञान शून्य होता है और उसकी इस ज्ञान शून्यता के कारण ही शिष्य दण्डित भी किया जाता है, लेकिन उसको पूर्ण ज्ञानी बनाकर ही माता पिता के पास वापस भेजा जाता है। इससे वह इतना परिपक्व और ज्ञानी हो जाता है कि जीवन में उसे कभी कठिनाईयों का सामना नहीं करना पड़ता है। गुरु मार्गदर्शक, असत् से सत् की दिशा दिखाने वाला, अज्ञान के गहरे अंधकार से मुक्त कराके प्रकाश की ओर ले जाने वाला होता था। उक्त मंत्र में आचार्य के लिए ही आदेश दिया गया है- अ॒जो भा॒गस्तप॑सा॒तं त॑पस्व॒ तं तै॑ शो॒चिस्त॑पतु॒ तं तै॑ अ॒र्चिः। यास्ते॑ शि॒वास्त॒न्वो॑ जातवेद॒स्ताभि॑र्वहैनं सु॒कृता॑मु लो॒कम्॥ २ अर्थात् हे जातप्रज्ञ परमात्मन् आचार्य ! अज अजन्मा जीवात्मा ही शरीर में दुःख-सुख का सेवन करता है। अतः तू उसे ही तप, ज्ञान, स्वाध्याय और प्रवचन एवम् तपस्या द्वारा सन्तप्त कर, उसे तपोमय आचरण करा। उस आत्मा को ही तेरी इस स्वरूप ज्वाला या प्रकाश तप्त करें। उसको तेरी दीप्ति प्रकाशित करें। हे ईश्वर ! तेरी जो कल्याणकारी रचित पदार्थ ये देह हैं उनसे इस जीव को पुण्यकर्ताओं के लोक को प्राप्त करा। आचार्य से जिन बातों की अपेक्षा की जाती है वह सब अथर्ववेद में वर्णित है। गुरु के बिना तो ज्ञान प्राप्त हो ही नहीं सकता है और इसीलिए गुरु को ईश्वर से भी श्रेष्ठ बताया गया है। ईश्वर से परिचय गुरु के माध्यम से ही होता है। उस पथ का, उस आचरण का जो ईश्वर तक जाता है, गुरु ही मार्ग दिखा सकता है। अव॑ सृज॒ पुन॑रग्ने पि॒तृभ्यो॒ यस्त॒ आहु॑तश्चर॑ति स्व॒धावा॑न्। आयु॒र्वसा॑न॒ उप॑ यातु॒ शेषः॒ सं ग॑च्छतां त॒न्वा॑ सु॒वर्चाः॑॥ ३ १. अथर्ववेद १८/२/४ एवं ऋग्वेद १०/१६/१ २. अथर्ववेद १८/२/८ एवं ऋग्वेद १०/१६/३ ३. अथर्ववेद १८/२/१० एवं ऋग्वेद १०/१६/५ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri षष्ठ अध्याय 263 अर्थात् हे ज्ञानवान् आचार्य! जो स्व अर्थात् आत्मा या शरीर को धारण-पोषण करने वाले वीर्य से युक्त होकर आपके समीप अपने को सर्वार्पण करके ब्रह्मचर्य व्रत का आचरण करें, आप उसको फिर माता-पिता एवं वृद्धों की सेवा के लिए या पिता के योग्य गृहस्थ कार्यों के लिए तैयार करके, उसके लिए आज्ञा देते हैं और वह आपके द्वारा शिक्षित व आज्ञा पाया हुआ शिष्य या पुत्र अपने जीवन में आपके समीप और आपकी आज्ञा में रहकर अपने गृहों को वापस जायें और वहाँ अपने जीवन में उत्तम तेजस्वी होकर सद्संगों में लाभ करें। इस प्रकार अथर्ववेद में प्राप्त शिक्षादर्शन से व्यक्ति को एक सदाचारी जीवन प्राप्त होता है। उसकी शिक्षा उसे पूर्ण मानव बनाकर सूर्य, पृथिवी, माता-पिता, बाल एवं वृद्ध के परिपालन की शिक्षा देती है। ऐसे आचरण की शिक्षा से देश और राष्ट्र सदैव ही सुदृढ़ होता है। 'अर्थ' जीवन के लिए उतना ही आवश्यक है जितना की अन्य सभी वस्तुयें। बिना अर्थोपार्जन के जीवनयापन संभव ही नहीं है। वैदिक आर्य उस अवस्था को पूर्ण कर चुके थे जब मनुष्य अपनी क्षुधाशान्ति के लिए फल-मूल पर ही निर्भर रहता था। इस काल में कृषि को आजीविका के लिए प्रमुख साधन माना जाने लगा था और कृषि कार्य भी उस समय अत्यन्त महत्त्वपूर्ण था। अथर्ववेद के एक मंत्र में कहा गया है कि पृथी (अथवा पृथु) वैन्य ने सर्वप्रथम मनुष्यों के लिए कृषिकर्म के द्वारा फसल उत्पन्न की। उन्होंने ही मानव समुदाय के लिए कृषि की पद्धति प्रशस्त की— तां पृ॒थीं वै॒न्योऽधो॒क् तां कृ॒षिं च॑ स॒स्यं चा॑धोक्॥११॥ ते कृ॒षिं च॑ स॒स्यं च॑ मनु॒ष्या॑३ उप॑ जीवन्ति कृ॒ष्टरा॑धिरुपजीव॒नीयो॑ भव॒ति॒ य एवं वेद॑॥१ चारों वेदों के काल में अथर्ववेद का काल सबसे बाद का रहा और यह काल प्रगतिशील भी था। ईश्वर एवं आराधना के अतिरिक्त भी इस वेद में कई विषयों पर उल्लेख किया गया है जो शेष वेदों में अनुपलब्ध था। अथर्ववेद से ही यह बात स्पष्ट होती है कि वैदिक युग में पशु पुरीषजन्य खाद के महत्त्व की जानकारी थी। फसल कटाई के लिए उपकरण 'दात्र' तथा 'शृणी' (हंसिया) था। सिंचाई के लिए कुओं तथा नहरों पर निर्भर रहते थे।२ कृषि कार्य के लिए पशुपालन का भी महत्त्व बहुत अधिक था। १. अथर्ववेद ८/१३/१२-१२ २. अथर्ववेद ३/१४/३-४ एवं १९/३१/३ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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264 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता

उस समय खेती के अतिरिक्त अन्य प्रकार के उद्यम भी किये जाते थे, जिनमें हाथ के कौशल और कारीगरी की विशेष आवश्यकता पड़ती थी। बढ़ई (तक्षन्), लोहार (कर्मार), वैद्य (भिषक्) स्तोत्र बनाने वाले (थारु), कुम्हार (कुलाल), रथ बनाने वाले (रथकार), मल्लाह (कैवर्त, निषाद) तथा बुनकर (वाय) आदि का उल्लेख कई स्थानों पर है। कृषि से उत्पन्न अनाजों, औद्योगिक-शिल्पों से उत्पन्न वस्तुओं का क्रय-विक्रय हुआ करता था। वस्तु-विनियम का उस समय प्रचलन था। वस्तु के बदले वस्तु ही प्राप्त की जाती थी। अथर्ववेद में दूर्श (वस्त्र), पवस्त (चादर) तथा अजिन (चर्म खरीदने) का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।¹ समुद्र पार करके दूसरे स्थानों पर भी व्यापार करने का उल्लेख प्राप्त होता है। व्यापारियों की स्थिति उस समय सुदृढ़ होती थी और उसी के अनुरूप उन्हें 'शतिन्' और सहसितु कहा गया है। फिर भी अर्थ के प्रति मोह रखने की शिक्षा नहीं दी जाती थी। वैदिक काल में अत्यन्त समृद्ध एवं सम्पन्न अर्थव्यवस्था विद्यमान थी। आर्थिक आधार पर समाज में श्रेणियाँ नहीं थी। समतामूलक, श्रम की प्रतिष्ठाकारक और सांस्कृतिक जीवन के लिए उपादेय वह अर्थव्यवस्था हमें आज भी स्पृहणीय प्रतीत होती है, जिसमें धनोपार्जन को केवल शुद्ध, विधिसम्मत और समाज के द्वारा अनुमोदित प्रणाली ही प्रशस्त समझी जाती थी। अग्नि से प्रार्थना करते हुये ऋषि-कवि यही कामना करते थे— तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः मागृधः कस्यस्विद्धनम्। अर्थात् हम किसी अन्य के धन की कामना न करें, यह भाव भी इसमें मुखरित है। ६. राष्ट्रीयएकता एवम् अखण्डता को अथर्ववेद का प्रदेय : वैदिक काल के सभी ग्रन्थों में राष्ट्र की कभी भी अवहेलना नहीं की गई है। पृथिवी और मातृभूमि को जितना सम्माननीय स्थान प्रदान किया गया है, देशभक्ति और देशरक्षा के लिए भी पूर्ण वर्णन उपलब्ध है। 'पृथिवी-सूक्त' में ऋषि आर्थवण ने ६३ मंत्रों में 'मातृस्वरूपिणी-भूमि' को समग्र पार्थिव-पदार्थों की जननी और जीवों की पोषिका के रूप में उद्घोषित किया है तथा प्रजा को समस्त बुराईयों, क्लेशों तथा अनर्थों से बचाने तथा सुख-सम्पत्ति की वृष्टि करने की कामना की गई है।


१. अथर्ववेद ४/७/६

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

षष्ठ अध्याय                         265 मा॒ता भूमिः॑ पु॒त्रो अ॒हं पृ॑थि॒व्याः।$^१$ अर्थात् 'मेरी माता भूमि है और मैं मातृभूमि का पुत्र हूँ, बड़ी ही उदात्त भावना है और इस पुत्र होने की भावना से ही राष्ट्र में अपनी मातृभूमि के प्रति प्रेम का बीज स्फुरित होता है। राष्ट्र (मातृभूमि) के सभी पुत्र इसकी रक्षा के लिए, इसकी अखण्डता के लिए सदैव ही तत्पर रहते हैं। उनकी यह कामना रहती है कि इस पृथिवी पर सभी एक परिवार के सदस्यों की तरह रहें, उनमें आपस में विद्वेष आदि भावना को कोई स्थान नहीं होना चाहिये। जिस मातृभूमि के गर्भ से उत्पन्न वस्तुएँ हमें जीवन देती है, इसमें व्याप्त 'पंचतत्त्व' ही हमें निर्मित करते हैं। वह राष्ट्र जो हमें संरक्षण, सुरक्षा देता है, जिसके विद्वान् एवं योग्य राजा का हम संवरण करते हैं, उसके प्रति निष्ठा होनी चाहिये-   यस्ते॑ ग॒न्धः पु॒रु॑षे॒षु स्त्री॒षु पुंसु॒ भगो॑ रु॒चिः॑।   यो अश्वे॑षु वी॒रेषु॒ यो मृ॒गेषू॒त ह॒स्तिषु॑।   क॒न्यायां॒ वर्चो॒ यद् भूमे॒ तेना॒स्माँ अपि॒ सं सृ॑ज॒ मा नो॑ द्वि॒क्षत॒ कश्च॒न॥$^२$ अर्थात् हे मातृभूमि! हम सबकी उत्पत्ति-स्थली पृथिवी! तेरी जो गंध (अंश) स्त्री व पुरुषों में सौभाग्यमय कान्ति रूप से विद्यमान है, जो अश्वों में, वीर्यवान् पुरुषों में, जो मृगों में और जो हस्तियों में है, जो वर्चस (कान्तिमया भाग) कन्याकुमारी में विद्यमान है, उस गंध और कान्ति से हमें भी युक्त कर और हमें आपस में विद्वेष की भावना से मुक्त कर। राष्ट्र के लिए एक भयमुक्त समाज, आपस में वैर व वैमनस्य का अभाव, ज्येष्ठता और कनिष्ठता की भावना की अनुपस्थिति ही एक सबल आधार होता है और यह स्वतंत्र राष्ट्र के नागिरकों का प्रमुख कर्तव्य होता है कि वह सत्य का आश्रय लेकर ही जीवन-यापन करें तभी उन्हें वैभव की प्राप्ति होगी एवं सर्वोत्कृष्ट स्वतंत्र राष्ट्र का निर्माण होना संभव है। इस बारे में निम्न मंत्र में उल्लिखित है-   यार्णवेऽधि॑ स॒लिल॒मग्र॑ आसी॒द् यां मा॒याभि॒रन्वचर॑न् मनी॒षिण॑ः।   यस्या॒ हृद॑यं प॒र॒मे व्योम॒न्त्स॒त्येनावा॑त॒ममृ॑तं पृथि॒व्याः।   सा नो॒ भूमि॒स्त्विषिं॒ बलं॑ रा॒ष्ट्रे द॑धातूत्त॒मे॥$^३$

१. अथर्ववेद १२/१/१२ २. अथर्ववेद १२/१/२५ ३. अथर्ववेद १२/१/८

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 266 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अर्थात् सर्वोत्तम राष्ट्र के रूप में हमारी मातृभूमि हमारे व्यक्तिगत एवं सामूहिक पराक्रम एवं उत्कर्ष का धारक हो। इस प्रकार 'भूमि' या 'उत्तम राष्ट्र' पर्यायवाची शब्द माने गये हैं। इस प्रकार से राष्ट्र की सर्वोच्चता की कामना की गई है। इस भावना से ही राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता को बल मिलता है। यस्यां गायन्ति नृत्यन्ति भूम्यां मर्त्या व्यैलबाः। युध्यन्ते यस्यामाक्रन्दो यस्यां वदति दुन्दुभिः। सा नो भूमिः प्र णुदतां सपत्नानसपत्नं मां पृथिवी कृणोतु॥१ अर्थात् कर्तव्यपालन करने से व्यक्ति एक अनुपम आनन्द की अनुभूति करता है। जो राष्ट्रभक्त समझकर मातृभूमि की रक्षा करते हैं, उन्हें अनुपम आत्मतुष्टि की अनुभूति होती है। इसीलिए वीरों से वह अपेक्षा की जाती है कि जब कभी शत्रु मातृभूमि पर आक्रमण कर उन पर विपत्ति लाने का प्रयास करेगा तो वे अपनी पूर्ण शक्ति एवं सामर्थ्य से विरोध करेंगे और अपने देश को संकट से मुक्त रखेंगे। अथर्ववेद में राष्ट्रीय एकता और अखण्डता के प्रति राष्ट्रवासियों के कर्तव्यों एवं उनके प्रति श्रद्धा रखने के बारे में वर्णन किया गया है। इसके लिए बारहवें काण्ड में पृथिवी सूक्त में विशेष रूप से वर्णन किया गया है। यदि राष्ट्र में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के शत्रु उत्पन्न हो जायें तो उन्हें विनष्ट करने के लिए सेना को कुशल संचालन से उनके नाश के लिए प्रयास करना चाहिये, ताकि भविष्य में इस राष्ट्र के अहित के लिए कोई मन में विचार भी न ला सकें। व्याकूतय एषामितार्थो चित्तानि मुह्यत। अथो यदद्यैषां हृदि तदैषां परि निर्जहि॥२ देश में व्याप्त शत्रुता का भाव प्रतिकूल दिशा में गमन करें अर्थात् उनकी भावनाएँ परिवर्तित हो जायें। वे राष्ट्र हित में सोचने लगे और अपने कर्तव्यों का अहसास करें। राष्ट्रवासियों के लिए शुभ एवं अनुकूल मार्ग प्रशस्त किया गया है। १. अथर्ववेद १२/१/४१ २. अथर्ववेद ३/२/४ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri सप्तम अध्याय ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद् में राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता का अनुशीलन १. ब्राह्मण, आरण्यक एवम् उपनिषद् में निरूपित राष्ट्रीयएकता एवम् अखण्डता के आधारतत्त्व : राष्ट्र की महत्ता को किसी भी काल में अस्वीकार नहीं किया जा सकता है। मनुष्य के अस्तित्व और उसके पारिवारिक, सामाजिक और राजनीतिक जीवन को उससे पृथक् करके वर्णित नहीं किया जा सकता है। दैवशासन में भी इन्द्र के राजा होने का और उसके शासित इन्द्रलोक का जिस तरह वर्णन प्राप्त होता है, ठीक उसी प्रकार मानव समूहों में मानवश्रेष्ठ का राजा और शेष लोगों के शासित होने का उल्लेख सभी ग्रन्थों में प्राप्त होता है। आपस में हिल मिलकर रहने का सन्देश भी सभी युगों में गूँजता रहा है क्योंकि इसमें निहित प्रेम की भावना ही उस संसार का आधारतत्त्व है। राष्ट्र में व्याप्त यही भावना राष्ट्रीय एकता और अखण्डता को बल प्रदान करती है। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै।१ अर्थात् हम जीवन भर परस्पर स्नेह के सूत्र में बँधे रहें और कभी एक दूसरे से परस्पर द्वेष न करें। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और इस समाज में सहयोग, प्रेम और आपसी समझदारी के साथ ही जीवन व्यतीत करने का सन्देश प्रदान किया गया है जिससे कि एक राष्ट्र की जड़े और मजबूत होती हैं, जिन पर प्रहार करने का साहस कोई भी शत्रु नहीं कर सकता। राष्ट्र के निवासियों में भी सभी श्रेणी के लोग प्राप्त होते हैं जिनमें कुछ स्वार्थी होते हैं। उन्हें निजस्वार्थ हेतु ही विचार करना होता है और अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए प्रयास करते हैं। जो व्यक्ति प्रबुद्ध होते हैं वे सदैव ही परम कल्याण की कामना करते हैं। १. कठोपनिषद् CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 268 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तौ संपरीत्य विविनक्ति धीरः। श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद्वृणीते॥१ अर्थात् मनुष्य को जीवन में श्रेय और प्रेय दोनों ही प्राप्त होते हैं लेकिन वह अपनी बुद्धि और विवेक के अनुरूप ही उनको ग्रहण करता है। बुद्धिमान् श्रेय को चुनता है और अल्प बुद्धि वाला प्रेय की ओर आकर्षित होता है। इस मंत्र के यदि आन्तरिक भाव की ओर देखें तो ज्ञात होता है कि संसार में व्यक्ति को 'स्व' एवं 'पर' दोनों का ही विवेकपूर्ण चुनाव करना पड़ता है। बुद्धिमान् व्यक्ति श्रेय का चुनाव इसलिए करता है क्योंकि वह परम कल्याण का दाता है। उसमें सम्पूर्ण विश्व का कल्याण निहित है- 'तैत्तिरीय ब्राह्मण' में इसी प्रकार का उल्लेख किया गया है जहाँ पर राष्ट्र को धारण करने की प्रशंसा की गई है :- सविता राष्ट्रं राष्ट्रं राष्ट्रपति राष्ट्रमस्मिन् मयि दधतु। अर्थात् “सविता, राष्ट्र और राष्ट्रपति है। इस यज्ञ में मुझ में राष्ट्र धारण करा दें।” राष्ट्र को उस समय भी सम्माननीय स्थान प्राप्त था और उसको सब लोग दृढ़ एवं शक्तिशाली बनाने की कामना रखते थे। राष्ट्र के उत्थान की बात हर स्थान पर दुहरायी गई है ताकि राष्ट्र का अस्तित्व सदैव सुरक्षित रहे और राष्ट्र के अस्तित्व से ही व्यक्ति का अस्तित्व बना हुआ है। आ त्वाहार्षमन्तर भू ध्रुर्व स्तिष्ठा विचाचलिः। विश स्त्वा सर्वा वाञ्छन्तु मा त्वद्राष्ट्रमधिभ्रशत्॥२ अर्थात् 'हे अग्ने! मैं तुमको लाया हूँ, तुम भीतर हो (नाभि के ऊपर), (शरीर मध्य में) तुम चलन रहित हो, स्थिर बैठो। सारी प्रजा तुम्हें चाहे। राष्ट्र अर्थात् जनपद समूह तुमसे गिरे नहीं।' इस मंत्र के द्वारा राष्ट्र की अखण्डता का भाव प्रस्तुत होता है, उसकी एकता की भावना बलवती होती है। राष्ट्र सुदृढ़ रहे, निश्चल रहे, यही कामना उस समय भी की गई थी। प्रजा का सुन्दर ढंग से परिपालन, उसके लिए जीवन की सभी सुविधाओं को प्रस्तुत करना और उनमें सुरक्षा की भावना की जागृति, यह एक राष्ट्र के धारक के लिए अत्यन्त आवश्यक है। यह तत्त्व जीवन और जीव के लिए बहुत आवश्यक है। १. कठोपनिषद् १/२/२ २. वाजसनेही संहिता- १२/११ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri सप्तम अध्याय 269 प्रजां च परिपातु नः१ इसमें संवत्सर से प्रार्थना है कि वह यज्ञ को धारण करें और प्रजा का परिपालन करें। राजा के लिए प्रजा का परिपालन प्रथम कर्तव्य माना गया है। उसे सन्तति समझकर उसका पालन करने का आदेश दिया जाता है। जो कामनायें माता- पिता के मन में अपने पुत्र व पुत्रियों के प्रति हों, राजा में प्रजा के प्रति हों तभी राष्ट्र या राष्ट्रपति का सम्मान प्रजा की दृष्टि में बना रहता है। 'ऐतरेय ब्राह्मण' में राजा के लिए पुरोहित का विशेष महत्त्व निरूपित किया गया है कि राजा को पुरोहित की नियुक्ति अवश्य ही करनी चाहिये। पुरोहित का कार्य राजा को नीति व कूटनीति सम्बन्धी सलाह देने का होता है और एक राजा सम्पूर्ण राष्ट्र का शासन स्वविवेक के आधार पर संचालित नहीं कर सकता है। अतः राष्ट्र का विकास, जन-जीवन की खुशी और उन्नति तभी संभव है जबकि प्रबुद्ध व्यक्ति उसका सलाहकार हो। पुरोहित को आह्वनीयाग्नि तुल्य माना गया है और उसे प्रजा का प्रतिनिधि माना जाता है वह राजा से प्रतिज्ञा कराता है कि वह अपनी प्रजा से कभी द्रोह नहीं करेगा। राजकीय-जीवन में कर्मयोग का पालन करना ही सर्वोत्तम आदर्श है। राजकार्य में 'विशः' का महत्त्व बतलाते हुए शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है- श्रीर्वैराष्ट्रम्। ………………..श्रीवैंराष्ट्रस्य भारः। ………….. श्रीर्वैराष्ट्रस्य मध्यम। …… क्षेमो वै राष्ट्रस्य शीतम। विड्वै गमो पसो राष्ट्रमेव। विश्याहन्ति तस्माद् राष्ट्रो विशं धातुकः। विशमेव राष्ट्रायाद्यां करोति तस्माद्राष्ट्री विशमत्ति न पुष्टं पशु मन्यत इति।२ अर्थात् 'श्री' का अर्थ कुछ भाष्यकारों ने विद्यादि उत्तम गुणों से युक्त नीति किया है। यदि शक्ति का केन्द्रीकरण होता है तो प्रजा का शोषण एवं उत्पीड़न होता है। जैसे मांसाहारी मनुष्य पशु को देखकर उसको मारने की इच्छा करता है, उसी प्रकार अधिनायक (राजा) प्रजा के उत्कर्ष का हनन करता है और स्वेच्छाचारी होता है। अतः समष्टि के कल्याण के लिए आवश्यक है कि जनता की सहमति ही राजा का आधार बने। आज के लोकतंत्र की रूपरेखा उसी समय निश्चित कर दी गई थी, राष्ट्र का आज का स्वरूप कोई नया नहीं है बल्कि वही आधारतत्त्व लिये हुए हैं। आज भी प्रजा के सम्यक् पालन के लिए समुचित राष्ट्रपति और प्रजा के प्रतिनिधि होने चाहिये ताकि सम्पूर्ण रूप से उन्हें भी स्थान मिल सके। जब प्रजा का सम्यक् पालन १. वाजसनेही संहिता- २६/१४ २. शतपथ ब्राह्मण १३/२/९/२-८ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 270 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता होता है तब 'ऐतरेय ब्राह्मण' के इन शब्दों का उल्लेख आवश्यक हो जाता है— ब्रह्मण एवं तद्यत्र वशमेति तपन्न वै ब्राह्मणः क्षत्रं वशमेति तद्राष्ट्रं समृद्धं तद्वीरवदाहस्मिन् वीरो जायते।¹ ऐतरेय ब्राह्मण में 'जनपद' शब्द देश के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। इन्हीं जनपदों को मिलाकर राष्ट्र का निर्माण हुआ है। इन्हीं जनपदों को मिलाकर बना हुआ राष्ट्र संगठित होता है और इस संगठन में एकता होती है। राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में जब देखते हैं तो हमारे ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् ग्रन्थों से इस बात का पूर्ण ज्ञान होता है कि इसके आधार तत्त्व इसमें समाहित हैं। २. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषदों में समाजदर्शन का अनुशीलन : समाज मानव जीवन की छवि प्रस्तुत करने का एक सफल मंच है जिन्हें वह अपने जीवन में अपनाता चला आ रहा है और जिस तरह का जीवन वह स्वयं जी रहा है। सामाजिक, आध्यात्मिक एवं नैतिक मूल्यों का जो संयुक्त रूप होता है, वह है उसका समाज दर्शन। छोटी-छोटी बातों में निहित आदर्श ही उनके दर्शन का स्पष्ट स्वरूप प्रदान करता है। वैसे तो सम्पूर्ण वैदिक काल के समाज-दर्शन का आधार एक ही रहा है, उसके कुछ कर्मों और अधिकारों में परिवर्तन अवश्य ही होता रहा है। वैदिक काल में चार वर्णों में समाज का वर्गीकरण सर्वमान्य रहा है और उसके बारे में बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्यार्थ) में स्पष्ट रूप से उल्लिखित है— तस्मात् क्षत्रात्परं नास्ति तस्माद्ब्राह्मणः क्षत्रियमधस्तादुपास्ते राजसूये क्षत्र एव तद्यशो दधाति सैषा क्षत्रस्य योनिर्यद्ब्रह्म।² अर्थात् ब्रह्म ने इस वर्ण व्यवस्था को सम्पन्न किया है। उसके आधार स्वरूप देवताओं में क्षत्रिय माने जाने वाले इन्द्र, वरुण, सोम, रुद्र, मेघ, यम और ईशानादि हैं, उनके अनुसार क्षत्रिय जाति को उत्पन्न किया है और क्षत्रियों को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। उसके अनुसार राजसूय यज्ञ में ब्राह्मण नीचे बैठकर क्षत्रिय की उपासना करता है, वह क्षत्रिय में ही अपने यश को स्थापित करता है। चूँकि ब्राह्मण की उत्पत्ति ब्रह्म से मानी जाती है अतः वह श्रेष्ठतम माना गया है और वह अपने कर्मों को १. एतरेय ब्राह्मण ८/६/९ २. बृहदारण्यकोपनिषद् १/४/११ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri सप्तम अध्याय 271 स्वयं ही निश्चित करता है। ब्राह्मण अपनी श्रेष्ठता क्षत्रिय में ही स्थापित करता है। क्षत्रियों की रचना के उपरान्त वैश्य जाति की उत्पत्ति के संदर्भ में उपनिषद् में वर्णित है— स नैव व्यभवत् स विशमसृजत यान्येतानि देवजातानि गणश आख्यान्ते वसवो रुद्रा आदित्या विश्वेदेवा मरुत इति॥१ अर्थात् वह (ब्रह्म) विभूति युक्त कर्म करने में समर्थ नहीं हुआ। उसने वैश्य जाति की रचना की। जो ये वसु, रुद्र, आदित्य, विश्वदेव और मरुत इत्यादि देवगण 'गणशः' कहे जाते हैं (उन्हें उत्पन्न किया)। क्षत्रिय जाति के द्वारा पराक्रम और शासन का कार्य तो सुचारु रूप से चलने लगा लेकिन धनोपार्जन हेतु कर्म करने में वे असमर्थ थे और इस कर्म के साधन भूतधन को उपार्जित करने के लिए वैश्य जाति की रचना की गई। इसके बाद भी कुछ कर्मों हेतु वर्ण का अभाव रहा, तब शूद्र वर्ण की उत्पत्ति की गई— स नैव व्यभवत्सशौद्रंवर्णमसृजत पूषणमियं वैपूषेयं हीदं सर्वं पुष्यति यदिदं किंच॥२ अर्थात् (फिर भी) वह विभूति युक्त कर्म करने में समर्थ नहीं हुआ। उसने शूद्र वर्ण की रचना की। पूषा शूद्रवर्ण है। यह पृथिवी ही पूषा है क्योंकि यह जो कुछ है, यही इसका पोषण करती है। इस प्रकार चारों वर्णों का विवरण प्राप्त होता है। पुरुषार्थ :- समाज की आधारशिला मानव जीवन के लिए पुरुषार्थ चतुष्ट्य में निहित कर दिया था। वह अपने सम्पूर्ण जीवन के कार्यकलापों का उपयोग इन्हीं चार पुरुषार्थों के लिए ही करता था और इनके पूर्ण होने से ही उसका जीवन सार्थक हो जाता था और परमपद मोक्ष की प्राप्ति में सफल हो जाता था। ब्राह्मण ग्रन्थों में “शाङ्खायन-ब्राह्मण” के अनुसार मानव जीवन चतुष्ट्यात्मक है। भाष्यकार विनायक के अनुसार³ 'चतुष्ट्य' शब्द पुरुषार्थों के लिए प्रयोग किया गया है और यह अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष की ओर लक्षित करता है। १. बृहदारण्यकोपनिषद् १/४/१२ २. बृहदारण्यकोपनिषद् १/४/१३ ३. शतपथ ब्राह्मण (वेंकटेश्वर प्रेस मुम्बई) से उपोद्घात् से। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 272 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता तैत्तिरीय ब्राह्मण में भी ब्रह्मचर्य के पालन पर विशेष बल दिया गया है। कर्म करना ही मनुष्य का धर्म होना चाहिए। इन कर्मों का आधार धर्म होना चाहिए। अधर्मपूर्ण कार्य व्यक्ति को दिशाहीन बना देते हैं। अर्थ की प्राप्ति के लिए प्रयत्न आवश्यक है, लेकिन धन प्राप्ति के बाद भी त्यागमय जीवन व्यतीत करना चाहिये, धन के प्रति प्रलोभित नहीं होना चाहिये— ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्चत् जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम्॥१ द्वितीय मंत्र में कर्मयोग के सिद्धान्त की प्रस्तुति है— कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः। एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे।। अर्थ और काम के प्रलोभनवश कोई भी कार्य करना आत्मघात के सदृश माना गया है। अर्थ के मोह से व्यक्ति कभी मुक्त नहीं हो सकता है और उससे कभी तृप्त भी नहीं होता है। इसीलिये अर्थ को आवश्यक समझते हुए ही अर्जित करना श्रेयस्कर है। संग्रह की एषणा ही उसे कुमति प्रदान करती है। इसीलिये— श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसोवृणीते। प्रेयो मन्दोयोग क्षेमाद् वृणीते॥२ अर्थात् मन्दबुद्धि भले ही प्रेय (लौकिक भोगों) की आकांक्षा करे, लेकिन प्रबुद्ध व्यक्ति श्रेय (परम कल्याण) की ही इच्छा करता है। उनमें शेष तीन पुरुषार्थों की पूर्ति के बाद मोक्ष के लिए प्रयत्नशील हो जाना चाहिये अर्थात् ईश्वर आराधना में लीन होकर मोक्ष प्राप्त करना चाहिये। आश्रम व्यवस्था :- उपनिषदों के अनुसार एक व्यक्ति को १०० वर्ष के जीवन की कामना करनी चाहिये और उन सौ वर्ष के जीवन को पुरुषार्थ के अनुसार ही चार भागों में विभक्त कर देना चाहिये और यह चार भाग— ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यास आश्रम के रूप में जाने जाते हैं। शाङ्खायन ब्राह्मण में पुरुष के शतायुष्य, उत्सवमयता, शताधिक-पराक्रमों और ऐन्द्रिक सामर्थ्य की आकांक्षा व्यक्त की गई है— शतायुर्वे पुरुषः।३ १. ईशोपनिषद् १. २. कठोपनिषद् १/२/२ ३. शाङ्खायन ब्राह्मण १७/७ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri सप्तम अध्याय 273 तथा— शतायुर्वै पुरुष शतपर्वा शतवीर्यः शतेन्द्रियः।१ इस प्रकार सौ वर्ष की आयु को २५-२५ वर्ष के चार वर्गों में विभाजित करके उनके लिये एक-एक आश्रम निश्चित किया गया है। 'छान्दोग्योपनिषद्' में धर्म के तीन आधारभूत स्कन्ध निरूपित हैं— “त्रयो धर्म स्कन्धा।”२ धर्म के प्रतिष्ठाकारक प्रथम स्कन्ध में यज्ञ, अध्ययन और दान सम्मिलित है। यह समस्त कार्य ब्रह्मचर्य आश्रम में सम्पन्न करने चाहिये। सम्पूर्ण निष्ठा के साथ यह कार्य ब्रह्मचारी को पूर्ण करने होते हैं। सम्पूर्ण वेद-पुराणों और समस्त ग्रन्थों से ज्ञान अर्जित कर ही उसे धर्म के अनुसार आचरण करना चाहिये। द्वितीय स्कन्ध तपोमूलक है और तृतीय स्कन्ध आचार्य कुलवासी ब्रह्मचारी की साधना से अनुस्यूत है। शाङ्कर-भाष्य से विदित होता है कि धर्म की प्रस्तुत स्कन्धत्रयी की योजना विविध आश्रमों के अनुरूप ही हुई है। इस दृष्टि से यज्ञ, अध्ययन और दान गृहस्थ साध्य है। तपस्या का अनुष्ठान सामान्यतः सभी के लिए कल्याणसाधन होने पर भी मुख्यतः वानप्रस्थियों के द्वारा ही विधेय है। उसके साथ ही संन्यास आश्रम में सभी सांसारिक, भौतिक सुखों एवं वस्तुओं को त्याग कर ईश्वर प्राप्ति के लिए तप करने का प्राविधान है और वही मोक्ष प्राप्त करने की अवस्था है। उस आश्रम में वह पुत्र, पत्नी, गृह सब त्याग देता है— मैत्रेयीति होवाच याज्ञवल्क्य उद्यास्यन्वा अरेऽहमस्मात्स्थानादस्मि हन्त तेऽनया कात्यायन्यान्तं करवाणीति॥३ अर्थात् “याज्ञवल्क्य ने अपनी पत्नी मैत्रेयी से कहा कि मैं इस गृहस्थाश्रम से ऊपर संन्यास आश्रम में जाने वाला हूँ। अतः मैं तुम्हारी अनुमति चाहता हूँ और अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति का बँटवारा कात्यायनी और तेरे मध्य कर दूँ।” इससे स्पष्ट होता है कि संन्यास आश्रम में व्यक्ति सभी भौतिक वस्तुओं को त्याग देता है और तन-मन से ईश्वर भक्ति में लीन हो जाना चाहता है। स्त्री की स्थिति : वैदिक युग में नारी को पूर्ण सम्मान प्राप्त था। वह पुरुषों से किसी भी दृष्टि से हीन नहीं समझी जाती थी। शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार उसे ब्रह्मचारियों की तरह ही प्राप्त था। तत्पश्चात् अपने अनुरूप वर से ही विवाह करने १. शाङ्खायन ब्राह्मण १८/१० २. छान्दोग्योपनिषद् २/३१/१ ३. बृहदारण्यकोपनिषद् १/४/१ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 274 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता की अनुमति प्रदान की गई थी। 'शतपथ ब्राह्मण' के अनुसार पत्नी को पुरुष की आत्मा का आधा भाग स्वीकार किया गया है- अर्धो हवा एष आत्मनो याज्जाया।१ स्त्री के बिना सामाजिक या धार्मिक अनुष्ठान की पूर्ति सम्भव नहीं थी। यही स्थिति नारी की स्थिति को व्यक्त करने के लिए ऐतरेय ब्राह्मण से ज्ञात होता है कि उस समय समाज में स्त्रियों को विशिष्ट स्थान प्राप्त था। कहा गया है कि पत्नी को प्राप्त करके ही पुरुष पूर्ण होता है- पुरुषो जायां वित्त्वा कृत्स्नतमिवात्मानं मन्यते।२ इस प्रकार उपनिषद्, ब्राह्मण और आरण्यक में प्रस्तुत सामाजिक दर्शन में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के लिए एक ऐसा वातावरण प्रस्तुत होता है जिससे एक सुदृढ़ राष्ट्र का निर्माण होता है। हमारे वैदिक वाङ्मय ने इस देश की मिट्टी में, हवा में और वातावरण में अपने मंत्रों, ऋचाओं से एकता के सूत्र में बद्ध रहने का वेदमंत्र प्रदान किया है। ३. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषदों के राजदर्शन का अनुशीलन : राजनीति मानवसमाज का अपरिहार्य अंग है। वैदिक युग में एक सुव्यवस्थित, कल्याणकेन्द्रित और सर्वाभिमुखी राजनैतिक व्यवस्था दिखलाई देती है। ऐतरेय ब्राह्मण में 'जनपद' शब्द देश के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। इन्हीं जनपदों को मिलाकर राष्ट्र का निर्माण हुआ था। ब्राह्मण ग्रन्थों में राज्यों की समृद्धि और सांस्कृतिक दृष्टि से उन्नति का विशेष उल्लेख है। इस बात से यह ज्ञात होता है कि राजा उस समय अपने दायित्वों को पूर्ण निष्ठा से निभाते थे। उपनिषदों में राज्यों के ब्रह्मवादियों एवं याज्ञिकों का भी विशेष उल्लेख मिलता है। ऐतरेय ब्राह्मण में जिन शासन प्रणालियों का उल्लेख प्राप्त होता है उनमें से कुछ राजतांत्रिक थीं और कुछ लोकतांत्रिक। इस ग्रन्थ के अन्तिम अध्याय में पुरोहित को विशेष महत्त्व प्रदान किया गया है। राजा द्वारा पुरोहित की नियुक्ति पर विशेष बल दिया गया है। पुरोहित राजा के कार्यों में सलाहकार की भूमिका निभाता है और चूँकि १. शतपथ ब्राह्मण ५/२१/१० २. ऐतरेय ब्राह्मण १/३/५ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri सप्तम अध्याय 275 वह प्रजा का प्रतिनिधि होता है, अतः वह प्रजा के अधिकारों एवं उनके हितों की रक्षा के लिए राजा को सदैव सलाह देता है। वह राजा से राज्याभिषेक के समय यह प्रतिज्ञा कराता है कि वह अपनी प्रजा से कभी द्रोह नही करेगा। ऐतरेय ब्राह्मण के एक उल्लेख से ज्ञात होता है कि राजसत्ता का उदय पारस्परिक अनुबन्ध से हुआ।१ उपनिषदों से ज्ञात होता है कि आरम्भ में इतना आत्मानुशासन था कि समाज में अपराधियों का अस्तित्व ही नहीं था। अतः राजसत्ता की कोई आवश्यकता नहीं की गई। धर्म ही समाज का नियंत्रक था। ऋग्वेदीय संज्ञान सूत्र के निम्नलिखित सुप्रसिद्ध मंत्र में, समिति में भाग लेने वालों के सन्दर्भ में वैचारिक एकता पर बल दिया गया है- स॒मा॒नो मन्त्रः॒ समि॑तिः समा॒नी स॒मानं॒ मनः॑ स॒ह चि॒त्तमे॑षाम्।२ वैचारिक एकता से ही राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता की कामना की जा सकती है। राष्ट्रीय सभा और समितियों का निर्माण जनप्रतिनिधियों के द्वारा होता है और उनकी वैचारिक एकता सम्पूर्ण राष्ट्र की एकता और अखण्डता का द्योतक है। ४. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषदों के धर्मदर्शन का अनुशीलन : समस्त वैदिककालीन ग्रंथों का आधार ही धर्म है। इसमें चाहे वर्णन राजनैतिक व्यवस्था का हो, सामाजिक व्यवस्था या कि आर्थिक व्यवस्था का- सभी का आधार धर्म ही रहा है। धर्मानुसार किया गया आचरण सदैव ही समाज द्वारा स्वीकृत होता है। उपनिषदों में धार्मिकअनुष्ठानों का प्रमुख प्रयोजन विश्वात्मभाव की अनुभूति कराना है। याग के समान अन्य धर्मानुष्ठानों की मूल प्रेरणा आनन्द प्राप्ति है और वह अन्तःकरण की व्यापकता तथा उदारता में निहित है। एतदर्थ छान्दोग्योपनिषद् में भूमा शब्द का प्रयोग है, जो स्वयं सुख स्वरूप है- यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति। ३ 'भूमा' का अभिप्राय सबको अपना समझना है। ऊपर-नीचे, आगे- पीछे, दायें-बायें सर्वत्र आत्मभाव की अनुभूति ही 'भूमा' है। १. ऐतरेय ब्राह्मण १/१४ २. ऋग्वेद संहिता १०/१९१/३ ३. छान्दोग्योपनिषद् ७/२३/१ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 276 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता छान्दोग्य-उपनिषद् में बहुविध उपासना में विद्या, श्रद्धा और योग की आवश्यकता होती है। यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवतीति।¹ इसके साथ ही मनन-चिन्तन, विज्ञान और निष्ठा की अपरिहार्यता भी प्रदर्शित है। अभिमत-विशेष का प्रमाद रहित होकर ध्यान करना ही उपासना है- ध्यायात् न प्रमत्तः।² धर्म के बारे में बृहदारण्यकोपनिषद् में इस प्रकार वर्णित किया गया है-- अयं धर्मः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्धर्मे तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं धर्मस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदꣳ सर्वम्॥³ अर्थात् यह धर्म समस्त भूतों का मधु है तथा समस्त भूत इस धर्म के मधु है। इस धर्म में जो यह तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म धर्मसम्बन्धी तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है'। 'यह अमृत है', 'यह ब्रह्म है', 'यह सत्य है'। कठोपनिषद् में आत्मज्ञान के लिए तर्क, प्रवचन एवं बुद्धिजन्य उपायों को अपर्याप्त समझा गया है। इसके लिए अपने को सुपात्र बनाना पड़ता है। ताकि आत्मतत्त्व स्वयं वरण कर सकें। जो मनुष्य विज्ञान (विवेक) सारथि से सम्पन्न और मनरूप लगाम वाला है, वही परम पद प्राप्त करता है। कठोपनिषद् सावधान करता है कि हम अज्ञाननिद्रा से उठें, जागें और श्रेष्ठ पुरुषों के समीप जाकर ज्ञान प्राप्त करें। सम्पूर्ण ग्रन्थों में धर्माचरण का उपदेश दिया गया है। ईश्वर की प्राप्ति ही एक मात्र उद्देश्य मानकर मानव जीवन में सदैव सत्याचरण करके परम पद की प्राप्ति करें। ५. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषदों के आचारदर्शन, शिक्षादर्शन तथा अर्थदर्शन का अनुशीलन : राष्ट्र का निर्माण मनुष्यों के द्वारा होता है और मनुष्यों के चारित्रिक बल, नैतिक मूल्य एवं आध्यात्मिक विचारधारा से ही राष्ट्र की दृढ़ता में शक्ति का समावेश होता है। हमारे धर्म ग्रन्थ, वैदिक वाङ्ग्मय ही हमें नैतिक मूल्यों, जीवन आदर्शों और आध्यात्मिक आधारों से अवगत कराते हैं। १. छान्दोग्योपनिषद् १/१/१० २. छान्दोग्योपनिषद् १/३/१२ ३. बृहदारण्यकोपनिषद् २/५/११ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri सप्तम अध्याय 277 ऐतरेय ब्राह्मण में नैतिक मूल्यों और उदात्त आचार-व्यवहार के सिद्धान्तों पर विशेष बल दिया गया है। प्रथम अध्याय के षष्ठ खण्ड में वर्णित है कि दीक्षित यजमान को सत्य ही बोलना चाहिए- ऋतं वाव दीक्षा सत्यं दीक्षा तस्माद्दीक्षितेन सत्यमेव वदितव्यम्। शाङ्ख्यायनब्राह्मण में भी मानवीय आचार के नियामक और निर्देशक तत्त्व बाहुल्य में उपलब्ध होते हैं। व्यक्ति के लिए वाणी परम उपादेय सिद्ध होती है। इस बारे में शाङ्ख्यायन ब्राह्मणकार का कथन है- अथो वाग्वै सार्पराज्ञी। वाग्वि सर्प तो राज्ञी।१ शतपथ ब्राह्मण में श्रम एवं तप का महत्त्व पौनः पुन्येन प्रदर्शित है।२ अनृतभाषी को अमेध्य कहा गया है- अमेध्यों वै पुरुषो यदनृतं वदति।३ तैत्तिरीय ब्राह्मण के अनुसार मनुष्य का आचरण देवों के समान होना चाहिये- इति देवा अकुर्वत। इत्यु वै मनुष्याः कुर्वति।४ सत्यभाषण, वाणी की मधुरता, तपोमय जीवन, अतिथि सत्कार, संगठनशीलता, सम्पत्ति के परोपकार हेतु विनियोग, मांस-भक्षण से दूर रहने तथा ब्रह्मचर्य के पालन पर विशेष बल दिया गया है। 'अहिताग्नि-व्यक्ति' को असत्य कदापि नहीं बोलना चाहिए क्योंकि तेजोमयता सत्य से ही है- 'अहिताग्निः न अनृतं वदेत।' तपोमय-जीवन, 'तैत्तिरीय-ब्राह्मण' में प्रतिपादित, द्वितीय महनीय जीवन मूल्य है- तपस्या से देवों ने उच्च स्थिति प्राप्त की, ऋषियों ने स्वर्गिक सुख पाया और शत्रुओं का विनाश किया- तपसा देवा देवतामग्रआयन् तपसृषयः स्वर्गमन्वविन्दन्। तपसा सपत्नान् प्रणुदोमशतीः।५ गोपथ ब्राह्मण के अनुसार मन का बहुत महत्त्व है। आदमी मन से जो सोचता है, वही होता है- १. कौषीतकि ब्राह्मण २६/४ २. शतपथ ब्राह्मण १४/१/१/१ ३. शतपथ ब्राह्मण १/१/१ ४. तैत्तिरीय ब्राह्मण १/५/९/४ ५. तैत्तिरीय ब्राह्मण ३/१२/३/१ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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278 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता स मनसा ध्यायेद् यद् वा अहं किञ्च मनसा ध्यास्यामि तदैव या तद् भविष्यति। यद्धस्म तथैव भवति।१ ब्राह्मणकार ने आधे-अधूरेपन से कार्य करने से मना किया है। द्वितीय पाठक में ब्रह्मचारी के कर्तव्यों का विस्तार से निरूपण किया गया है। ऐन्द्रिय रागों एवं आकर्षणों से बचने की सलाह दी गई है। स्त्री सम्पर्क, दूसरों को कष्ट पहुँचाना, ऊँचे आसन पर बैठना उसके लिए वर्जित बताया गया है। संरक्षित धर्म ही उसकी रक्षा करता है— 'धर्मो हैनं गुप्तो गोपायति' ।२ संभवतः यही गोपथ ब्राह्मणोक्ति सूक्ति लौकिक संस्कृत में 'धर्मो रक्षितः' में परिणत हो गई। आचार की दृष्टि से गोपथ ब्राह्मण का स्तर अत्यन्त उच्च और उदात्त है। आरण्यक-साहित्य भी नैतिकता और आचार-दर्शन की दृष्टि से मानवीय मानस के ऊर्ध्वारोहण में परम सहायक है। वैदिकवाङ्ग्मय से प्राप्त शिक्षादर्शन बहुत ही महत्त्वपूर्ण था। उस काल की शिक्षा का उद्देश्य मात्र ज्ञान प्राप्त करना नहीं था अपितु उसे जीवन में आत्मसात कर लेना ही ब्रह्मचारी की शिक्षा परीक्षा और सफलता मानी जाती थी। शिक्षा काल के दौरान ब्रह्मचर्य का पालन इस बात का द्योतक है कि सम्पूर्ण इन्द्रियों एवं मस्तिष्क को शिक्षा ग्रहण करने के लिए केन्द्रित करके अध्ययन कार्य सम्पन्न करना। इसी तरह से गुरु भी अपने शिष्यों की सफलता को अपने शिक्षा दान की सफलता मानता था। शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य मानव की प्राकृतिक शक्तियों को सुविकसित कर उसे जीवन की समस्याओं को सुलझाने में समर्थ बनाना था। तपस्या के अनुष्ठानपूर्वक वेद और सत्य का ज्ञान प्राप्त करना ही विद्यार्थी की चर्चा थी जिससे वह मृत्यु तक पर विजय प्राप्त कर सके। तत्कालीन शिक्षादर्शन स्मृति, धारणा और बोध तीनों पर आश्रित थी। ज्ञान प्राप्त करने की अदम्य जिज्ञासा से ओतप्रोत उदाहरण नचिकेता है, जिन्होंने यम सरीखे गुरु के पास जाकर मृत्यु का रहस्य सीखना चाहा था और यमराज द्वारा विविध प्रलोभनों से डिगाये जाने पर भी वह सर्वथा अविचलित रहा। तब यम ने स्वयं नचिकेता की पात्रता को स्वीकार करते हुये कहा— स त्वं प्रियान्प्रियरूपांश्च कामानभिध्यायन्नचिकेतोऽत्यस्त्राक्षीः। नैतां सृङ्कां वित्तमयीमवाप्तो यस्यां मज्जन्ति बहवो मनुष्याः॥३ १. गोपथ ब्राह्मण १/१/९ २. गोपथ ब्राह्मण १/२/४ ३. कठोपनिषद् १/२/३

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सप्तम अध्याय 279 अर्थात् 'यमराज कहते हैं- हे नचिकेता! तुम्हारी परीक्षा करके मैंने अच्छी तरह देख लिया कि तुम बड़े बुद्धिमान्, विवेकी और वैराग्यसम्पन्न हो। अपने को बहुत बड़े चतुर, विवेकी और तार्किक मानने वाले लोग भी जिस चमक-दमक वाली सम्पत्ति के मोहजाल में फँस जाया करते हैं, उसे भी तुमने स्वीकार नहीं किया। मैंने बड़ी ही लुभावनी भाषा में तुम्हें बार-बार पुत्र, पौत्र, हाथी, घोड़े, गौयें, धन, सम्पत्ति, भूमि आदि अनेकों दुष्प्राप्य और लोभनीय भोगों का प्रलोभन दिया। इतना ही नहीं स्वर्ग के दिव्य भोगों और अप्रतिम सुन्दरी स्वर्गीय रमणियों के चिर-भोग सुख का लालच दिया, किन्तु तुमने सहज ही उन सबकी उपेक्षा कर दी। अतः तुम अवश्य ही परमात्मतत्त्व का श्रवण करने के सर्वोत्तम अधिकारी हो।' इस प्रकार की शिक्षा व्यक्ति को एक आदर्श नागरिक बना सकती है। सत्याचरण, धर्माचरण का पाठ सदैव ही पढाया गया है। ऐसे ही नागरिक राष्ट्रीयएकता और अखण्डता के लिए प्रतीक बन जाते हैं। ६. राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता को ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषदों का प्रदेय : राष्ट्र की भूमिका मानव जीवन में सर्वोपरि रही है। एक स्वतंत्र राष्ट्र, सुयोग्य शासक, धन-धान्य से परिपूर्ण भूमि और सुरक्षित देश की सीमाओं में ही नागरिक सुख-चैन की साँस लेकर, अपने समाज तथा राष्ट्र की प्रगति के बारे में विचार कर सकता है। एक व्यक्ति के लिए कर्मनिष्ठ जीवन और पुरुषार्थ साधन का महत्त्व सर्वाधिक होता है। उसके इन्हीं गुणों एवं कार्यों से राष्ट्र के प्रति योगदान की गणना होती है जिसके कारण राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता को किसी प्रत्यक्ष सम्बल की आवश्यकता अनुभव नहीं होती है, अपितु प्रत्येक मानव के जन्म से लेकर दी जाने वाली शिक्षा, वातावरण और सामाजिक तथा नैतिक मूल्यों से ही उसकी आधारशिला सुदृढ़ होती है। ऐतरेय ब्राह्मण में 'शुनःशेप' से सम्बद्ध आख्यान में दिया गया उपदेश व्यक्ति को कर्मण्यता की ओर ले जाता है। कहा गया है कि "बिना थके हुए 'श्री' नहीं मिलती।" जो विचरता है, उसके पैर पुष्पयुक्त होते हैं, उसकी आत्मा फल को उगाती और काटती है। भ्रमण के श्रम से उसकी समस्त पापराशि नष्ट हो जाती है। बैठे हुए व्यक्ति का भाग्य भी बैठ जाता है और सोते हुए व्यक्ति का सो जाता है और चलते हुए का चलता रहता है। चलते हुए ही मनुष्य स्वादिष्ट फल प्राप्त करता है। सूर्य के श्रम को देखो, जो चलते हुए कभी आलस्य नहीं करता-

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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 280 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता सूर्यस्य पस्य शृङ्गार यो न तन्द्रयते चरंश्चरैवेति।१ इस प्रकार के कर्मठ नागरिकों के जीवन सन्देश से राष्ट्र स्वयं सुदृढ़ होता है। राष्ट्र की शक्ति वैचारिक एकता एवं आपसी सद्भाव से ही बढ़ती है, शस्त्रों की होड़ और युद्ध के लिए तैयार सैनिकों से नहीं। हमारे ब्राह्मण ग्रन्थ, आरण्यक और उपनिषद् वास्तविक अर्थों में मनुष्य को मानवता से परिचित कराते हैं। राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता के लिए आवश्यक है कि सभी राष्ट्रवासी आपस में हिल-मिलकर रहें क्योंकि उसमें निहित प्रेम की भावना उन्हें एकता के सूत्र में बाँधती है। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै।।२ इस मंत्र का आशय आपस में स्नेहसूत्र में बँधे रहने तथा एक दूसरे कें प्रति कभी विद्वेष न रखने से है। यही भावना उन्हें एक दूसरे के सुख-दुःख में सहयोग देने के लिए प्रेरित करती है। 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की अवधारणा हमारे ऋषि और मुनियों द्वारा ही प्रदान की गई है। इस दिशा में ईशोपनिषद् के निम्न मंत्र से स्वयं की सर्वत्र व्यापकता मनुष्य को एक उच्च विचारधारा प्रदान करती है। जब व्यक्ति स्वयं को ही देखेगा तो उसके लिए घृणा और विद्वेष के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता है। यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति। सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते॥ सबसे अधिक समाज में व्यक्ति के भावों और कर्मों का महत्त्व होता है। चरित्रवान् नागरिकों से ही राष्ट्र की एकता और अखण्डता को बल प्राप्त होता है। यह ग्रन्थ ही हिन्दू संस्कृति के लिए बहुत ही आदरणीय है। उनका महत्त्व हर युग में समान ही रहा है। वे कारक, जो पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति के प्रभाव से पनपने लगे हैं, उनके प्रभाव को मुक्त कराने के लिए ही हमारी वैदिकग्रन्थों की उपादेयता बहुत अधिक बढ़ जाती है। हमारे ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् ग्रन्थों से प्राप्त शिक्षा ही आज भी देश को विश्व में एक महत्त्वपूर्ण स्थान दिलाये हुए है और पाश्चात्य विद्वान् भी इन ग्रन्थों के अध्ययन हेतु उत्सुक रहते हैं। हमारे राष्ट्र की अनेकता में एकता का आधार यही वैदिक साहित्य है। सभी के चारित्रिक बल का आधार यही है। विभिन्न भाषाओं की उपस्थिति के बाद भी वेदों, उपनिषदों, सभी का ज्ञान सभी विद्वानों को है और वे उन तथ्यों को स्वीकार करते हैं। १. ऐतरेय ब्राह्मण ३३/१ २. कठोपनिषद् CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri अष्टम अध्याय गृह्यसूत्र एवं धर्मसूत्र में राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता का अनुशीलन १. गृह्यसूत्र एवं धर्मसूत्र में निरूपित राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के आधार तत्त्व- वैदिकवाङ्मय की शाखाओं और प्रशाखाओं का अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि सम्पूर्ण साहित्य वेदों की सामग्री से निकली हुई ज्ञानसरिता की विभिन्न धाराएँ हैं। राष्ट्र व्यक्ति के जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण आधार है। यह सम्बन्ध भावात्मक है और पृथिवी से जुड़े हुए सम्बन्ध की आधारशिला है, जो उसके शारीरिक अस्तित्व से जुड़ा ही रहता है। राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में उस काल के आधारतत्त्व में सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति की धार्मिक मानसिकता है। राजनीति धर्म से कभी पृथक् हुई ही नहीं है। धर्म से पूर्ण राजनीति ही सर्वमान्य मानी जाती थी और जहाँ व्यक्ति धार्मिकता, नैतिकता से जुड़ा हुआ होता है, वहाँ इनकी मर्यादाओं का सम्मान करना उसका परम कर्तव्य होता है। ऐसे राष्ट्र में व्यक्ति की अपनी मातृभूमि के प्रति पूर्ण श्रद्धा और विश्वास होता है। इस वर्णन से हमें अपने गृह्यसूत्रों एवं धर्मसूत्रों का आधार वेद ग्रन्थों से ही प्राप्त होता है। सर्वोत्तम राष्ट्र के रूप में हम अपनी मातृभूमि को सर्वोत्तम उत्कर्ष के धारक के रूप में अवश्य ही देखना चाहते हैं। इस प्रकार मातृभूमि और राष्ट्र को पर्यायवाची माना गया है। तुलनात्मक योग्यता बताने के लिए संस्कृत में तरप् और तमप् प्रत्ययों का प्रयोग किया गया है और इस प्रकार 'उत्' से उत्तर, उत्तम-उच्चता की ये तीन श्रेणियाँ मानी गई हैं। हमारा राष्ट्र उत्तम हो अर्थात् संसार में विद्यमान समस्त राष्ट्रों में सर्वोत्तम एवं सर्वोत्कृष्ट हो, यह कामना की जाती है। इस भाव को निम्न मंत्र द्वारा स्पष्टतया देखा जा सकता है। यार्ण॒वेऽधि॑ स॒लिल॒मग्र॒ आसी॒द् यां मा॒याभि॑र॒न्वच॑रन् मनी॒षिण॑:। यस्या॒ हृद॑यं प॒र॒मे व्योम॒न्त्सत्ये॒नावृ॑त॒ममृ॑तं पृथि॒व्याः। सा नो॒ भूमि॒स्त्विषिं॒ बलं॑ रा॒ष्ट्रे द॑धातूत्त॒मे॥१ १. अथर्ववेद १२/१/८ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar