वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 289, कुल 353 में से
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षष्ठ अध्याय 261 करों। पूर्वउत्पन्न मार्ग विधाताओं, मार्ग दृष्टाओं का पूर्ण आत्मिक रूप से आदर करना चाहिये। समाज में रहकर एक दूसरे के प्रति प्रेम, दया व सहिष्णुता का व्यवहार करना ही मनुष्य का परम कर्तव्य होना चाहिए। अपने गुरुओं, आचार्यों, माता-पिता आदि पूज्य लोगों को आदर एवं श्रद्धा प्रदान करना ही व्यक्ति का स्वभाव होना चाहिए। जीवन के आदर्शों में इन बातों का समावेश होना ही चाहिए तभी मानव जीवन की सार्थकता संभव है। इस जीवन को सिर्फ भौतिक सुखों के लिये स्वार्थी बना देना उचित नहीं है और न ही किसी के प्रति द्वेष और ईर्ष्या की भावना को अपने मन में स्थान देना चाहिए। य॒माय॑ घृ॒तव॑त् पयो॒ राज्ञे॑ ह॒विर्जु॑होतन्। स नौ॑ जी॒वेष्वा य॑मे॒द् दीर्घमायुः प्र जी॒वसै॑॥१ अर्थात् हे पुरुषों! सर्वनियन्ता राजा के समान सब लोगों के राजा परमपिता परमेश्वर के लिए घृत से युक्त पुष्टिकारक दुग्ध और अन्न आदि अग्नि में समर्पित करें और साथ ही साथ उसके समान ही विद्वान् तेजस्वी ब्राह्मण को प्रदान करें। इस कार्य के करने से ही ईश्वर हमें और समस्त जीवों को दीर्घ जीवन प्रदान करेंगे और हमें अपने जीवन के लिए आवश्यक सभी पदार्थ प्रदान करेंगे। इस मंत्र के द्वारा यज्ञ कर्म पर विशेष जोर दिया गया है। होम का भी जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान है। जो भोजन ग्रहण किया जाय उसको ग्रहण करने से पूर्व उसे अग्नि को समर्पित करना ही ईश्वर को समर्पित करने के समान है और यह क्रिया आज भी उतनी ही मान्य है। वैदिक काल में शिक्षा का कार्य आचार्यों द्वारा किया जाता था। बालक को उपनयन संस्कार करने के पश्चात् गुरुकुल में शिक्षा हेतु भेजने का प्राविधान पाया जाता था। बालक के लिए गुरु पिता एवं गुरुपत्नी माता के समान सम्मानीय थे और जिस तरह पुत्र अपने माता-पिता की सेवा किया करता था, उसी प्रकार वह गुरु एवं गुरुपत्नी की सेवा भी करता था। इस काल में वह ब्रह्मचर्य का पालन करके शिक्षा एवं ज्ञान प्राप्त किया करता था और गुरु भी उन्हें अपनी सम्पूर्ण विद्याओं का ज्ञान करा देता था। अथर्ववेद में गुरु का शिष्यों के प्रति व्यवहार के बारे में इस मंत्र में उल्लेख प्राप्त होता है—
१. अथर्ववेद १८/२/३ एवं ऋग्वेद १०/१४/१४
CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar