वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 273, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri पञ्चम अध्याय 245 ६. राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता को सामवेद का प्रदेय- राष्ट्र की सभ्यता और संस्कृति हमारे प्राचीन वैदिक वाङ्मय से ही सुरक्षित है। यदि एक-एक पक्ष पर गूढ़ता से विचार किया जाय तो "मातृभूमि" को जननी माना जाता है। मातृभूमि या राष्ट्र की सुरक्षा सर्वोपरि होती है। इसके लिए भी वेदों में विचार किया गया है। महान्, सत्यनिष्ठा, सरलता, प्रचण्ड क्षात्र-तेज धर्मानुष्ठान एवं कर्त्तव्यपालन का गुण प्रत्येक शुभ कार्य को दक्षतापूर्वक सम्पन्न करना, ज्ञान और समर्पण की भावना "मातृभूमि" (राष्ट्र अथवा देश) को धारण अथवा पालन-पोषण करने में सक्षम होते हैं। वह मातृभूमि भूतकाल और भविष्य में तथा मध्य के आने वाले वर्तमानकाल के सकल पदार्थों की पालन करने वाली है। ऐसी वह मातृभूमि हमारी उन्नति के लिए अत्यन्त विस्तृत स्थान अथवा अवसर प्रदान करे। मातृभूमि के प्रति प्रेम व निष्ठा सिर्फ वर्तमान काल का ही विषय नहीं है, अपितु जब से पृथ्वी और मानव का अस्तित्व संज्ञान में आया तभी से मातृभूमि और उसके पुत्रों में अगाध प्रेम की भावना पाई जाती है। यह भावना ही देश की अखण्डता का प्रतीक है। मातृभूमि के शासन के लिए 'स्वशासन' और 'प्रजातंत्र' की अवधारणा आज आधुनिक काल की कल्पना नहीं है बल्कि इसका उल्लेख वैदिक साहित्य से ही प्राप्त हो चुका है। आ न इन्द्रो शातग्विनं गवां पोषः स्वाक्ष्म्यम्। वहा भगत्तिमूतये॥¹ अर्थात् हे परमेश्वर ! हमें रक्षा के लिए इन्द्रियों में सैकड़ों प्रकार के बल से युक्त पुष्टि, राष्ट्र का संगठन तथा मान-प्रतिष्ठा प्रदान कर। "इस मंत्र के द्वारा देश के प्रत्येक नागरिक के मन में व्याप्त विचारों का उद्घाटन होता है कि उसकी अपनी मातृभूमि के प्रति क्या भावनायें हैं?" देश की एकता और अखण्डता को चुनौती देने वालों के लिए मातृभूमि के साहसी पुत्रों द्वारा सिंहनाद करने का उल्लेख सामवेद में है- आ बुन्दं वृत्रहा ददे जातः पृच्छाद्वि मातरम्। क उग्राः के ह शृण्विरे॥² अर्थात् 'शास्त्र विद्या में निपुण वीर शस्त्र हाथ में लेकर (मातृभूमि की प्रजा) से पूछे कि कौन-कौन देशद्रोही यहाँ निवास करते हैं?' १. सामवेद भाषाभाष्ये- उत्तरार्चिकः ४/८३५ २. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः २/२१६ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar