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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 288

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 260 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता राष्ट्रवासियों का दायित्व भी उनके धर्म के द्वारा ही निश्चित होता है। राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता की रक्षा तभी संभव है जबकि वहाँ पर सर्वधर्म व समानता का भाव विद्यमान हो। वैदिक धर्म में किसी भी धर्म के प्रति अनादर या उपेक्षा का भाव नहीं बतलाया गया है। जहाँ प्राणि मात्र में ईश्वर का अंश देखा जाता हो, वहाँ धर्मगुरु या धर्म के प्रति सम्मान का होना निश्चित ही है। यही वह सब कारक है जो कि आज के सन्दर्भ में भी उतने ही महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। ५. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में अथर्ववेद के आचार- दर्शन, शिक्षादर्शन एवं अर्थदर्शन का अनुशीलन : वेदों के अनुशीलन से उस युग के आचार-दर्शन, शिक्षा-दर्शन एवं अर्थ-दर्शन सम्बन्धी धारणाओं का परिज्ञान हमें भली-भाँति होता है। आचार्यों ने अपने निरीक्षण में रखे ब्रह्मचर्य आश्रम में मानव को शिक्षा एवं आचार-विचारों का पूर्ण ज्ञान कराया। उन्हें इस जगत् में एक आदर्श मानव और राष्ट्रभक्त बनकर जीवन व्यतीत करने के योग्य बनाया था। इसके लिए अथर्ववेद में विभिन्न मंत्रों में उल्लिखित किया गया है— य॒माय॒ सोम॑ः पवते य॒माये॑ क्रियते ह॒विः। य॒मं ह॑ य॒ज्ञो ग॑च्छत्य॒ग्निदू॑तो॒ अरं॑कृतः॥१ अर्थात् यम और नियम व्यवस्था करने वाले राजा प्रभु के लिए सोमरस छाना जाता है। यम राजा के लिए ही हवि अर्थात् अन्न उत्पन्न किया जाता है। यज्ञ, राष्ट्र, ज्ञानवान् पुरुषों को अपना दूत प्रतिनिधि बनाकर और सुभूषित, सुशोभित होकर नियामक राजा की शरण में आता है। इसमें राष्ट्र के मानवों से भी यह अपेक्षा की जाती है कि वे यम व नियम को अंगीकार करके अपने जीवन का अंग बनायें। उसके द्वारा ही उनका जीवन सदाचारमय होगा। य॒माय॒ मधु॑मत्तमं जुहोता॒ प्र च॑ तिष्ठत। इ॒दं नम॒ ऋषि॑भ्यः पूर्व॒जेभ्यः॒ पूर्वे॑भ्यः पथि॒कृद्भ्य॑ः॥२ अर्थात् उस परमपिता परमेश्वर के लिए ही अति मधुर वचन का एक दूसरे के प्रति प्रयोग करना चाहिये। ऐसे ही सद्गुण लेकर ही एक दूसरे के देशों में प्रस्थान १. अथर्ववेद १८/२/१ एवं ऋग्वेद १०/१४/३ २. अथर्ववेद १८/२/२ एवं ऋग्वेद १०/१४/१५ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar