वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 285, कुल 353 में से
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षष्ठ अध्याय 257
उत्तम रीति से, धर्मानुकूल, सब प्रकार से होने वाले उत्तम ऐश्वर्य तुम दोनों को प्राप्त हों। आप दोनों हम राष्ट्रवासियों को समस्त वीर पुरुषों सहित या सर्व सामर्थ्य से युक्त ऐश्वर्य को प्रदान कीजिए।'' वृषा॑ यू॒थेव॒ वंस॑गः कृ॒ष्टीरि॒यत्योज॑सा। ईशा॑नो॒ अप्र॑तिष्कुतः॥१ अर्थात् गोयूथ में वृषभ के समान अपने पराक्रम से प्रजाओं को अपने वश में करता है और किसी से पराजित न होने वाला स्वयं राष्ट्र का स्वामी होता है। ऐसा राजा जो अपराजित हो, राष्ट्र के लिए गौरव का विषय ही हो सकता है। ऐसे राजा पर राष्ट्र की प्रजा को पूर्ण विश्वास होता है। वह भी अपने राजा के आदेश पर अपना सर्वस्व बलिदान करने के लिए सदैव ही तैयार रहते हैं। राष्ट्र की सीमाओं पर कुदृष्टि डालने वाला शत्रु भी अपने विनाश के बारे में सोचकर ही सदैव दूर रहने का प्रयास करेगा। राजा के अपनी प्रजा के प्रति कुछ कर्त्तव्य होते हैं, जिनकी अपेक्षा प्रजा भी करती है- परि॒च्छिन्नः॒ क्षेम॑मकरोत्॒ तम् आस॑न॒माच॑रन्। कुला॑यन् कृण्वन् कौर॑व्यः पति॒र्वद॑ति जा॒यया॑॥२ अर्थात् प्रजा को अपने संरक्षण में बसाने वाला राजा, समस्त कर्म, कुशल पुरुषों में श्रेष्ठ पालक होकर स्त्री के समान अपनी पृथिवी या प्रजा के साथ ही एक कुटुम्ब सा बनाता हुआ, आसन सिंहासन प्राप्त करके भी तप का आचरण करता हुआ, हमारे हित में कल्याण करे। अ॒भीव॒स्वः प्र जि॑हीते॒ यव॑: प॒क्वः पृ॒थो बिल॑म्। जनु॑ः स भ॒द्रमेध॑ति रा॒ष्ट्रे राज्ञ॑ः परि॒क्षित॑ः॥३ अर्थात् जिस प्रकार सूर्य की धूप में परिपक्व जौ आदि अन्न, जिस प्रकार खेत की हल से बनी रेखाओं पर खड़ा होता है, उसी प्रकार वह प्रजाजन भी प्रजाओं को सब प्रकार से स्थापित करने और उसकी रक्षा करने वाले राजा के राष्ट्र में अत्यन्त सुख खूब अधिक मात्रा में भोग करता है। उत्तम राजा के राज्य में प्रजा खूब सम्पन्न हो जाती है।
१. अथर्ववेद २०/७०/१४ २. अथर्ववेद २०/१२७/८ ३. अथर्ववेद २०/१२७/१०
CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar