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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 286

258 वैदिक वाङ्गमय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता राष्ट्र के मंगल के लिए प्रयास करना ही वैदिक राजा का परम लक्ष्य है और राष्ट्र एवं मातृभूमि की सुरक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति तक देना उस राष्ट्र के नागरिकों का परमधर्म माना जाता है। उस काल में प्रजातंत्रमूलक राजतंत्र था, जिसमें राजा के निरंकुश होने पर कोई भी अवसर प्राप्त न था तथा उसके राज्य में सभा और समिति नाम्नी दो संस्थाओं का महत्त्वपूर्ण स्थान था। इसमें विद्वान् लोग एकत्र होकर उत्तमोत्तम रीति से अपने विचारों को प्रकट किया करते थे। सभा॒ च॑ मा॒ समि॑तिश्चावतां प्रजाप॑तेर्दुहि॒तरौ सं॑विदा॒ने। येना॑ सं॒गच्छा॒ उप॑ मा॒ स शि॑क्षाच्चारु॑ वदानि पितरः सङ्गेतेषु॥ वि॒द्म ते॑ सभे॒ नाम॑ नर॒ष्टा नाम॒ वा अ॑सि। ये ते॑ के च॑ सभा॒सद॒स्ते मे॑ सन्तु सवा॑चसः॥१ समिति में राजा की उपस्थिति अनिवार्य थी। समिति ही राजा का चुनाव करके उससे समस्त राष्ट्र का भार वहन करने का आग्रह करती थी और राजा से कहा जाता था कि प्रजा ने ही उसे राजापद के लिए चुना है। वह राष्ट्र के कंधे पर बैठे तथा भौतिक समृद्धि का विकास करे। इन तथ्यों से स्पष्ट है कि वैदिक युग में राजनैतिक दृष्टि से प्रचुर प्रबुद्धता एवं जागृति विद्यमान थी। ४. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में अथर्ववेद के धर्मदर्शन का अनुशीलन : वैदिक काल में धर्म ही जीवन का आधार था और इसका अनुकरण ही मानव के लिए अनिवार्य माना जाता था। धर्म के द्वारा ही मानव जीवन की दिशा निर्धारित की जाती थी। वैदिक वाङ्गमय की एक विशेषता यह भी है कि वह मानव मात्र के लिए कल्याण की भावना को अग्रसर करता है। साहित्य संस्कृत का अग्रदूत है, साहित्य संस्कृति का वाहन है। समाज की भावना को दर्पणवत् प्रतिबिम्बित करने वाला साहित्य कितना भी आदर्शवादी क्यों न हो वह यथार्थ से विमुख कभी नहीं हो सकता है। उसकी व्याप्ति राष्ट्र को परिधि के द्वारा नियंत्रित करती है। राष्ट्र के लिए भी धर्म का आधार अनिवार्य होता है और उससे भी आदर्श राष्ट्र की परिकल्पना पूर्ण होती है। धर्म मानव मात्र को यह बतलाता है कि उसका कर्तव्य है कि सदैव एक दूसरे की रक्षा तथा सहायता करे। केवल अपने स्वार्थ में उसे निविष्ट नहीं रहना चाहिये। १. अथर्ववेद ७/१२/१-२ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar