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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 287

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri षष्ठ अध्याय 259 वैदिक ऋषि भगवान् से प्रार्थना करता है कि वे मानव मात्र के लिए सुमति (सद्भावना) धारण करें, उन प्राणियों के लिए ही नहीं जिन्हें वह देखता है, प्रत्युत उनके लिए भी जो उसकी दृष्टि से ओझल हैं और जिन्हें वह नहीं देखता- यश्च पश्यामि यांश्च न। तेषु मा सुमति कृधि॥१ कितनी उदात्त भावना है यह। सामान्यतः हम उन्हीं के कल्याण की कामना करते हैं जिन्हें अपनी आँखों से देखते हैं, परन्तु वैदिक ऋषि यहीं तक अपनी प्रार्थना को सीमित नहीं रखता, अपितु वह अखिल विश्व में अदृष्ट प्राणियों के प्रति भी यही भावना रखने का विनम्र निवेदन करता है। यह भावना मनुष्य को आपस में बंधुत्व का भाव बनाये रखने में सहायक होती है। ऐसे व्यक्ति न तो स्वयं दूसरों के अहित की बात सोचते हैं और न ही ऐसी भावना को पैदा करने वाली स्थितियों को उत्पन्न होने देते हैं। सम्पूर्ण विश्व में सभी पदार्थों एवं द्रव्यों के परस्पर संयोग तथा एकत्र-धारण से जीवन का निर्वाह होता है। धर्म का उद्भव ही इस निर्वाह के लिए है। सूर्य, चन्द्र, तारा मण्डल और पृथ्वी आदि पदार्थ परस्पर के उपकार्य-उपकारक भाव से विधृत हैं और वे परमेश्वर द्वारा निर्दिष्ट अपने-अपने विशिष्ट कार्यों को सम्पन्न करते हैं। मानवों को अपने उत्कृष्ट-साधन के लिए समाज की अपेक्षा होती है। समाज का समाजत्व इसी में है कि वह विभिन्न प्रकार की मानस-वृत्तियों से युक्त एक-एक मानव की स्थिति का सामञ्जस्य करता है। यही कारण है कि धर्म में ही समाज की प्रतिष्ठा है। केवल मानवसमाज की ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण जगत् की प्रतिष्ठा धर्म में है। इस विषय में यह श्रुति वाक्य है- "धर्म विश्वस्य जगत् प्रतिष्ठा।" (धर्म ही विश्व का आश्रयभूत है)। वैदिक धर्म दर्शन है। व्यक्ति के लिए हर कदम पर धर्म निश्चित करता है कि राष्ट्र धर्म क्या है, राष्ट्र के नागरिकों का राष्ट्र के प्रति क्या धर्म है? जीवन का धर्म दर्शन क्या है? प्राणिभाव के प्रति दया, क्षमता और अहिंसा का भाव ही एक शांतिपूर्ण समाज की स्थापना में सहायक होता है। सभी सामाजिक सदस्यों में आपसी समझदारी व सहिष्णुता की भावना का समावेश उन्हें एक पारंपरिक सदस्यों की तरह व्यवहार करने की प्रेरणा प्रदान करता है। जिस धरती पर मनुष्य जन्म लेता है, उसका स्थान माँ के समान ही होता है और उसकी रक्षा का दायित्व भी उसके पुत्रों का ही होता है। मातृभूमि के प्रति १. अथर्ववेद १७/१७ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar